Manikarnika

Manikarnika ध्वस्तीकरण: प्रियंका गांधी ने इसे बताया ‘महापाप’, सच्ची प्रगति नहीं

वाराणसी की प्राचीन सीढ़ियों पर धूल के बादल उठे, जब बुलडोज़र Manikarnika घाट के हृदय में घुस पड़े। मशीनों की गड़गड़ाहट के बीच स्थानीय लोगों की चीखें गूंजती रहीं। यह पवित्र स्थल—जहां सदियों से हिंदू अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार करते आए हैं—अब जख्मी दिखता है। दिसंबर की ठंडी सुबह हुए इस ध्वस्तीकरण ने निवासियों को स्तब्ध कर दिया और प्रार्थनाएँ अनसुनी रह गईं।

Manikarnika घाट वाराणसी के सबसे प्राचीन स्थलों में से एक है। यह भगवान शिव और देवी Manikarnika की कथाओं से जुड़ा है और जीवन के अंत व आत्मा की मुक्ति का प्रतीक माना जाता है। अधिकारियों का कहना है कि असुरक्षित संरचनाओं को हटाकर शहर की आवाजाही और बाढ़ नियंत्रण बेहतर किया जा रहा है। लेकिन कांग्रेस की वरिष्ठ नेता प्रियंका गांधी ने इसे “महापाप” बताया। उनका तर्क है कि यह कदम खोखली विकास-योजनाओं के नाम पर सांस्कृतिक जड़ों को मिटा रहा है। उनके शब्दों ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है—क्या भारत आगे बढ़ सकता है, बिना अपने अतीत को खोए?

प्रियंका गांधी की मुख्य आपत्ति: विकास बनाम सांस्कृतिक मिटावट

प्रियंका गांधी की तीखी प्रतिक्रिया सिर्फ मलबे पर नहीं, बल्कि उस सोच पर है जो इतिहास को नज़रअंदाज़ करती है। उनके मुताबिक Manikarnika का ध्वस्तीकरण ईंट-पत्थर का नहीं, भारत की आत्मा का नुकसान है।

Manikarnika का नैतिक और ऐतिहासिक महत्व

Manikarnika घाट आध्यात्मिक जीवन से धड़कता है। यहां 2,000 से अधिक वर्षों से अनवरत अंतिम संस्कार और अनुष्ठान होते आ रहे हैं। मंदिर, छोटे-छोटे तीर्थ और अनगिनत पैरों से घिसी सीढ़ियाँ—सब मोक्ष की तलाश का हिस्सा हैं। ध्वस्त की गई इमारतों में पुरोहितों के आवास और कर्मकांड स्थल शामिल थे, जो दैनिक चिताओं से जुड़े थे।

प्रियंका गांधी इसे “महापाप” कहकर नैतिक चूक की ओर इशारा करती हैं। यह सिर्फ ढांचों का विनाश नहीं, बल्कि आस्था और पूर्वजों के सम्मान का अपमान है। उनका कहना है कि नेताओं ने त्वरित समाधान चुनकर अपने पवित्र कर्तव्य की अनदेखी की, जिससे समुदायों को जोड़ने वाली विरासत पर चोट पहुँची।

अतीत में भी ऐसे फैसलों पर विरोध हुआ है। 2018 में वाराणसी के घाटों के पास सड़क चौड़ीकरण के प्रस्ताव पर स्थानीय लोगों और इतिहासकारों ने बड़े प्रदर्शन किए थे, जिससे कई योजनाएँ रोकी गईं। प्रियंका गांधी की आलोचना उसी चेतावनी की पुनरावृत्ति है—कि गलतियाँ दोहराने से जनता का भरोसा टूटता है।

Priyanka Gandhi: Manikarnika Ghat Demolition Grave Sin | Kashi BJP Controversy

निर्णय के राजनीतिक निहितार्थ

विपक्ष इसे जल्दबाज़ नीतियों का उदाहरण बता रहा है। कांग्रेस, प्रियंका गांधी के नेतृत्व में, भाजपा पर बड़े प्रोजेक्ट्स को लोगों और विरासत से ऊपर रखने का आरोप लगा रही है। उनका बयान संतुलित विकास की मांग को और तेज़ करता है।

उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार और स्थानीय प्रशासन को सीधे निशाने पर लिया, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की टीम पर बिना पर्याप्त संवाद के निर्णय लेने का आरोप लगाया। इससे अधिकारियों पर दबाव बढ़ा है।

जन प्रतिक्रिया भी तीखी है। एक स्थानीय समाचार चैनल के त्वरित सर्वे में 68% वाराणसीवासियों ने इसे संस्कृति के लिए नुकसानदेह बताया। सोशल मीडिया पर #SaveManikarnika ट्रेंड करने लगा और कुछ ही दिनों में 50,000 से अधिक शेयर हुए। हालांकि कुछ शहरी तबके इस कदम का समर्थन भी कर रहे हैं, उनका कहना है कि भीड़भाड़ और सुरक्षा जोखिम कम होंगे।

तर्कों की पड़ताल: प्रगति या विनाश?

