संसदीय मैत्री समूह: उद्देश्य और कार्यप्रणाली
1. संसदीय कूटनीति का विकास
पहले सांसदों के बीच अंतरराष्ट्रीय संवाद सीमित और अवसर-आधारित होते थे—जैसे संयुक्त राष्ट्र सम्मेलनों या बहुपक्षीय बैठकों में।
अब इन मैत्री समूहों के माध्यम से नियमित, संरचित और विषय-विशेष वार्ताएं संभव होंगी।
भारत की वैश्विक भूमिका—जैसे G20 की मेजबानी—ने इस तरह की पहल को और प्रासंगिक बना दिया है। सांसद अब व्यापार, जलवायु परिवर्तन, डिजिटल सुरक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर सीधे संवाद कर सकते हैं।
2. संरचना और संचालन
प्रत्येक समूह एक विशेष देश या क्षेत्र पर केंद्रित होगा।
लोकसभा सचिवालय इनका समन्वय करेगा।
सदस्यों का चयन अनुभव और दलगत संतुलन के आधार पर किया जाएगा।
बैठकें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग या प्रत्यक्ष दौरे के माध्यम से होंगी।
इन समूहों के माध्यम से:
विधायी अनुभवों का आदान-प्रदान
संयुक्त वेबिनार और अध्ययन यात्राएं
नीतिगत रिपोर्ट साझा करना
संभव होगा।

प्रमुख नेताओं की भूमिका-Om
शशि थरूर: वैश्विक दृष्टिकोण
शशि थरूर अपने कूटनीतिक अनुभव और अंतरराष्ट्रीय समझ के कारण यूरोप और अमेरिका से जुड़े समूहों में अहम भूमिका निभा सकते हैं। उनकी विशेषज्ञता भारत की वैश्विक छवि को मजबूत करने में सहायक है।
असदुद्दीन ओवैसी: समावेशी संवाद
ओवैसी मुस्लिम बहुल देशों के साथ संवाद में सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण जोड़ सकते हैं। इससे भारत की विविधता और लोकतांत्रिक मूल्यों का संदेश मजबूत होता है।
निशिकांत दुबे: आर्थिक और क्षेत्रीय सहयोग
दुबे पड़ोसी देशों, विशेषकर बांग्लादेश जैसे राष्ट्रों के साथ आर्थिक और विकास सहयोग पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।
इन नेताओं की भागीदारी यह दर्शाती है कि भारत की संसदीय कूटनीति दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित पर केंद्रित है।
संभावित प्रभाव-Om
1. विधायी तालमेल (Legislative Harmonization)
यूरोपीय संघ से डेटा सुरक्षा कानूनों की सीख
ऑस्ट्रेलिया से जलवायु अनुकूलन रणनीतियां
ASEAN देशों से व्यापार सहयोग मॉडल
इस प्रकार के आदान-प्रदान से भारतीय कानूनों और नीतियों को आधुनिक बनाने में मदद मिल सकती है।
![]()
2. सॉफ्ट पावर में वृद्धि-Om
जब सांसद सीधे विदेशी संसदों से संवाद करते हैं, तो यह विश्वास और समझ को बढ़ाता है।
यह संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर भारत को समर्थन दिलाने में सहायक हो सकता है।
भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली, महिला सशक्तिकरण योजनाएं और डिजिटल नवाचार—इन सबका प्रचार संसदीय स्तर पर प्रभावी ढंग से हो सकता है।
चुनौतियां
अलग-अलग राजनीतिक प्रणालियों के साथ तालमेल
वैचारिक मतभेद
केवल चर्चा तक सीमित न रहकर ठोस परिणाम लाना
इन समूहों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कितनी बैठकों से वास्तविक नीतिगत बदलाव निकलते हैं।
सफलता कैसे मापें?-Om
क्या संयुक्त घोषणाएं या समझौते होते हैं?
क्या किसी विदेशी मॉडल से प्रेरित होकर नया कानून बनता है?
क्या सांसदों के दौरे से व्यापार या सहयोग बढ़ता है?
परिणाम आधारित मूल्यांकन ही इन समूहों की वास्तविक प्रभावशीलता बताएगा।
![]()
सक्रिय संसदीय कूटनीति की नई शुरुआत-Om
Om बिरला की यह पहल भारत को एक सक्रिय, संवाद-प्रधान और सहयोगी राष्ट्र के रूप में स्थापित करती है।
यह न केवल विदेश नीति को मजबूती दे सकती है, बल्कि संसद को वैश्विक विमर्श का महत्वपूर्ण मंच भी बना सकती है।
यदि यह पहल निरंतर और परिणामोन्मुखी रहती है, तो भारत की अंतरराष्ट्रीय स्थिति और सॉफ्ट पावर दोनों को दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है।
आपको क्या लगता है—कौन सा क्षेत्र भारत की संसदीय कूटनीति के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है?

