इंडिया सावधान न्यूज़ मजहर अंसारी
लखनऊ बदायूं की तहसील सहसवान में अजब खेल एक तरफ तहसील अभिलेखों में निष्कांत एवं शत्रु संपत्ति दर्ज तो है मगर है कहां ?
तहसील सहसवान में भू माफियाओं का बोल बाला के चलते करोड़ों की जमीन पर अवैध कब्ज़ा, निर्माण कार्य जारी ? इस फर्जी बाड़े में कोन शामिल और कोन नहीं यह सब जांच का विषय है , सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार
एक शिकायती पत्र उपजिलाधिकारी सहसवान को निष्कांत एवं शत्रु संपत्ति के संबंध में दिया गया था,जिसमें मालिकान रजिस्टर संख्या (आर-6) के पृष्ठ क्रमांक 428 पर अंकित वाद संख्या 889/ 18 नवंबर 1958, 31दिसंबर1964
तहसीलदार सहसवान के आदेशानुसार गाटा संख्या 121,122,123,143,145, से शमशुल निशा का नाम खारिज कर हबीब बानो पत्नी अहमद अली खां का नाम दर्ज किया गया
वहीं (आर-6) के पृष्ठ क्रमांक 435 पर वाद संख्या 889/18-11-1958 और 31-12-1964 के आदेशानुसार अय्यूब खां वा अमीर अहमद खां पुत्र अली अहमद खां का नाम 118,120,122,142,145,से खारिज कर हबीब बानो जोजा
अहमद अली का नाम दर्ज किया गया जो कि दोनों ही आदेश अलग अलग पृष्ठों पे अंकित हैं के बाद संख्या 889 दिनाँक 18 -11-1958 वा 31 दिसंबर 1964 एक ही केसे हो सकते हैं
,जबकि प्रथम आदेश सही है,जबकि बाद के आदेशों में फर्जी बाड़ा साफ नजर आता है।
मिली जनकारिंक अनुसार अय्यूब अहमद खान और अमीर अहमद खां का नाम किस आधार पर कटा गया जो कि इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं है
,अय्यूब खां और अमीर अहमद खां तथा शमशुल निशा के अतिरिक्त सह खातेदार राजिया बेगम, जकिया बेगम खुदेजा बेगम पुत्रियां अली अहमद ख़ां तथा मुश्ताक अली वा शहजाद अली पुत्रगण हिदायत अली वा छम्मी बेगम पुत्री हिदायत
अली मोहल्ला सेफुल्ला गंज जो कि खसरा संख्या 121 के सह खातेदार के रूप में दर्ज थे,जबकि इन लोगों के नाम खतम कर दिए गए अब सवाल यह उठता है की इनके नाम की भूमि किस को दी गई और दी भी गई तो किस आधार पर दी
गई, बात यहां ही खतम नहीं होती है,वहीं वाद संख्या- 889/ 18-11-1958, 31-12-1964 तहसील सहसवान का प्रिय संख्या है जो की हर आदेश पर यह ही अंकित होता है, वहीं मालिकाना रजिस्टर (आर-6) पर दर्ज होने के तीन वर्ष
बाद 1376 फसली में इसका अमल दरामद क्यों हुआ,जबकि 1372 फसली से 1375 फसली तक मूल खातेदारी का ही नाम दर्ज था,वहीं 1976 फसली में हबीब बानो का नाम कहां से अंकित हो गया और अगर अय्यूब खान की भूमि शत्रु
संपत्ति थी तो उसका बैनामा सन 1953 में अंकित ग्राम जाहिद पुर आलम पुर के चकबंदी के पूर्व गाटा संख्या 184 रकबा एक बीघा चौदह बिसे जो हबीब बेगम को शमशुल निशा ने बेची थी का नामांतरण क्यों नहीं हुआ जबकि उक्त भूमि
हबीबुर्रहमान के नाम बिना किसी विरासत बिना किसी बैनामे के केसे नाम में हो गईं,जबकि मुख्तरे आम बावत शमशुल निशा 1944 प्रस्तुत नहीं किया गया
जब की पूर्व में निस्कांत संपत्ति राज्य सरकार में घोषित हो चुकी थी,यह सब जांच का विषय है ,योगी जी शासन में उम्मीद की जा सकती है कि उपरोक्त शत्रु संपत्ति का निष्पक्ष जांच होगी
और जो भी इसमें दोषी होंगे उनके विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्यवाही अमल में आयेगी और जितने भी उपरोक्त भूमि के हुए हैं वोह सब कैंसिल होकर राज्य सकरार उक्त भूमि को अपने कब्जे में लेने का काम करेगी