सरकार Manikarnika ध्वस्तीकरण को विकास की दिशा में कदम बता रही है, लेकिन आलोचकों के लिए यह दूरदर्शिता की कमी का उदाहरण है।

ध्वस्तीकरण का आधिकारिक तर्क

सरकार का कहना है कि रास्ते चौड़े करने और बाढ़-रोधी ढांचे बनाने के लिए यह ज़रूरी था। योजनाओं में तीर्थयात्रियों के लिए नए वॉकवे और बेहतर ड्रेनेज शामिल हैं। अधिकारियों का दावा है कि कई पुरानी इमारतें मानसून में गिरने का खतरा थीं।

एक 2024 की राज्य इंजीनियरिंग बोर्ड रिपोर्ट के अनुसार घाटों की लगभग 40% संरचनाएं असुरक्षित थीं। सरकार कहती है कि पुनर्निर्माण में आधुनिक जरूरतों और पवित्रता—दोनों का ध्यान रखा जाएगा।

विरासत संरक्षण के पक्ष में तर्क

विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्ण ध्वस्तीकरण के बजाय मरम्मत और सुदृढ़ीकरण संभव था। जोखिम वाले हिस्सों को स्थानांतरित कर मूल स्वरूप बचाया जा सकता था। इतिहासकार डिजिटल मैपिंग जैसे उपाय सुझाते हैं, जिससे बदलाव दर्ज रहते और विरासत सुरक्षित रहती।

उदाहरण मौजूद हैं—जयपुर का हवा महल शहर के विकास के साथ संरक्षित रहा और पर्यटन केंद्र बना। रोम के कोलोसियम के नीचे मेट्रो लाइनें चलीं, बिना प्राचीन धरोहर को नुकसान पहुँचाए। फिर मणिकर्णिका में ऐसा क्यों नहीं? प्रियंका गांधी यही सवाल उठाती हैं।

Priyanka Gandhi: Manikarnika Ghat Demolition Grave Sin | Kashi BJP Controversy

कानूनी और नैतिक पहलू

यह मामला नियमों और नैतिकता—दोनों पर सवाल उठाता है।

प्रक्रिया की निष्पक्षता और सूचना

कानूनी चुनौतियाँ तेज़ हैं। स्थानीय पुरोहितों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि बिना सार्वजनिक सुनवाई के आदेश दिया गया। पहले भी दिल्ली जैसे विरासत क्षेत्रों में अदालतों ने काम रोका है।

करीब 200 परिवार, जो पुरोहित आवासों में रहते थे, विस्थापित हुए हैं। सरकार ने प्रति इकाई लगभग 5 लाख रुपये मुआवज़े की बात कही है, लेकिन प्रभावितों का कहना है कि यह नाकाफी है और पुनर्वास में देरी हो रही है।

साझा इतिहास को नष्ट करने की नैतिकता

यूनेस्को जैसी संस्थाएँ ऐसे स्थलों के लिए कड़े मानक तय करती हैं। भारत का प्राचीन स्मारक अधिनियम 100 साल से अधिक पुराने ढांचों की सुरक्षा की बात करता है। इन्हें “अवैध अतिक्रमण” कहकर हटाना नैतिक रूप से सवालों के घेरे में है।

दार्शनिक अमर्त्य सेन के अनुसार, सरकारों का दायित्व है कि वे सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करें। प्रियंका गांधी की बात इसी नैतिक तर्क को बल देती है।

आगे का रास्ता: विरासत समर्थकों के लिए कदम

प्रियंका गांधी ने सिर्फ आलोचना नहीं की, बल्कि कार्रवाई की मांग भी की है।

प्रियंका गांधी और सहयोगियों की मांगें

उन्होंने न्यायिक जांच, पवित्र स्थलों के आसपास ऐसे कदमों पर रोक और स्पष्ट नियमों की मांग की है। कांग्रेस वाराणसी में जागरूकता अभियान चला रही है।

हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों में 5,000 लोग जुटे। ऑनलाइन याचिकाओं पर 1 लाख से अधिक हस्ताक्षर हो चुके हैं। एनजीओ के साथ मिलकर समुदाय संवाद की कोशिशें शुरू हुई हैं।

Priyanka Gandhi: Manikarnika Ghat Demolition Grave Sin | Kashi BJP Controversy

नागरिक क्या कर सकते हैं: व्यावहारिक सुझाव

1. स्थानीय विरासत का दस्तावेज़ीकरण करें
अपने शहर की पुरानी इमारतों की तस्वीरें लें, उनकी कहानियाँ और महत्व दर्ज करें। INTACH जैसी संस्थाओं से साझा करें। Heritage Mapper जैसे ऐप मददगार हो सकते हैं।

2. स्थानीय प्रतिनिधियों से संवाद करें
अपने विधायक या नगर निगम प्रतिनिधि को पत्र लिखें। पड़ोसियों के हस्ताक्षर जोड़ें। जनसुनवाई और बैठकों में आवाज़ उठाएँ। लगातार प्रयास असर दिखाते हैं।

Manikarnika बहस की दीर्घकालिक छाप

Manikarnika का विवाद दिल और जल्दबाज़ी के बीच की टकराहट है। प्रियंका गांधी का “महापाप” कहना इस बात को उजागर करता है कि कैसे ध्वस्तीकरण सांस्कृतिक गहराई को नुकसान पहुँचा सकता है। विकास ज़रूरी है, लेकिन उसकी कीमत जड़ों से कटना नहीं होनी चाहिए।

स्पष्ट है कि विरासत पहचान और पर्यटन—दोनों को संबल देती है। भारत के घाट हर साल लाखों लोगों को आकर्षित करते हैं और अर्थव्यवस्था को मज़बूती देते हैं। राजनीतिक दबाव बेहतर नियंत्रण और जनभागीदारी की माँग करता है।

आख़िरकार सवाल यही है—क्या हम आने वाली पीढ़ियों को खोखली जगहें देंगे या जीवित विरासत? अपनी आवाज़ उठाइए। उन स्थलों के लिए खड़े होइए जो हमारी कहानी कहते हैं। आज कार्रवाई करें—आपकी आवाज़ वही फिर से खड़ी कर सकती है, जिसे मशीनों ने गिराया।

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