मोदी सरकार की स्वच्छ पानी और स्वच्छ हवा में विफलता: Mallikarjun खड़गे ने जनता की पीड़ा को किया उजागर
कल्पना कीजिए कि आप सुबह उठते हैं और चारों ओर इतनी घनी स्मॉग होती है कि सांस लेना मुश्किल हो जाए। या नल खोलते ही ऐसा गंदला पानी निकले जिसे पीना तो दूर, छूना भी बीमारी बुलावा हो। आज भारत में करोड़ों लोगों के लिए यही रोज़मर्रा की सच्चाई है। विपक्ष के नेता Mallikarjun खड़गे ने हाल ही में मोदी सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा कि सरकार न तो स्वच्छ पानी दे पाई है और न ही स्वच्छ हवा—और इसकी कीमत आम जनता अपनी सेहत से चुका रही है।
उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब देश पर्यावरणीय संकट से जूझ रहा है। यह लेख खड़गे की आलोचना को तथ्यों के साथ परखता है—सरकारी वादों, योजनाओं, आंकड़ों और ज़मीनी हकीकत को सामने रखते हुए। 2026 की शुरुआत में हालात वास्तव में कहाँ खड़े हैं, आइए समझते हैं।
स्वच्छ जल संकट: पहुंच और गुणवत्ता दोनों पर सवाल-Mallikarjun
पानी जीवन की बुनियादी ज़रूरत है, कोई जोखिम नहीं। लेकिन खड़गे के मुताबिक मोदी सरकार इस मोर्चे पर लगातार असफल रही है।
जल जीवन मिशन (JJM): दावों और हकीकत का अंतर
जल जीवन मिशन का लक्ष्य था 2024 तक हर ग्रामीण घर में नल से जल पहुंचाना। सरकार के अनुसार 2025 के अंत तक 14 करोड़ से ज़्यादा कनेक्शन दिए गए। लेकिन ज़मीनी रिपोर्ट्स कुछ और ही कहानी बताती हैं।
कई घरों में नल तो लगे हैं, लेकिन पानी दिन में कुछ घंटों के लिए ही आता है। राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों में सर्वे बताते हैं कि 30–40% नल अक्सर सूखे रहते हैं। खड़गे इसे “खोखला वादा” बताते हैं—जहाँ संख्या है, पर सुविधा नहीं।
स्वतंत्र संस्थाओं की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में केवल 60% कनेक्शन ही पानी की गुणवत्ता के मानकों पर खरे उतरते हैं। नतीजा—ग्रामीणों में गहरा असंतोष।
पानी की गुणवत्ता और प्रदूषण की गंभीर समस्या
स्वच्छ पानी का मतलब ज़हर-मुक्त पानी। लेकिन 2025 की रिपोर्ट्स बताती हैं कि गुजरात और पश्चिम बंगाल में भूजल में फ्लोराइड और आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर पर है।
राष्ट्रीय जल गुणवत्ता कार्यक्रम के तहत जांच होती है, लेकिन सिर्फ़ लगभग 20% ज़िलों में नियमित परीक्षण हो पाता है। इससे करोड़ों लोग अनजाने में त्वचा रोग, हड्डी की कमजोरी और कैंसर जैसे जोखिम उठाते हैं।

महाराष्ट्र में औद्योगिक कचरे से नदियों में भारी धातुएँ मिल रही हैं। खड़गे का आरोप है कि सरकार चेतावनियों को नज़रअंदाज़ कर रही है। मजबूरी में लोग पानी उबालते हैं या महंगे फ़िल्टर खरीदते हैं—जिसका बोझ आम आदमी पर पड़ता है।
भूजल का तेज़ी से गिरता स्तर
भारत की ज़्यादातर पानी की ज़रूरत भूजल से पूरी होती है, लेकिन यह तेज़ी से खत्म हो रहा है। पंजाब में 2014 से हर साल भूजल स्तर 1–2 मीटर तक गिर रहा है।
अटल भूजल योजना के बावजूद 2025 के सैटेलाइट डेटा दिखाते हैं कि हालात में सुधार नहीं हुआ। किसान और गहरे बोरवेल खोदते हैं, लागत बढ़ती है और ज़मीन धंसने का खतरा रहता है।
खड़गे इसे दीर्घकालिक नीति की विफलता बताते हैं। जब तक कृषि में अत्यधिक जल उपयोग (जो 80% पानी खपत करता है) नहीं रोका जाएगा, संकट बढ़ता रहेगा। गर्मियों में गंगा जैसी नदियाँ भी सूख जाती हैं।
वायु प्रदूषण: लगातार गहराता साया
हवा का प्रदूषण शहरों से लेकर गांवों तक फैल चुका है। खड़गे का कहना है कि मोदी सरकार के दावे ज़मीन पर असर नहीं दिखा रहे।
एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) के डरावने आंकड़े
दिल्ली में सर्दियों के दौरान AQI अक्सर 400 के पार चला जाता है—“गंभीर” श्रेणी में। 2025 में NCR में ऐसे 100 दिन रहे, जबकि 2019 में यह संख्या 80 थी। मुंबई और कोलकाता में भी साल के आधे समय हवा “खराब” रहती है।
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) का लक्ष्य 2024 तक प्रदूषण 20–30% घटाना था, लेकिन CPCB के आंकड़े बताते हैं कि अधिकांश शहरों में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ।
यह सिर्फ़ आंकड़े नहीं—बल्कि बच्चों की खांसी, बुज़ुर्गों की सांस की दिक्कत और अस्पतालों की भीड़ है।
वाहन और उद्योग प्रदूषण पर ढीली पकड़
BS-VI मानक लागू होने के बावजूद पुराने वाहन सड़कों पर बने हुए हैं। दिल्ली में 2025 तक 40% वाहन अब भी ज़्यादा प्रदूषण फैलाते हैं।
कानपुर जैसे औद्योगिक शहरों में कई फैक्ट्रियाँ प्रदूषण नियंत्रण उपकरण नहीं लगातीं। जुर्माने लगते हैं, लेकिन वसूली कमजोर है। खड़गे इसे “स्वास्थ्य से ज़्यादा उद्योग को तरजीह” बताते हैं।
इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रचार है, लेकिन चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर अभी सिर्फ़ 10% ज़रूरत ही पूरा करता है।

