सदन समिति की जांच: नेता प्रतिपक्ष आतिशी पर पुलिस कार्रवाई की परतें-Parliament
दिल्ली की राजनीति के केंद्र में एक बड़ा तूफ़ान खड़ा हो गया है। सदन की समिति को अब नेता प्रतिपक्ष (LoP) आतिशी के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई की जांच के आदेश दिए गए हैं। यह कोई मामूली राजनीतिक झड़प नहीं—यह इस बात की परीक्षा है कि सड़क पर सत्ता का इस्तेमाल कैसे और किसके खिलाफ किया जाता है।
पिछले महीने एक तीखे विरोध प्रदर्शन के दौरान तनाव चरम पर पहुंच गया। सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाते हुए आतिशी ने एक रैली का नेतृत्व किया। पुलिस ने बल प्रयोग किया, जिसके बाद अधिकारों के दुरुपयोग के आरोप लगे। सवाल उठने लगे—क्या यह कानून-व्यवस्था बनाए रखने की कार्रवाई थी, या असहमति को दबाने की कोशिश? अब इस जांच पर सबकी निगाहें टिकी हैं, क्योंकि इसके नतीजे पुलिस पर जनता के भरोसे को नया आकार दे सकते हैं।
सदन समिति की जांच का उद्देश्य और दायरा
सदन समिति को एक स्पष्ट जिम्मेदारी सौंपी गई है—कार्यपालिका की संभावित ज्यादतियों की जांच। इस समिति के पास असली अधिकार हैं: गवाहों को बुलाने और दस्तावेज़ तलब करने की शक्ति।
इस समिति में सत्तारूढ़ दल और विपक्ष—दोनों के सदस्य शामिल हैं, ताकि संतुलन बना रहे। जांच का फोकस 15 से 20 जनवरी 2026 के बीच की घटनाओं पर है, जो दिल्ली विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती हैं।
जांच समिति की संरचना और अधिकार
इस समिति में आम तौर पर 10 से 12 विधायक होते हैं, जो अलग-अलग दलों से आते हैं। अध्यक्ष का चयन विधानसभा अध्यक्ष द्वारा किया जाता है—अक्सर किसी अपेक्षाकृत तटस्थ चेहरे को यह जिम्मेदारी दी जाती है।
समिति विधानसभा नियमों से शक्ति प्राप्त करती है। यह पुलिस अधिकारियों, प्रशासनिक अफसरों और यहां तक कि आतिशी को भी तलब कर सकती है। पूर्व की जांचें—जैसे चुनाव घोटालों पर बनी समितियाँ—इसकी व्यापक पहुंच को दिखा चुकी हैं।
हालांकि सीमाएँ भी हैं। यह जांच केवल राज्य पुलिस की कार्रवाई तक सीमित रहेगी, केंद्रीय बलों के दायरे में नहीं जाएगी। इससे जांच केंद्रित और व्यावहारिक बनी रहती है।
पुलिस कार्रवाई पर लगे आरोपों की प्रकृति
आतिशी की टीम का आरोप है कि पुलिस ने अत्यधिक बल प्रयोग किया। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठियां चलाने और खुद नेता प्रतिपक्ष के साथ बदसलूकी की बात कही गई है।
एक गंभीर आरोप यह भी है कि रैली के लिए पहले से जारी अनुमति को नज़रअंदाज़ किया गया। यह परमिट 10 जनवरी को ही स्थानीय पुलिस से स्वीकृत था।

प्रक्रियागत खामियां भी सामने आईं—जैसे भीड़ को हटाने से पहले स्पष्ट चेतावनी न देना। आतिशी को निशाना बनाना जानबूझकर किया गया कदम बताया जा रहा है, ताकि एक मुखर आलोचक को चुप कराया जा सके।
पुलिस का आधिकारिक पक्ष अलग है। उनका कहना है कि यह मानक भीड़ नियंत्रण कार्रवाई थी। एक संक्षिप्त रिपोर्ट में बताया गया कि लगभग 200 पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे ताकि यातायात बाधित न हो। लेकिन संदेह अभी भी बना हुआ है—और यही समिति की गहन जांच का कारण है।
पुलिस हस्तक्षेप तक की घटनाओं का क्रम
जनवरी के मध्य की बात है। आतिशी ने इंडिया गेट के पास धरना देने की योजना बनाई थी। उद्देश्य था—सार्वजनिक सेवाओं में हो रही देरी को उजागर करना।
