1. इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगीकरण: विकास का दोहराया गया ब्लूप्रिंट?
एक्सप्रेसवे और लॉजिस्टिक कॉरिडोर
उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे और डिफेंस कॉरिडोर जैसे बड़े प्रोजेक्ट तेज़ी से आगे बढ़े हैं।
गुजरात में मोदी के कार्यकाल के दौरान सड़क नेटवर्क, बंदरगाह विकास और औद्योगिक कॉरिडोर (जैसे दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर) ने राज्य की अर्थव्यवस्था को गति दी थी।
समानताएं:
बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण
औद्योगिक क्लस्टर आधारित विकास
लॉजिस्टिक्स लागत घटाने पर जोर
उत्तर प्रदेश अब खुद को $1 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य घोषित कर चुका है—कुछ वैसा ही महत्वाकांक्षी दृष्टिकोण जैसा गुजरात ने 2000 के दशक में अपनाया था।
निवेश शिखर सम्मेलन और “ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस”
यूपी का ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट, गुजरात के “वाइब्रेंट गुजरात” मॉडल की याद दिलाता है।
दोनों राज्यों ने बड़े मंचों पर निवेश प्रतिबद्धताएं जुटाने और सिंगल-विंडो क्लीयरेंस जैसी प्रक्रियाओं के जरिए उद्योगों को आकर्षित करने की रणनीति अपनाई।
उत्तर प्रदेश ने हाल के वर्षों में ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस रैंकिंग में तेज़ सुधार दिखाया है।
यह वही रणनीति है जिसने गुजरात को ऑटोमोबाइल और फार्मा हब में बदला।

2. शासन शैली: मजबूत नेतृत्व और केंद्रीकरण
तेज़ निर्णय और प्रशासनिक नियंत्रण
योगी Adityanath की छवि एक सख्त और निर्णायक प्रशासक की है।
गुजरात में मोदी के शासन के दौरान भी निर्णय लेने की गति और नौकरशाही पर नियंत्रण को विकास का प्रमुख कारण बताया गया।
फाइल निस्तारण की समयसीमा
परियोजनाओं की मॉनिटरिंग
“जीरो टॉलरेंस” नीति
यह शैली समर्थकों को भरोसा देती है कि सरकार निर्णायक है, हालांकि आलोचक इसे अत्यधिक केंद्रीकरण भी मानते हैं।
कानून-व्यवस्था पर फोकस
उत्तर प्रदेश में अपराध के खिलाफ सख्त अभियान, “माफिया मुक्त” छवि, और त्वरित कार्रवाई—यह राजनीतिक संदेश देता है कि कानून-व्यवस्था विकास की बुनियाद है।
गुजरात में भी मोदी शासन के दौरान स्थिरता और सुरक्षा को निवेश आकर्षण का आधार बताया गया था।
3. सांस्कृतिक और वैचारिक आयाम
धार्मिक और ऐतिहासिक प्रतीकों का पुनर्स्थापन
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, काशी कॉरिडोर, शहरों के नाम परिवर्तन—ये कदम सांस्कृतिक पुनरुत्थान का संदेश देते हैं।
गुजरात में भी सांस्कृतिक विरासत और मंदिरों के पुनरोद्धार को पहचान राजनीति के साथ जोड़ा गया था।
यह मिश्रण—विकास + सांस्कृतिक पहचान—एक मजबूत राजनीतिक नैरेटिव बनाता है।

सामाजिक समीकरण और वोट बैंक रणनीति-Adityanath
योगी Adityanath सरकार ने ओबीसी, दलित और गरीब वर्गों के लिए योजनाओं पर जोर दिया है।
गुजरात में भी मोदी ने जातीय समीकरणों को संतुलित करते हुए व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार किया था।
दोनों ही मॉडल “विकास” और “पहचान” को साथ लेकर चलते हैं।
4. राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा: दिल्ली की ओर बढ़ते कदम?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में सफलता का मॉडल राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका मजबूत करने का आधार बन सकता है।
गुजरात से दिल्ली तक मोदी का सफर इसी तर्क पर आधारित था—राज्य स्तर की उपलब्धियों को राष्ट्रीय दृष्टि में बदलना।
हालांकि, एक बड़ा अंतर यह है कि योगी आदित्यनाथ अभी भी प्रधानमंत्री मोदी की केंद्रीय भूमिका के तहत कार्य कर रहे हैं।
उनकी रणनीति शायद “समानांतर शक्ति केंद्र” नहीं, बल्कि “पूरक नेतृत्व” की हो सकती है।
5. क्या यह सीधी नकल है या अनुकूलन?
यह कहना कि यूपी पूरी तरह “कॉपी” कर रहा है, शायद सरल निष्कर्ष होगा।
दरअसल, हर राज्य की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियां अलग होती हैं।
गुजरात: अपेक्षाकृत छोटा, औद्योगिक रूप से पहले से विकसित
उत्तर प्रदेश: विशाल जनसंख्या, कृषि प्रधान पृष्ठभूमि
इसलिए मॉडल का अनुकूलन आवश्यक है। यूपी का पैमाना कहीं बड़ा है, चुनौतियां भी अधिक जटिल हैं।

दो मॉडलों का संगम या नई राजनीतिक धारा?
योगी Adityanath का उत्तर प्रदेश निश्चित रूप से कई मामलों में गुजरात मॉडल की झलक देता है—विशेषकर इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश आकर्षण, मजबूत नेतृत्व और सांस्कृतिक राजनीति के संयोजन में।
लेकिन यह भी सच है कि यूपी की परिस्थितियां अलग हैं, और यहां सफलता का पैमाना अधिक चुनौतीपूर्ण है।
यदि यह प्रयोग दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि, रोजगार सृजन और सामाजिक स्थिरता में सफल होता है, तो यह राष्ट्रीय राजनीति में एक नए अध्याय की नींव रख सकता है।
अब सवाल यह है:
क्या यह “गुजरात मॉडल 2.0” है या “उत्तर प्रदेश मॉडल” की शुरुआत?
आपकी नजर में यह रणनीति दीर्घकाल में कितनी कारगर साबित हो सकती है?
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