पराली जलाना और मौसमी प्रदूषण
हर साल पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने से दिल्ली-एनसीआर की हवा जहरीली हो जाती है। 2025 में 50,000 से ज़्यादा आग की घटनाएँ दर्ज हुईं—लगभग पिछले वर्षों जैसी ही।
सरकार मशीनें और सब्सिडी देती है, लेकिन किसानों का कहना है कि लागत ज़्यादा और मशीनें अव्यवहारिक हैं। खड़गे सवाल उठाते हैं कि बायो-एनर्जी जैसे विकल्पों को तेज़ी से क्यों नहीं बढ़ाया गया।
इस प्रदूषण से स्कूल बंद होते हैं और अस्पताल भर जाते हैं—सबसे ज़्यादा असर बच्चों और बुज़ुर्गों पर पड़ता है।
नीति, बजट और जवाबदेही की कमी
बजट और खर्च का अंतर
2025 में जल योजनाओं के लिए ₹60,000 करोड़ आवंटित हुए, लेकिन सिर्फ़ 70% खर्च हो पाया। वायु कार्यक्रमों के लिए ₹10,000 करोड़ मिले, पर कई शहरों में मॉनिटरिंग सिस्टम तक नहीं लगे।
राज्यों के बीच समन्वय की कमी
यमुना या गंगा की सफाई जैसे मामलों में राज्यों के बीच आरोप-प्रत्यारोप चलते रहते हैं। नमामि गंगे के तहत 2025 तक सिर्फ़ 40% सीवेज का ही उपचार हो पाया।
नियामक संस्थाओं की कमजोरी
CPCB और NGT जैसी संस्थाएँ स्टाफ की कमी और केसों के बोझ से जूझ रही हैं। खड़गे का आरोप है कि सरकार ने निगरानी संस्थाओं को कमजोर किया है।
जनस्वास्थ्य और आर्थिक बोझ
स्वास्थ्य पर असर
2025 के अध्ययनों के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 20 लाख असमय मौतें वायु प्रदूषण से जुड़ी हैं। बच्चों में अस्थमा और सांस की बीमारियाँ 15% बढ़ी हैं। दूषित पानी से हर साल 10 करोड़ से ज़्यादा लोग बीमार पड़ते हैं।

आर्थिक नुकसान
प्रदूषण से स्वास्थ्य खर्च ₹5 लाख करोड़ सालाना तक पहुँच गया है। उत्पादकता में कमी से GDP को लगभग 3% नुकसान होता है। गरीब और कमजोर वर्ग सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं।
नागरिक पहल और जमीनी प्रयास
सरकारी कमी के बावजूद लोग हार नहीं मान रहे। राजस्थान के कुछ गांवों ने सोलर पंप लगाए। दिल्ली में AQI ऐप से लोग प्रदूषण वाले दिन सावधानी बरतते हैं। पंजाब में किसान बिना पराली जलाए खेती के प्रयोग कर रहे हैं।
लेकिन सवाल वही है—जब जनता कर सकती है, तो सरकार क्यों नहीं?
पर्यावरण शासन से उम्मीदों का पुनर्मूल्यांकन
Mallikarjun खड़गे की आलोचना सिर्फ़ राजनीति नहीं, बल्कि ज़मीनी सच्चाई की आवाज़ है। जल जीवन मिशन की अधूरी सफलता, गिरता भूजल, जहरीली हवा और कमजोर निगरानी—सब मिलकर जनता की पीड़ा बढ़ा रहे हैं।
स्वच्छ हवा और पानी कोई उपकार नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार हैं। सरकार को बजट बढ़ाना होगा, नियम सख़्ती से लागू करने होंगे और राज्यों के बीच समन्वय मजबूत करना होगा।
पाठकों से अपील है—जवाबदेही मांगें, स्थानीय प्रयासों में शामिल हों, और आवाज़ उठाएँ। असली बदलाव तब आएगा जब वादे कागज़ से निकलकर ज़मीन पर उतरेंगे।
Uttarakhand के मुख्यमंत्री धामी ने सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के लिए 100 नई बसों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।
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