India-अमेरिका व्यापार समझौता अंतिम रूप में: सरकार बयान की तैयारी में, लोकसभा में विपक्ष ने उठाए सवाल
ज़रा कल्पना कीजिए—दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ हाथ मिलाती हैं और इसका असर मुंबई से लेकर मैनहैटन तक के बाज़ारों पर पड़ता है। India-अमेरिका व्यापार समझौता वर्षों की बातचीत के बाद आखिरकार अंतिम रूप ले चुका है। अब भारतीय सरकार इस पर बड़ा आधिकारिक बयान देने की तैयारी कर रही है, वहीं लोकसभा में विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है।
यह समझौता द्विपक्षीय संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत करता है। इससे रोज़गार और आर्थिक विकास के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है, लेकिन देश के भीतर इसकी कीमत और प्रभाव को लेकर बहस भी तेज़ हो गई है। इस लेख में हम समझौते के प्रमुख प्रावधानों, व्यापारिक लाभों, राजनीतिक विवाद और वैश्विक स्तर पर इसके मायनों को विस्तार से समझेंगे।
India-अमेरिका व्यापार समझौते के मुख्य घटक
यह समझौता कई क्षेत्रों को कवर करता है और व्यापारिक बाधाओं को कम करता है। दोनों देशों ने लाभों का संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है।
प्रमुख सेक्टरों में रियायतें और बाज़ार तक पहुँच
Indiaको कृषि निर्यात में बड़ी सफलता मिली है। अमेरिका में भारतीय चावल और मसालों पर लगने वाले शुल्क में 20% तक की कटौती की गई है। इसके बदले अमेरिका को Indiaके डेयरी बाज़ार में आसान पहुँच मिलेगी।
नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में तकनीक साझा करने पर सहमति बनी है। भारतीय सोलर पैनल निर्माता अब अमेरिकी कंपोनेंट्स कम शुल्क पर आयात कर सकेंगे। रक्षा क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव हुआ है—भारतीय कंपनियों को अगले पाँच वर्षों में लगभग 5 अरब डॉलर के अमेरिकी रक्षा अनुबंधों में बोली लगाने की अनुमति मिलेगी।
नियामकीय सुधार भी किए गए हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में मानकों का सामंजस्य स्थापित किया गया है, जिससे उत्पाद अनुमोदन की प्रक्रिया तेज़ होगी और लालफीताशाही कम होगी।
मुख्य बिंदु:
कृषि: शुल्क कटौती से भारतीय निर्यात में 15% तक बढ़ोतरी की उम्मीद
नवीकरणीय ऊर्जा: पवन ऊर्जा तकनीक में संयुक्त उपक्रम
रक्षा: पहली बार अमेरिकी सप्लाई चेन में भारतीय कंपनियों की एंट्री
ये कदम पुराने व्यापारिक मतभेदों को दूर करने और आपसी भरोसा बढ़ाने की दिशा में अहम हैं।

बौद्धिक संपदा और डिजिटल व्यापार ढांचा
बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) को इस समझौते में विशेष महत्व दिया गया है। India ने अमेरिकी फार्मा कंपनियों के लिए पेटेंट अनुमोदन प्रक्रिया तेज़ करने पर सहमति दी है, जिससे वर्षों लगने वाली प्रक्रिया अब कुछ महीनों में पूरी हो सकेगी।
डिजिटल व्यापार के क्षेत्र में डेटा प्रवाह को लेकर नियम तय किए गए हैं। अधिकांश सेवाओं के लिए सख्त डेटा लोकलाइज़ेशन की शर्त नहीं होगी, जिससे क्लाउड कंप्यूटिंग और टेक कंपनियों को राहत मिलेगी। हालांकि बैंकिंग जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भारत ने सुरक्षा उपाय बनाए रखे हैं।
डिजिटल सेवा कर (DST) पर भी समझौता हुआ है। भारत ने अमेरिकी टेक कंपनियों पर लगने वाला 2% DST हटाने पर सहमति दी है, बदले में विज्ञापन राजस्व पर साझा कर व्यवस्था लागू होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे व्यापार युद्ध की आशंका कम होगी, हालांकि कुछ लोगों को IPR नियमों के सख्त होने की चिंता है।
व्यापार मात्रा पर संभावित प्रभाव
सरकारी अनुमान के मुताबिक अगले तीन वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार 30% तक बढ़ सकता है। वर्तमान में लगभग 190 अरब डॉलर का व्यापार 2029 तक 250 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है।
यह वृद्धि चीन से सप्लाई चेन के स्थानांतरण और शुल्क में कटौती के कारण संभव मानी जा रही है। फार्मा क्षेत्र अकेले 10 अरब डॉलर तक अतिरिक्त निर्यात जोड़ सकता है। छोटे और मध्यम व्यवसायों को भी इससे फायदा होने की संभावना है।
भारतीय उद्योगों पर आर्थिक प्रभाव
यह समझौता भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिकी बाज़ार के दरवाज़े खोलता है, लेकिन कुछ घरेलू क्षेत्रों के लिए चुनौतियाँ भी लाता है।
भारतीय निर्यातकों के लिए अवसर
कपड़ा उद्योग को सबसे ज़्यादा लाभ मिलने की उम्मीद है। शुल्क कम होने से अमेरिकी बाज़ार में भारतीय कपड़े सस्ते होंगे और अगले साल निर्यात 25% तक बढ़ सकता है।
फार्मा सेक्टर को भी स्पष्ट नियमों से फायदा होगा। जेनेरिक दवाओं की बिक्री बढ़ेगी। आईटी सेवाओं को भी राहत मिलेगी, खासकर भारतीय पेशेवरों के लिए आसान वीज़ा व्यवस्था से।
अनुमान है कि इन क्षेत्रों में लगभग 5 लाख नए रोज़गार पैदा हो सकते हैं।
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) और तकनीक हस्तांतरण
अमेरिका से भारत में निवेश का रास्ता और खुला है। सेमीकंडक्टर और उन्नत तकनीक में 2028 तक 20 अरब डॉलर के निवेश की संभावना है।
इलेक्ट्रिक वाहन (EV) क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियाँ भारतीय कंपनियों के साथ बैटरी तकनीक साझा करेंगी, जिससे भारत का हरित परिवर्तन तेज़ होगा।

