Bihar चुनाव: महागठबंधन तैयार, लेकिन क्या कांग्रेस कमजोर कड़ी है?
Bihar की राजनीति एक बार फिर गरमाने लगी है। विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं, और विपक्षी गठबंधन महागठबंधन (RJD, कांग्रेस, वामदल आदि) ने NDA को चुनौती देने की पूरी तैयारी कर ली है।
लेकिन सवाल उठता है — क्या इस गठबंधन में कांग्रेस सबसे कमजोर कड़ी बन रही है?
यह रिपोर्ट महागठबंधन की ताकत, रणनीति और कांग्रेस की भूमिका को गहराई से समझाती है।
Bihar की बदलती राजनीतिक बिसात
Bihar की राजनीति हर चुनाव में नए समीकरण गढ़ती है।
महागठबंधन की रीढ़ है राष्ट्रीय जनता दल (RJD), जो ग्रामीण इलाकों में मज़बूत पकड़ रखती है। वामपंथी दल सामाजिक न्याय की जमीन पर मजबूती देते हैं।
RJD का फोकस ग्रामीण वोटरों पर है, जबकि छोटे सहयोगी दल शहरी और पिछड़े वर्गों तक पहुंच बनाते हैं। यह टीम मिलकर BJP और NDA के खिलाफ एक बड़ा मोर्चा खड़ा करती है।
राजनीति यहां गठबंधन की कला पर टिकी है — कब कौन साथ छोड़े या जुड़ जाए, तय नहीं।
Bihar में कांग्रेस की भूमिका: अतीत से आज तक
कभी Bihar में कांग्रेस का एकछत्र राज था। लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है।
2015 चुनाव: कांग्रेस ने महागठबंधन के तहत 27 सीटें जीती थीं।
2020 चुनाव: यह घटकर सिर्फ 1 सीट रह गई — पार्टी के लिए गहरा झटका।
जमीनी पकड़ लगातार ढीली पड़ती गई। कार्यकर्ताओं की संख्या घटी, बूथ स्तर पर उपस्थिति कमजोर हुई।
पार्टी दफ्तरों में सन्नाटा, जोश गायब। मतदाता अब क्षेत्रीय दलों की तरफ झुक रहे हैं।

महागठबंधन की सामूहिक ताकत
जब सारे सहयोगी एकजुट होते हैं, तो असर दिखता है।
RJD के 70 से अधिक विधायकों के साथ अगर वामदल और कांग्रेस के वोट जुड़ें, तो महागठबंधन लगभग 140 सीटों की संभावित ताकत दिखाता है।
BJP के 125 सीटों वाले NDA को सीधी चुनौती मिल सकती है।
किसानों की नाराज़गी, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दे विपक्ष को मजबूत हथियार देते हैं।
साथ में, यह गठबंधन 40% वोट शेयर पर टिके रहने की कोशिश में है — जो उन्हें बहुमत की दहलीज़ तक ले जा सकता है।
जातीय समीकरण: Bihar की राजनीति की धुरी
Bihar के चुनावों में जाति सबसे बड़ा फैक्टर है।
RJD का मुस्लिम-यादव (MY) वोट बैंक लगभग 30% है।
JD(U) की पुरानी अपील कुर्मी और अति पिछड़े वर्गों में रही है।
कांग्रेस कुछ उच्च जातियों और शहरी मतदाताओं को जोड़ती है।
वामदल दलित और मजदूर वर्ग तक पहुंचते हैं।
इस तरह यह गठबंधन करीब 60% जातीय आधार पर दावा ठोक सकता है — जो NDA की गणित को चुनौती देता है।
साझा नेतृत्व और चुनावी रणनीति
महागठबंधन अब एकजुट चेहरों पर जोर दे रहा है।
तेजस्वी यादव की युवा अपील भीड़ खींचती है।
नीतीश कुमार, अगर फिर गठबंधन में लौटते हैं, तो अनुभव जोड़ सकते हैं।
संयुक्त रैलियाँ महंगाई, बेरोजगारी और शिक्षा के मुद्दों पर केंद्रित हैं।
सोशल मीडिया अभियान भी अब ग्रामीण इलाकों तक पहुंच रहा है।

