-शकरपुर में झुग्गियां तोड़ने के मामले में कोर्ट ने की टिप्पणी
नई दिल्ली, 03 अगस्त उच्च न्यायालय ने कहा है कि नोटिस जारी किए किसी को बुलडोजर से जबरन
बेघर नहीं किया जा सकता है।
न्यायालय ने शकरपुर इलाके में रातोंरात झुग्गियां हटाने की डीडीए की कार्रवाई पर
यह टिप्पणी की। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने अपने फैसले में कहा,
कार्रवाई से लोगों का अपना पक्ष रखने, जरूरी
सामान और दस्तावेज निकालने के लिए उचित समय दिया जाना चाहिए।
तोड़फोड़ से पहले लोगों को रहने के लिए
अस्थायी आवास भी प्रदान किया जाना चाहिए।
उच्च न्यायालय ने कहा है कि डीडीए को अतिक्रमण हटाने से पहले दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डूसिब) के
परामर्श से कार्य करना है। लोगों को पूर्व सूचना या नोटिस जारी किए बगैर सुबह या देर शाम को बुलडोजर नहीं
चलाया जा सकता, जिससे कि वे बेघर हो जाएं। न्यायालय शकरपुर स्लम यूनियन ने याचिका दायर कर कहा था
कि डीडीए ने पिछले साल 25 जून को बिना किसी नोटिस करीब 300 झुग्गियों को ध्वस्त कर दिया। लोगों को
अपने सामान और जरूरी दस्तावेज तक नहीं लेने दिए गए ताकि वे झुग्गी का निवासी होने का अपना दावा साबित
कर सकें।
हालांकि, अदालत ने मामले में डूसिब की नीति के तहत पुनर्वास के लिए सर्वे करने का आदेश देने से इनकार कर
दिया। न्यायालय ने एनजीटी के आदेश के मद्देनजर इस मामले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। साथ ही
याचिकाकर्ता को यह साबित करने की छूट दी है कि वह साबित करे कि वे डूसिब नीति के तहत पुनर्वास का लाभ
पाने के हकदार हैं।
मानसून में न हो कार्रवाई : न्यायालय ने डीडीए को आदेश दिया है कि भविष्य में इस तरह के मामले में तोड़फोड़
की कार्रवाई में डूसिब नीति अपनाने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने यह आदेश तब दिया जब डूसिब ने कहा कि
वह मानसून या शैक्षणिक सत्र के अंत में झुग्गियों को तोड़ने की कार्रवाई नहीं करता। आमतौर पर कार्रवाई मार्च से
जून और अगस्त से अक्तूबर में किया जाता है।

