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Om Birla द्वारा पैनल का पुनर्गठन: न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ जांच तेज

कल्पना कीजिए, एक जज अपने फैसलों को लेकर कठोर सवालों का सामना कर रहा हो। अभी भारत की न्याय व्यवस्था में कुछ ऐसा ही माहौल है। LS अध्यक्ष ओम बिरला ने न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को पद से हटाने के संभावित आधारों की जांच के लिए एक महत्वपूर्ण पैनल का पुनर्गठन किया है।

न्यायमूर्ति वर्मा Delhi High Court में कार्यरत हैं। यह मामला न्यायपालिका की जवाबदेही और उसकी स्वतंत्रता के बीच संतुलन की परीक्षा जैसा बन गया है।

यह जांच केवल औपचारिकता नहीं है। यह Judges (Inquiry) Act, 1968 के तहत चल रही है, जो न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से निर्धारित करता है।

न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ जांच की पृष्ठभूमि

प्रारंभिक आरोप और शिकायतें

न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ पिछले वर्ष कुछ शिकायतें दायर की गई थीं। आरोपों में बड़े भूमि सौदों से जुड़े मामलों में पक्षपातपूर्ण निर्णय देने की बात कही गई है। हालांकि अभी तक इन आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन शिकायतें इतनी गंभीर थीं कि जांच शुरू करनी पड़ी।

कुछ वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने LS में याचिकाएं दाखिल कीं। एक शिकायत में विशेष मामलों का उल्लेख है, जहां फैसलों को लेकर निष्पक्षता पर सवाल उठे।

1968 का कानून: प्रक्रिया कैसे चलती है?

Judges (Inquiry) Act, 1968 के तहत किसी भी उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए “सिद्ध कदाचार” (proved misbehavior) या अक्षमता साबित करनी होती है।

LS Speaker Om Birla reconstitutes panel to probe grounds for removal of Justice  Yashwant Varma - The Economic Times

प्रक्रिया इस प्रकार है:

  • संसद के किसी सदन में प्रस्ताव लाया जाता है।

  • LS अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन करते हैं।

  • समिति जांच कर रिपोर्ट देती है।

  • दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित होने पर राष्ट्रपति न्यायाधीश को पद से हटा सकते हैं।

यह प्रक्रिया बहुत दुर्लभ है और अब तक किसी न्यायाधीश को पूर्ण रूप से हटाया नहीं गया है।

पुनर्गठित जांच समिति: क्या बदला?

LS अध्यक्ष ओम बिरला ने हाल ही में जांच पैनल में दो सदस्यों को बदला है। यह कदम इसलिए उठाया गया ताकि जांच प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके और निष्पक्षता सुनिश्चित हो।

नई समिति का दायित्व है:

  • पिछले पांच वर्षों के मामलों की समीक्षा

  • संबंधित दस्तावेजों की जांच

Removal of Justice Varma: LS Speaker Forms Probe Panel

  • गवाहों के बयान दर्ज करना

  • न्यायमूर्ति वर्मा को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर देना

जांच प्रक्रिया गोपनीय रहेगी, लेकिन निष्पक्षता और पारदर्शिता के नियमों का पालन अनिवार्य होगा।

आगे क्या होगा?

समिति को लगभग छह महीने में अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। यदि रिपोर्ट में हटाने की सिफारिश की जाती है, तो मामला संसद में जाएगा।

  • LS में दो-तिहाई बहुमत आवश्यक होगा।

  • इसके बाद राज्यसभा में भी समान बहुमत चाहिए।

  • दोनों सदनों से पारित होने पर राष्ट्रपति अंतिम निर्णय लेंगे।

यदि प्रस्ताव पारित नहीं होता, तो न्यायाधीश अपने पद पर बने रहेंगे।

Removal of Justice Varma: LS Speaker Forms Probe Panel

संवैधानिक महत्व और संतुलन

भारत का संविधान न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा करता है, लेकिन साथ ही जवाबदेही भी सुनिश्चित करता है। यह मामला विधायिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन की परीक्षा है।

ऐसे मामलों से यह संदेश जाता है कि लोकतंत्र में कोई भी पद पूरी तरह जवाबदेही से परे नहीं है।

LS अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा जांच पैनल का पुनर्गठन इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह कदम न्यायिक जवाबदेही और संस्थागत विश्वसनीयता को मजबूत करने की दिशा में देखा जा रहा है।

अब सबकी निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। यह मामला आने वाले वर्षों में न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास को प्रभावित कर सकता है।

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