दोपहर तक भीड़ तेज़ी से बढ़ी। हाथों में तख्तियां, नारों की गूंज। शुरुआत में पुलिस दूर से निगरानी करती रही। हालात तब बिगड़े जब प्रदर्शनकारियों ने एक मुख्य सड़क को जाम कर दिया।
पूर्व घटनाओं और विरोध प्रदर्शनों का दस्तावेज़ीकरण
इस प्रदर्शन की तैयारी हफ्तों पहले शुरू हो चुकी थी। आतिशी लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रही थीं और बड़े आंदोलन की चेतावनी दे रही थीं।
कोई बड़ी हिंसक घटना पहले नहीं हुई थी। हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया कि “उपद्रवी तत्वों” के शामिल होने की गुप्त सूचनाएं मिली थीं।
आयोजकों के अनुसार करीब 5,000 लोग शामिल हुए, जबकि स्वतंत्र आकलन इसे लगभग 4,000 बताते हैं। जब तक पुलिस ने हस्तक्षेप नहीं किया, माहौल शांत ही रहा।
पुलिस प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल का विश्लेषण
ऐसी परिस्थितियों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश होते हैं। दिल्ली पुलिस का नियम कहता है—पहले चेतावनी, फिर आवश्यकता पड़ने पर भीड़ को तितर-बितर करना।
वीआईपी या संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के मामले में अतिरिक्त सावधानी बरतने का नियम है। जब तक कोई सीधा खतरा न हो, बल प्रयोग नहीं होना चाहिए।
उस दिन आदेश डिप्टी कमिश्नर स्तर से आए थे—डायरी में लिखा है, “शांति बनाए रखें।” लेकिन वीडियो फुटेज में दिखता है कि स्थिति बहुत जल्दी हिंसक मोड़ पर पहुंच गई।
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि पूरी चेतावनी प्रक्रिया अपनाए बिना ही लाठियां चलीं। यही अंतर जांच की ज़रूरत को रेखांकित करता है।

साक्ष्य समीक्षा और गवाही का संकलन
जांच में साक्ष्य सबसे अहम होते हैं। समिति हर उपलब्ध सबूत इकट्ठा कर रही है—तस्वीरें, वीडियो, बयान।
पुलिसकर्मियों के बयान, आतिशी के सहयोगियों की चोटों की रिपोर्ट, और मौके पर मौजूद पत्रकारों की गवाही—सब मिलकर तस्वीर को पूरा करते हैं।
दृश्य और मौखिक साक्ष्यों का संग्रह
आस-पास लगे सीसीटीवी कैमरों में घटनाएं रिकॉर्ड हुईं। बॉडी कैम? केवल आधे पुलिसकर्मियों ने पहने हुए थे।
सोशल मीडिया पर दर्जनों वीडियो सामने आए हैं। विशेषज्ञ यह जांच रहे हैं कि इनमें कोई छेड़छाड़ तो नहीं हुई।
अब तक 50 से ज्यादा गवाहों को बुलाया जा चुका है—प्रदर्शनकारी, राहगीर और स्थानीय दुकानदार भी। सभी से शपथ के तहत बयान लिए जा रहे हैं।
पुलिस शक्तियों को नियंत्रित करने वाला कानूनी ढांचा
कानून स्पष्ट सीमाएं तय करता है। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 बड़े जमावड़े पर रोक की अनुमति देती है, लेकिन दिल्ली पुलिस अधिनियम निष्पक्षता और राजनीतिक तटस्थता की मांग करता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले भी मार्गदर्शन देते हैं। 2018 के एक मामले में अदालत ने कहा था—बल का प्रयोग खतरे के अनुपात में होना चाहिए। इससे अधिक बल “अधिकारों का दुरुपयोग” माना जाएगा।
आतिशी का पक्ष इन्हीं फैसलों का हवाला देकर पुलिस कार्रवाई को अवैध बता रहा है। समिति इन सभी कानूनी पहलुओं की गहन समीक्षा कर रही है।
लोकतांत्रिक जवाबदेही और असहमति पर प्रभाव
जब पुलिस किसी बड़े विपक्षी नेता पर कार्रवाई करती है, तो उसका असर दूर तक जाता है। यह सवाल उठता है—क्या व्यवस्था सभी के लिए समान है?