घरेलू क्षेत्रों की चुनौतियाँ
हालांकि, कुछ क्षेत्रों को नुकसान की आशंका है। अमेरिकी चिकन आयात पर शुल्क घटने से भारतीय पोल्ट्री किसानों पर दबाव बढ़ सकता है। ऑटो पार्ट्स और स्टील उद्योग को भी सस्ती अमेरिकी आपूर्ति से प्रतिस्पर्धा झेलनी पड़ेगी।
सरकार ने इन क्षेत्रों के लिए सब्सिडी, कौशल पुनः प्रशिक्षण और सुरक्षा उपायों का आश्वासन दिया है।
लोकसभा में राजनीतिक हलचल
यह समझौता ऐसे समय आया है जब देश में राजनीतिक माहौल गर्म है।
विपक्ष की चिंताएँ
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने खाद्य सुरक्षा और किसानों पर असर को लेकर सवाल उठाए हैं। डेयरी क्षेत्र में विदेशी प्रतिस्पर्धा और IPR नियमों को लेकर संप्रभुता से जुड़े मुद्दे उठाए जा रहे हैं।
सरकार की रणनीति
सरकार संसद में रोज़गार, निवेश और निर्यात वृद्धि के आंकड़ों के साथ समझौते का बचाव करेगी। रणनीतिक रूप से अमेरिका के साथ साझेदारी को चीन के प्रभाव को संतुलित करने के रूप में पेश किया जाएगा।

वैश्विक और भू-राजनीतिक संदर्भ
यह समझौता इंडो-पैसिफिक रणनीति और IPEF (Indo-Pacific Economic Framework) के अनुरूप है। इससे क्षेत्रीय सप्लाई चेन मज़बूत होंगी और चीन पर निर्भरता घटेगी।
EU और ASEAN जैसे अन्य व्यापारिक साझेदार भी इस पर नज़र रखे हुए हैं। यह समझौता भविष्य के वैश्विक व्यापार समझौतों के लिए एक मिसाल बन सकता है।
आर्थिक महत्वाकांक्षा और घरेलू जवाबदेही के बीच संतुलन
India-अमेरिका व्यापार समझौता आर्थिक दृष्टि से एक साहसिक कदम है। इससे व्यापार, निवेश और तकनीकी सहयोग को नई गति मिलेगी। लेकिन लोकसभा में उठे सवाल यह याद दिलाते हैं कि घरेलू हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
अब सबसे अहम चरण है—इसका प्रभावी क्रियान्वयन और व्यापक सहमति बनाना। कपड़ा, फार्मा और आईटी जैसे क्षेत्रों के लिए यह सुनहरा अवसर है, वहीं संवेदनशील क्षेत्रों के लिए संतुलित नीति ज़रूरी होगी।
यह समझौता Indiaकी विकास यात्रा को नई दिशा दे सकता है। आने वाले दिनों में इसके वास्तविक प्रभाव साफ़ होंगे।
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