‘दीदी’ नैरेटिव का उभार: ममता बनर्जी की मजबूती
1. west बंगाल से बाहर बढ़ती राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा
ममता बनर्जी ने हाल के वर्षों में खुद को केवल बंगाल की नेता तक सीमित नहीं रखा। केंद्र की नीतियों—विशेषकर संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकारों—पर उन्होंने खुलकर आवाज उठाई है।
उनका नारा “खेला होबे” अब सिर्फ राज्य तक सीमित नहीं, बल्कि भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती का प्रतीक बन गया है।
दिल्ली में विपक्षी नेताओं से मुलाकातें और साझा मंचों पर उनकी सक्रियता इस बात का संकेत देती है कि वे राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका चाहती हैं।
2. गैर-वंशवादी विकल्प की छवि
ममता बनर्जी की छवि एक जमीनी और संघर्षशील नेता की है। वे साधारण जीवनशैली और सीधे संवाद के लिए जानी जाती हैं।
इसके विपरीत, राहुल गांधी पर अक्सर वंशवाद की राजनीति का आरोप लगता है। यही कारण है कि कुछ विपक्षी दल ममता को अधिक “स्वतंत्र” और “निर्णायक” विकल्प मानते हैं।
3. चुनावी रिकॉर्ड
2021 के west बंगाल विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी, All India Trinamool Congress (TMC) ने 294 में से 213 सीटें जीतकर भाजपा को करारी शिकस्त दी।
2019 लोकसभा चुनाव में भी टीएमसी ने राज्य में मजबूत प्रदर्शन किया।
यह रिकॉर्ड ममता की चुनावी क्षमता को साबित करता है और उनके राष्ट्रीय दावे को बल देता है।

राहुल गांधी और कांग्रेस की चुनौती-west
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
Indian National Congress लंबे समय तक भाजपा के खिलाफ मुख्य विपक्षी शक्ति रही है। नेहरू-गांधी परिवार ने दशकों तक पार्टी का नेतृत्व किया।
हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को केवल 44 सीटें मिलीं, जिससे राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठे।
2. संगठनात्मक कमजोरी
कई राज्यों में कांग्रेस की जमीनी पकड़ कमजोर हुई है। west बंगाल में भी कांग्रेस की स्थिति सीमित है, जहां टीएमसी प्रमुख विपक्षी शक्ति है।
ऐसे में गठबंधन की राजनीति में कांग्रेस की “नेतृत्वकारी भूमिका” पर सवाल उठते हैं।
3. गठबंधन में खींचतान
विपक्षी एकता की कोशिशों में अक्सर नेतृत्व को लेकर मतभेद सामने आते हैं। कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर अगुवाई चाहती है, जबकि क्षेत्रीय दल बराबरी की भूमिका मांगते हैं।
यही टकराव विपक्षी रणनीति को कमजोर कर सकता है।
2026 बंगाल चुनाव: राष्ट्रीय राजनीति का परीक्षण-west
west बंगाल का चुनाव सिर्फ राज्य की सत्ता का सवाल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नेतृत्व की दिशा भी तय कर सकता है।

ममता के लिए अवसर
अगर टीएमसी 2026 में फिर बड़ी जीत दर्ज करती है, तो ममता बनर्जी विपक्षी गठबंधन में मजबूत दावेदारी पेश कर सकती हैं। यह उन्हें प्रधानमंत्री पद की संभावित उम्मीदवार के रूप में आगे ला सकता है।
भाजपा की रणनीति
Bharatiya Janata Party (BJP) ममता के राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को “राज्य के मुद्दों से ध्यान भटकाने” की कोशिश बताती है।
भाजपा “डबल इंजन सरकार” का नारा देकर राज्य और केंद्र में एक ही पार्टी की सरकार के फायदे गिनाती है।
गठबंधन गणित: क्या ममता के नेतृत्व में मोर्चा संभव?
भारत में गैर-कांग्रेसी मोर्चों का इतिहास मिला-जुला रहा है। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी, लेकिन अंदरूनी मतभेदों के कारण ज्यादा समय तक नहीं चल सकी।
आज भी क्षेत्रीय दल—जैसे दिल्ली में AAP या तमिलनाडु में DMK—अपने-अपने राज्यों में मजबूत हैं और नेतृत्व को लेकर समझौता आसान नहीं है।
ममता बनर्जी की सबसे बड़ी चुनौती यही है:
क्या वे कांग्रेस सहित अन्य दलों को साथ ला पाएंगी?
क्या विपक्ष एक संयुक्त चेहरा तय कर पाएगा?
फैसला जनादेश करेगा
ममता बनर्जी की प्रधानमंत्री पद की संभावनाएं 2026 के west बंगाल चुनाव परिणाम पर काफी हद तक निर्भर करती हैं।
वे एक मजबूत, आक्रामक और गैर-वंशवादी विकल्प के रूप में उभर रही हैं, जबकि राहुल गांधी अब भी कांग्रेस के पारंपरिक दावेदार हैं।
अंततः सवाल नेतृत्व का ही नहीं, बल्कि विपक्षी एकता और जनता के भरोसे का है।
क्या बंगाल से “नई राष्ट्रीय कहानी” शुरू होगी, या कांग्रेस फिर से केंद्र में भूमिका निभाएगी—इसका जवाब मतदाता ही देंगे।