आतिशी का मामला इसी संवेदनशील बिंदु को उजागर करता है।

विपक्ष और सभा की स्वतंत्रता पर असर
विपक्षी दलों में डर का माहौल है। आतिशी की गिरफ्तारी—या कहें हिरासत—एक संकेत बन जाती है।
संविधान का अनुच्छेद 19 शांतिपूर्ण सभा और अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है। लेकिन जब ज़मीन पर हालात अलग हों, तो ये अधिकार कागज़ी लगने लगते हैं।
आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं। पिछले साल दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों की अनुमति में 20% की गिरावट आई। यह घटना उस गिरावट को और तेज़ कर सकती है।
ऐतिहासिक संदर्भ और मिसालें
भारत में ऐसे टकराव नए नहीं हैं। 2019 में पंजाब में किसानों और पुलिस की झड़प हुई थी—जांच के बाद कुछ अधिकारियों पर जुर्माना लगा।
2022 में कर्नाटक में विपक्षी नेता से जुड़े एक मामले के बाद पुलिस सुधार किए गए। 2020 के बाद से ऐसे मामलों में जांच समितियों की संख्या बढ़ी है, खासकर सोशल मीडिया के दबाव के कारण।
आतिशी का मामला अनोखा है, लेकिन पैटर्न वही है—जब राजनीति और पुलिस टकराती हैं, तो जनाक्रोश बढ़ता है।
आगे की राह और संभावित नतीजे
समिति की जांच अब निर्णायक चरण में है। साप्ताहिक बैठकें हो रही हैं और अप्रैल तक रिपोर्ट आने की उम्मीद है।
नतीजे कई तरह के हो सकते हैं। रिपोर्ट स्वीकार होती है तो पुलिस अधिकारियों के निलंबन तक की सिफारिश हो सकती है। अगर ठंडे बस्ते में गई, तो असंतोष और बढ़ेगा।
समय-सीमा और रिपोर्टिंग प्रक्रिया
पूरी जांच अधिकतम दो महीने में पूरी होनी है। हर तीन हफ्ते में अंतरिम रिपोर्ट सदन में पेश होगी।
अंतिम रिपोर्ट लगभग 50 पन्नों की होगी—जिसमें निष्कर्ष, साक्ष्य और सुधार की सिफारिशें शामिल होंगी। इसके बाद सदन में मतदान होगा।
देरी की मिसालें पहले भी रही हैं, लेकिन इस बार सार्वजनिक दबाव तेज़ है।

प्रक्रिया सुधार के लिए संभावित सुझाव
संभावित सुधारों में शामिल हो सकते हैं:
प्रदर्शन नियंत्रण पर पुलिस का पुनः प्रशिक्षण
वीआईपी मामलों में वरिष्ठ अधिकारियों की सीधी निगरानी
बल प्रयोग के स्पष्ट स्तर तय करना
बॉडी कैम को अनिवार्य बनाना
एक अहम सुझाव है—बड़े प्रदर्शनों में स्वतंत्र पर्यवेक्षकों की तैनाती। इससे पक्षपात की आशंका कम होगी और भरोसा बढ़ेगा।
संस्थागत पारदर्शिता की ओर
नेता प्रतिपक्ष आतिशी पर पुलिस कार्रवाई की सदन समिति जांच लोकतंत्र के लिए एक अहम पड़ाव है। यह तय करेगी कि कानून सबके लिए बराबर है या सत्ता के अनुसार बदलता है।
दांव बड़ा है। निष्पक्ष पुलिसिंग से ही असहमति सुरक्षित रह सकती है। यह जांच खुद इस बात का सबूत है कि निगरानी तंत्र अभी ज़िंदा है।
आगे क्या सुधार लागू होंगे—यह देखना बाकी है। आपकी राय मायने रखती है। बताइए, सड़कों को सुरक्षित और लोकतंत्र को मज़बूत बनाने के लिए क्या किया जाना चाहिए? बदलाव की मांग कीजिए—यही लोकतंत्र की ताकत है।
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