हाल के उपचुनाव और संकेत
2022 के तरापुर उपचुनाव में महागठबंधन ने करीबी जीत दर्ज की।
2021 के स्थानीय निकाय चुनावों में RJD ने 100 से अधिक सीटें हासिल कीं, वामदलों ने भी बढ़िया प्रदर्शन किया।
इन नतीजों ने गठबंधन को आत्मविश्वास दिया है — जनता विकल्प देख रही है।
कांग्रेस: कमजोर कड़ी या ज़रूरी साथी?
कांग्रेस की स्थिति विरोधाभासी है।
वह महागठबंधन की कमजोर कड़ी भी है और एकता की धुरी भी।
संगठन की कमजोरी
बूथ एजेंट्स की कमी,
चुनाव दिन पर कार्यकर्ता नदारद,
सीमित फंडिंग, और
स्थानीय विवाद —
इन सबने पार्टी की मशीनरी को जकड़ रखा है।
2020 में कई सीटों पर कांग्रेस के बूथ ही खाली रहे।
टिकट बंटवारे की गुटबाज़ी
कांग्रेस में टिकट वितरण हमेशा विवाद का विषय रहा है।
देरी और अंदरूनी झगड़ों ने 2015 और 2020 दोनों में नुकसान पहुँचाया।
एक गुट उच्च जातियों के उम्मीदवारों को प्राथमिकता देता है, दूसरा वफादार पुराने कार्यकर्ताओं को।

नेताओं का पलायन
पार्टी से कई बड़े नाम जा चुके हैं।
साधु यादव (2019 में RJD में गए)
कुछ नेता JD(U) और BSP में शामिल हुए।
जनता में यह संदेश गया कि कांग्रेस लड़ने की इच्छाशक्ति खो चुकी है।
सहयोगियों पर अत्यधिक निर्भरता
कांग्रेस अब सीटों और रणनीति दोनों में RJD और JD(U) पर निर्भर दिखती है।
सीएम उम्मीदवार कौन होगा — यह फैसला कांग्रेस के हाथ में नहीं।
दिल्ली में नेता असंतोष जताते हैं, मगर गठबंधन छोड़ने का साहस नहीं दिखता।
क्यों कांग्रेस अब भी ज़रूरी है
कमज़ोरियों के बावजूद, कांग्रेस को हटाना महागठबंधन के लिए नुकसानदायक होगा।
1. पारंपरिक मुस्लिम और शहरी वोट
कांग्रेस का 5-7% वोट शेयर, खासकर मुस्लिम और शहरी वर्ग में, निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
करीबी मुकाबलों में यही वोट फर्क डालता है।
2. राष्ट्रीय स्तर पर धर्मनिरपेक्ष चेहरा
Bihar का चुनाव राष्ट्रीय संदेश भी देता है।
कांग्रेस “धर्मनिरपेक्षता” और “संविधान बचाने” की थीम लेकर चलती है।
इससे गठबंधन को राष्ट्रीय पहचान मिलती है, जो BJP की हिंदुत्व राजनीति का संतुलन बनाती है।
3. विपक्षी एकता का प्रतीक
कांग्रेस विपक्ष के लिए “कड़ी” है जो वामदल, RJD और अन्य क्षेत्रीय दलों को जोड़ती है।
बिना कांग्रेस के गठबंधन “स्थानीय” और सीमित दिखेगा।
आगे की राह: क्या कांग्रेस वापसी कर पाएगी?
महागठबंधन कागज़ पर मज़बूत दिखता है, लेकिन कांग्रेस की कमजोरियों पर ध्यान देना होगा।
अगर संगठन सुधरा, तो फायदा पूरे गठबंधन को मिलेगा।
कांग्रेस को करने होंगे ये कदम:
बूथ स्तर पर नई टीम तैयार करे।
युवा चेहरों को टिकट दे।
सहयोगियों के साथ जल्दी रणनीति तय करे।
शहरी और अल्पसंख्यक इलाकों पर फोकस करे।

भविष्य का अनुमान
अगर कांग्रेस ने मैदान में मेहनत की, तो महागठबंधन 150 सीटों के आसपास पहुंच सकता है।
अगर नहीं, तो NDA 130+ सीटों के साथ आगे निकल सकता है।
निर्णायक फैक्टर होंगे —
जातीय रुझान,
युवा वोट,
और मतदान प्रतिशत।
एकजुटता ही जीत की कुंजी
महागठबंधन के पास जनाधार और मुद्दे हैं, लेकिन कांग्रेस की सुस्ती सब बिगाड़ सकती है।
अगर वह संगठित होकर लौटे, तो NDA की मुश्किलें बढ़ेंगी।
बिहार की राजनीति का नियम साफ है —
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