PM Narendra Modi इज़राइल में: इज़रायली भौतिक विज्ञानी Abraham Mitrani की टिप्पणी और व्यापक परिप्रेक्ष्य
भारत के PM Narendra Modi की इज़राइल यात्रा केवल एक औपचारिक कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह 21वीं सदी के बदलते वैश्विक समीकरणों में दो प्रौद्योगिकी-प्रेरित लोकतंत्रों के बीच गहराते संबंधों का प्रतीक भी है। इस यात्रा पर इज़रायली भौतिक विज्ञानी Abraham Mitrani की टिप्पणी ने वैज्ञानिक और बौद्धिक समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने इसे “राजनीतिक संवाद से आगे बढ़कर ज्ञान-आधारित साझेदारी की दिशा में एक निर्णायक कदम” बताया है।
नीचे इस यात्रा के राजनीतिक, वैज्ञानिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आयामों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत है।
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: भारत–इज़राइल संबंधों की यात्रा
भारत और Israel के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध 1992 में स्थापित हुए। हालांकि उससे पहले भी दोनों देशों के बीच अनौपचारिक संपर्क और सीमित सहयोग मौजूद था। पिछले तीन दशकों में रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में साझेदारी मजबूत हुई है।
PM मोदी की पिछली यात्रा (2017) ऐतिहासिक मानी गई थी क्योंकि यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली स्वतंत्र इज़राइल यात्रा थी। उस यात्रा ने द्विपक्षीय संबंधों को “सामान्य” से “रणनीतिक” स्तर तक पहुंचा दिया। वर्तमान यात्रा उसी प्रक्रिया की निरंतरता है।
2. अब्राहम मित्राणी की दृष्टि: विज्ञान और कूटनीति का संगम
इज़रायली भौतिक विज्ञानी Abraham Mitrani ने एक सेमिनार में कहा कि:
“भारत और इज़राइल के बीच सहयोग केवल रक्षा या व्यापार तक सीमित नहीं रहना चाहिए। विज्ञान और नवाचार को केंद्र में रखकर दीर्घकालिक साझेदारी बनाई जानी चाहिए।”
मित्राणी के अनुसार, भारत की विशाल युवा आबादी और तकनीकी प्रतिभा, तथा इज़राइल की उच्च स्तरीय अनुसंधान संस्कृति मिलकर वैश्विक नवाचार का नया मॉडल बना सकती है।
उन्होंने तीन प्रमुख क्षेत्रों की ओर संकेत किया:
क्वांटम तकनीक और उन्नत भौतिकी अनुसंधान
साइबर सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए हरित प्रौद्योगिकी
3. रक्षा और सुरक्षा सहयोग
भारत इज़राइल से रक्षा उपकरणों का एक प्रमुख खरीदार है। ड्रोन, मिसाइल रक्षा प्रणाली और निगरानी तकनीक में दोनों देशों का सहयोग गहरा है।
इज़राइल की उन्नत रक्षा तकनीक और भारत की रणनीतिक आवश्यकताएं एक-दूसरे की पूरक हैं। मित्राणी का मानना है कि रक्षा सहयोग के साथ-साथ संयुक्त अनुसंधान प्रयोगशालाएं स्थापित की जानी चाहिए, जिससे तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़े।
4. विज्ञान और शिक्षा में संभावनाएं
मित्राणी ने विशेष रूप से शैक्षणिक आदान-प्रदान पर बल दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि भारतीय IITs और इज़राइल के प्रमुख अनुसंधान संस्थानों के बीच संयुक्त पीएचडी कार्यक्रम शुरू किए जाएं।
इज़राइल में अनुसंधान पर GDP का बड़ा हिस्सा खर्च किया जाता है। वहीं भारत तेजी से स्टार्टअप इकोसिस्टम विकसित कर रहा है। दोनों का संयोजन “ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था” को नई ऊंचाई दे सकता है।
5. कृषि और जल प्रबंधन
इज़राइल अपनी जल संरक्षण तकनीकों और ड्रिप सिंचाई प्रणाली के लिए प्रसिद्ध है। भारत के कई राज्यों में इज़रायली सहयोग से “कृषि उत्कृष्टता केंद्र” स्थापित किए गए हैं।
