Kumbh क्षेत्रों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध की मांग पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने क्या कहा
गंगा किनारे टेंटों का विशाल समंदर, मंत्रोच्चार और करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था—यही है Kumbh मेले की पहचान, जो दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में गिना जाता है। लेकिन हाल के दिनों में उत्तराखंड में कुंभ क्षेत्रों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध की मांग ने बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विमर्श छेड़ दिया है।
यह मांग कुछ स्थानीय संगठनों की ओर से उठी है, जिनका कहना है कि Kumbh की “पवित्रता” बनाए रखने के लिए ऐसे कदम जरूरी हैं। इस पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने संतुलित और संवैधानिक रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि राज्य सभी धर्मों का सम्मान करता है और किसी भी तरह का फैसला संविधान और कानून के दायरे में ही लिया जाएगा।
Kumbh जैसे आयोजन में, जहां हर कुछ वर्षों में 10 करोड़ से अधिक श्रद्धालु आते हैं, यह बहस आस्था, अधिकार और प्रशासनिक प्रबंधन—तीनों से जुड़ी है।
पृष्ठभूमि: Kumbh क्षेत्रों में प्रतिबंध की मांग क्यों उठी?
हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे धार्मिक नगरों पर Kumbh के दौरान भारी दबाव पड़ता है। स्थानीय लोगों का एक वर्ग मानता है कि बाहरी लोगों की बढ़ती मौजूदगी से धार्मिक माहौल प्रभावित होता है।
ऐतिहासिक संदर्भ और मौजूदा संवेदनशीलता
हरिद्वार में बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान पहले भी तनाव की घटनाएं सामने आती रही हैं। 1954 के कुंभ में हुई भगदड़, जिसमें सैकड़ों लोगों की मौत हुई थी, आज भी लोगों की स्मृति में है। ऐसे हादसों का हवाला देकर कुछ संगठन कड़े प्रतिबंधों की मांग करते हैं।
हाल के वर्षों में धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ योग, एडवेंचर और विदेशी पर्यटकों की संख्या भी बढ़ी है। 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, तीर्थ स्थलों पर गैर-स्थानीय पर्यटकों की संख्या में करीब 20% की बढ़ोतरी हुई है, जिससे सामाजिक और सांस्कृतिक टकराव की आशंकाएं बढ़ी हैं।

“Kumbh क्षेत्र” की कानूनी परिभाषा
Kumbh क्षेत्र मुख्य रूप से हरिद्वार जिले में गंगा नदी के तट और उससे जुड़े इलाकों को शामिल करता है। मेले के दौरान इन क्षेत्रों को “संवेदनशील धार्मिक क्षेत्र” घोषित किया जाता है। यहां आवाजाही पर नियंत्रण होता है, लेकिन सार्वजनिक प्रवेश पूरी तरह बंद नहीं किया जाता।
राज्य सरकार अस्थायी नक्शों, ज़ोन और परमिट व्यवस्था के जरिए भीड़ नियंत्रण करती है, ताकि किसी एक समुदाय को लक्षित किए बिना व्यवस्था बनी रहे।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का रुख: क्या कहा, क्या संकेत दिए?
जनवरी 2026 में एक प्रेस वार्ता के दौरान मुख्यमंत्री धामी से सीधे सवाल किया गया कि क्या Kumbh क्षेत्रों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगेगा।
मुख्यमंत्री के बयान के प्रमुख बिंदु
मुख्यमंत्री ने कहा,
“हम अपनी परंपराओं और आस्था का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन किसी को भी केवल धर्म के आधार पर प्रवेश से रोका नहीं जा सकता। राज्य सरकार हर कदम संविधान और कानून के तहत ही उठाएगी।”
मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से बाद में जारी स्पष्टीकरण में भी कहा गया कि सरकार की प्राथमिकता व्यवस्थाओं और लॉजिस्टिक्स को बेहतर करना है, न कि किसी वर्ग को बाहर करना।
कानूनी और संवैधानिक पहलू
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है, जबकि अनुच्छेद 19 देश में कहीं भी आने-जाने का अधिकार सुनिश्चित करता है। ऐसे में धर्म के आधार पर प्रतिबंध कानूनी रूप से टिक पाना मुश्किल माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मुख्यमंत्री का बयान संभावित कानूनी चुनौतियों से बचने और सामाजिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश है।

राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं
मुख्यमंत्री के बयान के बाद राजनीतिक हलकों में प्रतिक्रियाएं तेज हो गईं।
विपक्षी दलों ने इसे “स्पष्ट निर्णय से बचने” वाला बयान बताया।
बीजेपी के सहयोगी दलों ने इसे संतुलित और संविधानसम्मत रुख कहा।
कुछ संत-महंतों ने प्रतिबंध का समर्थन किया, जबकि कई प्रमुख धार्मिक नेताओं ने समावेशिता पर जोर दिया।
नागरिक संगठनों और अल्पसंख्यक समूहों ने किसी भी तरह के धार्मिक भेदभाव का विरोध किया।
देहरादून और हरिद्वार में छोटे-मोटे प्रदर्शन भी देखने को मिले, जिनमें समान अधिकारों की मांग उठी।
दो दृष्टिकोण: स्थानीय चिंताएं बनाम संवैधानिक अधिकार
प्रतिबंध के पक्ष में तर्क
समर्थकों का कहना है कि Kumbh मूल रूप से हिंदुओं का धार्मिक आयोजन है और बाहरी या गैर-हिंदू उपस्थिति से धार्मिक अनुशासन भंग होता है।
उनका तर्क है कि सीमित संसाधनों, पानी और जगह पर भारी भीड़ का दबाव पड़ता है, जिससे जोखिम बढ़ता है।
संविधान और धर्मनिरपेक्षता का पक्ष
दूसरी ओर, कानून और न्यायपालिका का रुख साफ है कि सार्वजनिक धार्मिक स्थलों पर धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले—जैसे सबरीमाला मामला—समावेशिता और समान अधिकारों को प्राथमिकता देते हैं।

समाधान की राह: प्रतिबंध नहीं, बेहतर प्रबंधन
उत्तराखंड सरकार पहले से ही Kumbh प्रबंधन में तकनीक का इस्तेमाल कर रही है—ड्रोन निगरानी, भीड़ नियंत्रण ऐप, अस्थायी पुल और स्वास्थ्य शिविर। 2019 के Kumbh में इन्हीं उपायों से बड़े हादसे टाले जा सके थे।
अन्य तीर्थ स्थलों से भी सीख ली जा सकती है:
अमरनाथ यात्रा में रजिस्ट्रेशन सिस्टम
वाराणसी में संख्या आधारित नियंत्रण
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हज प्रबंधन में एआई तकनीक
ये उपाय बिना किसी धार्मिक भेदभाव के व्यवस्था बनाए रखते हैं।
उत्तराखंड में तीर्थ प्रबंधन का भविष्य
Kumbh क्षेत्रों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर बहस आस्था और संविधान के बीच संतुलन की परीक्षा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का बयान स्पष्ट संकेत देता है कि सरकार टकराव के बजाय कानून और समावेशिता का रास्ता अपनाना चाहती है।
आने वाले समय में, खासकर 2028 के कुंभ से पहले, सरकार से बेहतर योजना, संवाद और तकनीकी समाधान की उम्मीद की जा रही है।
यह बहस सिर्फ Kumbh तक सीमित नहीं है—यह भारत की धर्मनिरपेक्ष आत्मा और परंपराओं के सहअस्तित्व से जुड़ी है। परंपराएं तब और मजबूत होती हैं, जब वे सभी के लिए खुली और सुरक्षित हों।
Mallikarjun खर्गे का कहना है कि मोदी सरकार न तो स्वच्छ पानी दे सकी और न ही स्वच्छ हवा, जिससे जनता को परेशानी झेलनी पड़ रही है।
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