बेशक 8 मार्च 2022 को विश्व महिला दिवस मनाया गया जा रहा है। विश्व महिला दिवस 2022 की थीम जंेडर
इक्वालिटि टुडे फार ए सस्टेनेबल टुमारो यानी एक स्थायी कल के लिए लैंगिक समानता रखी गई है।साथ ही इस
बार महिला दिवस का रंग पर्पल ग्रीन और सफेद भी तय किया गया है।
जिसमें पर्पल न्याय और गरिमा का प्रतिक
है।जबकि हरा रंग उम्मीद और सफेद रंग शु़द्वता से जुडा़ आज महिला दिवस पर ऐसे आयोजन केवल मात्र
औपचारिकता भर रह गए है
क्योंकि हर वर्ष एक संकल्प लिया जाता है कि महिलाओं कों अत्याचारों से मुक्ति
दिलाई जाएगी अत्याचारों का खात्मा किया जाएगा सुरक्षा के लिए बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं मगर धरातल की
सच्चाईयां बेहद ही खौफनाक तस्वीरें प्रस्तूत कर रही है।
है।साल 1910 में कोपेनहेगन मे कामकाजी महिलाओं द्वारा
एक सम्मेलन का आयोजन किया गया था।जिसमें 8 मार्च को विश्व महिला दिवस के तौर पर हर साल मनाने का
सुझाव दिया गया था।
तभी से विश्व महिला दिवस मनाया जाने लगा है। सबसे पहले 1911 में आस्टरिया ,डेनमार्क,
जर्मनी औा स्विटजरलैंड में विश्व महिला दिवस मनाया गया था।आज महिलाएं हर क्षेत्र में सफलता की बुलंदियां छु
रही हैं चांद तक अपनी काबलियत का परचम लहरा रही है।
महिलाओं की सुरक्षा के लिए सैंकड़ों कड़े कानून बनाए
गए है मगर यह कानून सरकारी फाईलों की धूल चाट रहे है अगर सही तरीके से लागू किए होते तो इन मामलों में
इजाफा नहीं होता।आज महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं है
चाहे घर हो दफतर हो,बस,सड़क ,गली या चैराहा हो
महिलाएं हर जगह असुरक्षित ही महसूस कर रही है।प्रतिदिन हैॅवानियत की हदें लांघी जा रही है महिलाओं की
अस्मिता का जनाजा निकाला जा रहा है।कश्मीर से कन्याकुमारी तक मंहिलाएं असुरक्षित है।
आज हर जगह दुशासन
महिलाओं की इज्जत नीलाम कर रहे हैं।विश्व गुरु हलाने वाले भारत में महिलाओं पर जुल्मों की सूची लम्बी होती
जा रही हैं।
जब देश की राष्ट्रीय राजधानी ही सुरक्षित नहीं है तो महानगरों व छोटे कस्बों का क्या हाल होगा इससे
अदांजा लगाया जा सकता है।
2020 में लाॅकडाउन के समय महिलाएं संुरक्षित थी मगर ज्यों ही लाॅकडाउन खुल गया
हैवानों ने हैवानियत शुरु कर दी थी।2021 में भी दरिदगी की हदें पार होती रही थी।आधी दुनिया पर बढतें
अत्याचार देंश के लिए अशुभ संकेत है।
वर्ष 2022 में भी हालात सुधर नहीं रहे है देश में बेटियां हर जगह असुरक्षित
महसूस कर रही हैं।बेटियों की सुरक्षा के दावे कहां है।यह एक यक्ष प्रशन है यह सुलगते प्रशन है कि बेटियां कब
सुरक्षित होगी। साल के 365 दिन महिलाओं पर अत्याचार होते रहते हैं।
आज महिलाओं पर अनगिनत अत्याचार हो
रहे है मगर सरकारों की कुम्भकरणी नींद नहीं टूट रही है। आज कोई भी विश्वास के योग्य नहीं रहा है किस पर
विशवास करें अपने ही हैवान बन रहे हैं।आज बाबुल की गलियां ही नरक बन गई हैं।
अपने रक्षक ही भक्षक बन
गए हैं बहु-बेटियां घर में ही असुरक्षित हैं समय≤ पर ऐसे घिनौने कर्म होंतें है कि कायनात कांप उठती है कि
आदमी इतने नीच काम क्यों कर रहा है। महिलाएं कही भी महफूज नहीं है।
महिलाओं पर बढते अत्याचार रुकने का
नाम नहीं ले रहे है। देश में प्रतिदिन घटित हो रही वारदातों से महिलाओं की सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह लगता जा रहा है
कि महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं है।इन वारदातों से हर भारतीय उद्वेलित है।सुरक्षा के दावों की पोल खुल गई
है।महिलाओं की सुरक्षा के लिए पुख्ता इतंजाम करने होगें तभी इन पर रोक लग सकती है। जघन्य व दिल दहला
देने वाली दुष्कर्म की घटनाओं से जनमानस खौफजदा है।आखिर कब तक बेटियां दरिदगी का शिकार होती रहेगी।
ऐसी बारदातें बहुत ही चिंतनीय हैं।बेखौफ दरिदें अराजकता फैला रहे है दरिदों की दरिदगी की वारदातें कब
रुकेगी,अपराध की तारीख बदल जाती है ,मगर तस्वीर नहीं बदलती।आंकड़ों के अनुसार 12 सितंबर 2018 को
हरियाणा के रेवाड़ी में एक 19 साल की मेधावी छात्रा से सामूहिक दुष्कर्म कर दिया था।
27 जून 2018 को
मध्यप्रदेश के मंदसौर में एक सात साल की नाबालिग स्कली बच्ची से सामूहिक दुष्कर्म की जघन्य घटना से हर
भारतीय उद्वेलित हुआ था।यह बच्ची तीसरी में पढ़ती थी।
मासूम से हुई दरिदगी व हैवानियत की यह घटना बहुत ही दिल दहलाने वाली थी। दरिदों ने जिस बर्बरता व
हैवानियित से घटना को अंजाम दिया था उससे रौगटे खडे हो जाते है।
दरिदों ने दरिदंगी की हदे पार कर दी थी।
16 दिसंबर 2012 सामूहिक दुष्कर्म करने वाले दुष्कर्म की वारदात से हर भारतीय उद्वेलित हुआ था।यह रौंगटे खड़े
कर देने वाली घटना बहुत ही दुखद थी।हर रोज अस्मत लूटी जा रही है।दरिदों द्वारा हर राज्य में दरिदगी का
सामाज्य बना रहे है।दरिदों की अराजकता बढ़ती ही जा रही है।जंगलराज स्थिितियां बन रही
है।कानून को धता बताकर दरिदें दरिदगी का तांडव कर रहे है। दरिदों को सरेआम मौत के घाट उतारना हागा ताकि
आने वाले समय में दरिदे कई बार सोचेगें की उनकी करतूतो का क्या अंजाम होगा।
अब समय आ गया है कि
दरिदों को फांसी की सजा से ही इन मामलों पर विराम लग सकता है।
वर्ष 2021 के जनवरी माह से देश के हर
राज्य में इन मामलों में बेतहासा वृद्धि होती जा रही है।साल के दो माह में यह दुष्कर्म रुकने का नाम नहीं ले रहे
हैं। सरकार को इन मामलों पर त्वरित कारवाई करनी होगी।
हर रोज दरिदें दरिदगी का तमाशा कर रहे है।देश में
दुष्कर्म के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे है।इससे पहले कठुआ में भी एक बच्ची के साथ दरिदगी का मामला
प्रकाश में आया था।

