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तेज प्रताप के संक्रांति भोज में पहुंचे Lalu यादव: बिहार में चुनावी हार के बाद सुलह के संकेत

पटना के सियासी गलियारों में इस मकर संक्रांति पर एक साधारण पारिवारिक भोज ने बड़ी हलचल मचा दी। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सुप्रीमो Lalu प्रसाद यादव अपने बेटे तेज प्रताप यादव के यहां संक्रांति भोज में पहुंचे। यह सिर्फ धूप में बैठकर खिचड़ी खाने का मामला नहीं था, बल्कि चुनावी हार के बाद मुश्किल दौर से गुजर रहे परिवार और पार्टी में एकजुटता का बड़ा संदेश था। बिहार की राजनीति में हर छोटी तस्वीर का मतलब निकाला जाता है—और इस मुलाकात को भी संभावित “समझौते” के तौर पर देखा गया।

पृष्ठभूमि: चुनाव के बाद परिवार और पार्टी में दरारें

बिहार की राजनीति अक्सर पारिवारिक नाटक जैसी लगती है और इसके केंद्र में लंबे समय से यादव परिवार रहा है। हालिया चुनावी नतीजों ने इस परिवार की चुनौतियां और बढ़ा दी हैं।

हालिया चुनावी झटके का विश्लेषण

2024 के लोकसभा चुनाव में राजद के नेतृत्व वाला महागठबंधन बिहार में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सका। 40 में से केवल 9 सीटें जीत पाना पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए निराशाजनक रहा। रणनीति और नेतृत्व को लेकर सवाल उठे।
स्वास्थ्य कारणों से Lalu यादव दिल्ली में रहे, जबकि छोटे बेटे तेजस्वी यादव ने चुनावी मोर्चा संभाला। नतीजों के बाद यह चर्चा तेज हो गई कि परिवार के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा।

तेज प्रताप का चुनाव बाद का रुख

तेज प्रताप यादव ने सोशल मीडिया पर “नई सोच” और “नए रास्ते” की बात कही, जिसे कई लोगों ने तेजस्वी की रणनीति पर परोक्ष सवाल के रूप में देखा। कुछ बैठकों से उनकी गैरमौजूदगी ने अटकलों को और हवा दी। ऐसे माहौल में संक्रांति भोज का आयोजन एक सोचा-समझा कदम माना गया।

Lalu attends Tej Pratap's Sankranti feast, signals reconciliation after poll drubbing - The Hindu

संक्रांति भोज: खिचड़ी से कहीं ज्यादा

बिहार में भोजन सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं, बल्कि रिश्ते जोड़ने का माध्यम है। यह भोज भी उसी परंपरा का हिस्सा था।

मेहमानों की मौजूदगी और प्रतीकात्मकता

Lalu यादव मुस्कुराते हुए पहुंचे। तेजस्वी यादव भी साथ दिखे। राजद के करीबी नेता मौजूद थे, लेकिन महागठबंधन के बड़े सहयोगी नेताओं की अनुपस्थिति यह संकेत देती है कि यह मामला परिवार के भीतर सुलझाने का था।
बिहार की राजनीति में संक्रांति भोज अक्सर मेल-मिलाप का मंच रहा है। इस साझा भोजन ने यही संदेश दिया—“सब ठीक है।”

Lalu यादव की बॉडी लैंग्वेज और संदेश

Lalu यादव सहज दिखे। वे तेज प्रताप से हंसते-बोलते नजर आए, पीठ थपथपाई। एक अतिथि के मुताबिक उन्होंने कहा, “मुश्किल वक्त में परिवार साथ रहता है।”
पिछले कुछ समय की दूरी के मुकाबले यह साफ बदलाव था। इससे संकेत मिला कि राजद सुप्रीमो परिवार और पार्टी को एकजुट रखने के मूड में हैं।

राजद नेतृत्व पर इसका असर

तेजस्वी–तेज प्रताप संतुलन

तेजस्वी यादव पार्टी में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर कमान संभाले हुए हैं। वहीं तेज प्रताप की जमीनी पकड़ और सांस्कृतिक पहचान अलग है। यह मेल-मिलाप सहयोग की ओर इशारा करता है, न कि टकराव की ओर।
अब कयास लग रहे हैं कि 2025 के बिहार चुनाव में तेज प्रताप को बड़ी भूमिका मिल सकती है—खासतौर पर यादव बहुल इलाकों में।

Lalu attends Tej Pratap's Sankranti feast, signals reconciliation after poll drubbing

संभावित असर:

  • पार्टी की छवि मजबूत होगी

  • तेज प्रताप सांस्कृतिक और सामाजिक संपर्क संभाल सकते हैं

  • तेजस्वी एनडीए पर राजनीतिक हमले तेज करेंगे

कार्यकर्ताओं के लिए संदेश

चुनावी हार के बाद कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा था। Lalu और उनके बेटों की एकजुटता ने कैडर में नई ऊर्जा भरी है। गांव-देहात में इसे “परिवार एक है” के संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
बिहार में पारिवारिक फूट का असर सीधे वोटिंग पर पड़ता है। एकजुटता से आधार वोटर फिर सक्रिय हो सकता है।

बिहार की राजनीति पर व्यापक असर

महागठबंधन की मजबूती

कांग्रेस और वाम दलों के लिए यह राहत का संकेत है कि राजद भीतर से बिखर नहीं रहा। 2015 के अनुभव से सबक लिया गया है, जब पारिवारिक खींचतान ने गठबंधन को कमजोर किया था।

एनडीए के खिलाफ आगे की रणनीति

एकजुट राजद, नीतीश कुमार और भाजपा के एनडीए के लिए चुनौती बन सकता है। बेरोजगारी, किसान मुद्दों और सामाजिक न्याय को लेकर आक्रामक रणनीति संभव है।
राजनीतिक विश्लेषक प्रशांत किशोर के शब्दों में, “राजद की सबसे बड़ी ताकत परिवार है। जब वह एक रहता है, विरोधी दबाव में आते हैं।”

Lalu attends Tej Pratap's Sankranti feast, signals reconciliation after poll drubbing

आगे की दिशा:

  • युवाओं को बदलाव के वादे

  • सोशल मीडिया पर एकजुटता का संदेश

  • जातीय समीकरणों का बेहतर उपयोग

बिहार राजनीति की अनकही कहानी

संक्रांति भोज ने सुलह और एकता की कहानी बुन दी। Lalu यादव की मौजूदगी ने मतभेद की अटकलों पर विराम लगाया और राजद को चुनावी हार के बाद फिर मजबूत दिखाया।

  • तेजस्वी का नेतृत्व सुरक्षित, तेज प्रताप को भी स्पेस

  • जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा

  • महागठबंधन को नई धार, एनडीए पर दबाव

Lalu यादव की विरासत एक बार फिर दिखी—संकट में परिवार को संभालना और यादव राजनीति को मजबूत बनाए रखना।
अब सवाल यही है: क्या यह एकजुटता आने वाले महीनों में सियासी समीकरण बदल पाएगी? बिहार की राजनीति पर नजर बनाए रखिए—यहां कहानी कभी थमती नहीं।

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