मित्राणी के अनुसार, जल संकट से जूझती दुनिया के लिए भारत–इज़राइल मॉडल एक उदाहरण बन सकता है। यदि दोनों देश संयुक्त रूप से अनुसंधान और तकनीकी समाधान विकसित करें, तो यह वैश्विक स्तर पर भी उपयोगी सिद्ध होगा।
6. आर्थिक और व्यापारिक आयाम
भारत और इज़राइल के बीच व्यापार निरंतर बढ़ रहा है। हीरे, फार्मास्यूटिकल्स, आईटी और रक्षा प्रमुख क्षेत्र हैं।
मित्राणी ने कहा कि मुक्त व्यापार समझौता (FTA) यदि शीघ्र संपन्न होता है, तो यह स्टार्टअप और टेक्नोलॉजी कंपनियों को बड़ा प्रोत्साहन देगा।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारतीय कंपनियों के लिए इज़राइल “नवाचार प्रयोगशाला” की तरह काम कर सकता है, जबकि इज़रायली कंपनियां भारत के विशाल बाजार का लाभ उठा सकती हैं।
7. सांस्कृतिक और सामाजिक संबंध
राजनीतिक और आर्थिक संबंधों के साथ-साथ सांस्कृतिक जुड़ाव भी महत्वपूर्ण है। भारत में यहूदी समुदाय का लंबा इतिहास रहा है और दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक सम्मान की परंपरा है।
PM मोदी की यात्रा के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों और भारतीय समुदाय से संवाद ने इस संबंध को और सुदृढ़ किया। मित्राणी ने इसे “सॉफ्ट पावर की शक्ति” बताया।

8. वैश्विक राजनीति में संदर्भ
मध्य पूर्व में बदलते समीकरणों के बीच भारत संतुलित कूटनीति अपनाता रहा है। इज़राइल के साथ मजबूत संबंध रखते हुए भारत ने अन्य क्षेत्रीय देशों से भी संवाद बनाए रखा है।
मित्राणी के अनुसार, भारत की यह संतुलित नीति उसे एक विश्वसनीय साझेदार बनाती है। उन्होंने कहा कि “भारत का वैश्विक प्रभाव बढ़ रहा है, और इज़राइल के लिए यह अवसर है कि वह इस उभरती शक्ति के साथ दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोग बनाए।”
9. आलोचनात्मक दृष्टिकोण
हालांकि इस यात्रा को व्यापक समर्थन मिला, कुछ आलोचकों ने इसे क्षेत्रीय राजनीति के संदर्भ में देखा। मित्राणी ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी लोकतंत्र में बहस स्वाभाविक है, लेकिन दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखते हुए संवाद आवश्यक है।
उन्होंने यह भी कहा कि वैज्ञानिक समुदाय का दायित्व है कि वह राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर सहयोग के नए रास्ते सुझाए।

10. भविष्य की दिशा
PM मोदी की यह यात्रा केवल वर्तमान समझौतों तक सीमित नहीं है। यह आने वाले वर्षों के लिए एक रोडमैप प्रस्तुत करती है।
मित्राणी ने सुझाव दिया कि:
संयुक्त अनुसंधान कोष स्थापित किया जाए।
छात्र और वैज्ञानिक आदान-प्रदान कार्यक्रम बढ़ाए जाएं।
हरित ऊर्जा और जलवायु प्रौद्योगिकी पर विशेष कार्यबल बनाया जाए।
उनके अनुसार, यदि इन कदमों को गंभीरता से लागू किया गया, तो भारत–इज़राइल साझेदारी “रणनीतिक सहयोग” से आगे बढ़कर “ज्ञान-साझेदारी” में परिवर्तित हो सकती है।
PM Narendra Modi की इज़राइल यात्रा केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक व्यापक रणनीतिक दृष्टि का हिस्सा है। इज़रायली भौतिक विज्ञानी Abraham Mitrani की टिप्पणी इस यात्रा को वैज्ञानिक और बौद्धिक परिप्रेक्ष्य से देखने का अवसर देती है।
यह यात्रा दर्शाती है कि आधुनिक कूटनीति केवल राजनीतिक समझौतों तक सीमित नहीं है; इसमें विज्ञान, नवाचार, संस्कृति और शिक्षा सभी की भूमिका है।
यदि दोनों देश इन संभावनाओं का पूर्ण उपयोग करते हैं, तो भारत और इज़राइल की साझेदारी आने वाले दशकों में वैश्विक स्तर पर एक आदर्श मॉडल बन सकती है।

