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1983 में मेरे पिताजी एक सार्वजनिक संयंत्र स्टील ऑथोरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड में अधिकारी के रूप मैं काम करते थे।

हमें कंपनी के तरफ से एक बड़ा क्वार्टर आवंटित हुआ था। हम कुल मिला के दो भाई थे। मैं बड़ा था। उस समय मेरी उम्र कोई पांच या छह साल रही होगी। हमारे क्वार्टर में एक बहुत ही बड़ा बगीचा था। मैं और मेरा भाई उसमें अक्सर खेला करते थे।
तो बात ये है कि हमारे दादाजी उस समय गरमी की छुट्टीयों में हमारे घर आए। मैं दादाजी का प्यारा पोता था और दिन भर उनके साथ ही घुमा करता था। मेरे दादाजी एक सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक थे। उन्हें हिंदी, संस्कृत, इतिहास, भूगोल और भूगोल पर काफी ज्ञान था।
एक बार ऐसे ही मैं और दादाजी बगीचे में टहल रहे थे। वहां अलग अलग किस्म के पेड़ लगे हुए थे। मैने दादाजी से पूछा कि क्या पेड़ और इंसान में भी कोई रिश्ता हो सकता है दादाजी???
तो उन्होंने बोला कि बिलकुल ही सकता है क्यूं नहीं हो सकता है। पर फर्क बस ये है कि तुम्हें उस पेड़ के प्रेम को जानने में बहुत समय लग जाएगा क्योंकि पेड़ पौधे मूक होते हैं। बोल नहीं सकते। वो तुमसे संवाद नहीं कर सकते। खैर मुझे कुछ खास उस समय समझ में नहीं आया क्यूंकि मैं बहुत छोटा था और दूसरी कक्षा में पढ़ता था।
पर अगले दिन दादाजी ने मुझे बगीचे में बुलाया और मेरे हाथों से एक आम का पेड़ लगवाया।
इस बात को मैं धीरे धीरे भूल गया। पांच साल के बाद मेरे पिताजी का वहां से स्थानांतरण हो गया और हम दूसरे शहर में आ गया। मैं भी अपनी पढाई लिखाई में व्यस्त हो गया और 2012 में स्नातकोत्तर करने के बाद एक बड़े बैंक में अधिकारी के रूप में ज्वाइन किया। मैं मेरे द्वारा लगाए गए उस आम के छोटे पेड़ को पूरी तरह ही भूल चुका था।
2023 में मेरा स्थानांतरण उसी शहर में हुआ जहां हमारे पिताजी कभी कार्यरत थे और सौभाग्य की बात देखिए कि मुझे भी वहीं क्वार्टर आवंटित हुआ जिसमें की में कभी बचपन में रहा करता था। मैं अनायास ही बगीचे की और चल दिया। कुछ दूर जाना के बाद मुझे कुछ गुरुत्वाकर्षण का अनुभव हुआ जैसे की कोई मुझे अपने पास बुला रहा हो।
मेरे पांव कुछ दूर आगे ही बढ़े थे की वो एक विशाल आम के पेड़ के समीप अपने आप रुक गए।
तब मुझे याद आया कि ये तो वही आम का पेड़ है जिसे मैंने बचपन में लगाया था और ये अब पूरे 40 साल के बाद विशाल वृक्ष बन गया है। मैं जाकर उसके तने से गले लग गया। मुझे इतनी खुशी की अनुभूति हुई जैसे की मैं अपने भाई से ही मिल रहा हूं। मैं आत्मविभोर हो गया। और कहीं न कहीं ऐसा भी लग रहा था जैसे वो आम का पेड़ मुझे पूछ रहा ही की तुम चालीस साल से कहां थे। तुम्हें मेरी कभी याद नहीं आई।
मैं भावविह्वल हो गया और मेरे आंखों से आंसू टपक पड़े। मैं अपने भाई का गुनाहगार था और क्षमाप्रार्थी भी।
मुझे अनायास ही दादाजी की याद आ गई कि मनुष्य और पेड़ में भी गहरा प्रेम हो