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PMमोदी ने राजघाट पर महात्मा गांधी की 78वीं पुण्यतिथि पर पुष्पांजलि अर्पित की

हर साल 30 जनवरी को भारत राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को याद करने के लिए ठहर जाता है। यह दिन शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है—वह दिन जब 1948 में गांधीजी की हत्या कर दी गई थी। वर्ष 2026 में उनकी 78वीं पुण्यतिथि पर PMनरेंद्र मोदी ने राजघाट पहुंचकर पुष्पांजलि अर्पित की और पूरे देश का नेतृत्व करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी।
यह केवल एक औपचारिक रस्म नहीं थी, बल्कि इस सवाल पर भी सोचने का अवसर थी—क्या आज के अशांत और शोर भरे दौर में गांधी का शांति और अहिंसा का संदेश अब भी उतना ही प्रासंगिक है?

राजघाट: स्मृति, सादगी और सम्मान का प्रतीक

यमुना नदी के तट पर स्थित राजघाट सिर्फ एक स्मारक नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का प्रतीक है। यहीं महात्मा गांधी का अंतिम संस्कार हुआ था। गांधीजी के जीवन की तरह उनका स्मारक भी अत्यंत सरल है—काले संगमरमर का एक चबूतरा और पास ही जलती हुई अखंड ज्योति, जो उनके अमर विचारों का प्रतीक है।

गांधी स्मारक के रूप में राजघाट का महत्व

राजघाट की सादगी गांधीजी के विनम्र जीवन दर्शन को दर्शाती है। यहां न भव्य मूर्तियां हैं, न ऊंची इमारतें—सिर्फ शांति और आत्मचिंतन का स्थान। हर वर्ष देश-विदेश से लोग यहां आकर नफरत, हिंसा और विभाजन के खिलाफ गांधी के संघर्ष को याद करते हैं।

PM मोदी की श्रद्धांजलि

PM मोदी ने सफेद फूलों की माला राजघाट पर अर्पित की और कुछ क्षण मौन रहकर प्रार्थना की। इसके बाद दो मिनट का राष्ट्रीय मौन रखा गया। उनके साथ कई वरिष्ठ नेता और अधिकारी भी मौजूद रहे।
PM अक्सर सार्वजनिक मंचों पर गांधीजी से प्रेरणा लेने की बात करते हैं, और राजघाट पर उनकी यह उपस्थिति उसी विचारधारा की पुष्टि थी।

राष्ट्रीय मौन: पूरे देश की साझा श्रद्धांजलि

दोपहर ठीक 12 बजे सायरन बजा और देशभर में स्कूलों, दफ्तरों और सड़कों पर लोग दो मिनट के लिए शांत खड़े हो गए। यह परंपरा गांधीजी की मृत्यु के बाद शुरू हुई थी।
यह किसी परिवार के सामूहिक शोक जैसा होता है—जहां पूरा देश एक साथ रुककर याद करता है। अनुमान है कि इस वर्ष भी करोड़ों लोगों ने इस मौन में भाग लिया।

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शहीद दिवस पर गांधी के मूल सिद्धांतों की पुनः पुष्टि

गांधीजी के विचार सिर्फ इतिहास नहीं हैं—वे आज की राजनीति और समाज के लिए भी मार्गदर्शक हैं।

अहिंसा: आधुनिक शासन में प्रासंगिकता

अहिंसा गांधीजी का सबसे बड़ा संदेश था। प्रधानमंत्री मोदी अक्सर संवाद और शांति पर ज़ोर देते हैं, चाहे वह सीमा विवाद हों या सामाजिक तनाव।
घरेलू स्तर पर भी हिंसा के खिलाफ जागरूकता अभियान, महिला और बाल सुरक्षा कार्यक्रम इसी सोच से जुड़े माने जाते हैं। वैश्विक मंचों पर भारत का संतुलित और शांत रुख भी गांधी के दर्शन की झलक देता है।

सत्याग्रह और सार्वजनिक जीवन में सत्य

सत्याग्रह—बिना हिंसा के सत्य पर अडिग रहना। मोदी सरकार बार-बार पारदर्शिता और स्पष्ट संवाद की बात करती है, खासकर कठिन आर्थिक या सामाजिक फैसलों के दौरान।
फेक न्यूज़ और अफवाहों के दौर में सत्य पर टिके रहना गांधी के विचारों को आज के समय में लागू करने जैसा है।

स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत

गांधीजी का स्वदेशी आज के दौर में आत्मनिर्भर भारत के रूप में दिखता है। ‘मेक इन इंडिया’ से लेकर स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने तक, यह नीति उनके चरखे के विचार का आधुनिक रूप है।
पिछले कुछ वर्षों में घरेलू उत्पादन बढ़ा है और कई क्षेत्रों में आयात पर निर्भरता कम हुई है—यह गांधी के मजबूत गांव और आत्मनिर्भर समाज के सपने से जुड़ता है।

राजनीतिक श्रद्धांजलि और राष्ट्रीय एकता

इस दिन राजनीति पीछे रह जाती है और साझा मूल्यों की बात होती है।

राष्ट्रपति और केंद्रीय मंत्रियों के संदेश

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने गांधीजी को स्वतंत्र भारत का नैतिक आधार बताया और उनके स्वच्छता, सादगी व करुणा के संदेश को अपनाने की अपील की।
केंद्रीय मंत्रियों ने भी सोशल मीडिया और बयानों के जरिए गांधीजी के विचारों को मौजूदा योजनाओं—जैसे स्वच्छ भारत, ग्रामीण विकास, सामाजिक न्याय—से जोड़ा।

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“विविधता में एकता” का संदेश

राजघाट पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं की मौजूदगी ने दिखाया कि गांधी आज भी सबको जोड़ते हैं। अंतरधार्मिक प्रार्थनाएं और शांतिपूर्ण कार्यक्रम इस बात का प्रमाण थे कि भारत की ताकत उसकी विविधता में है।

युवा पीढ़ी और गांधी के विचार

स्कूलों और कॉलेजों में गांधी पर चर्चाएं, नाटक और स्वच्छता अभियान हुए। युवा स्वयंसेवकों ने समाज सेवा और अहिंसा से जुड़े कार्यक्रमों में भाग लिया।
सरकार और सामाजिक संगठनों के प्रयास हैं कि युवा गांधी को सिर्फ किताबों तक सीमित न रखें, बल्कि उनके विचारों को जीवन में उतारें।

ऐतिहासिक संदर्भ: 30 जनवरी 1948

30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला भवन में गांधीजी की प्रार्थना सभा के लिए जाते समय गोली मारकर हत्या कर दी गई। 78 वर्ष की आयु में उन्होंने अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए ही जीवन त्याग दिया।

गांधी के अंतिम दिन और सांप्रदायिक सौहार्द

विभाजन के बाद फैली हिंसा को रोकने के लिए गांधीजी ने उपवास किए, हिंदू-मुस्लिम एकता की अपील की। उनके अंतिम शब्द “हे राम” थे—जो उनके आध्यात्मिक और मानवीय दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।

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महात्मा की मशाल आगे बढ़ाना

राजघाट पर प्रधानमंत्री मोदी की श्रद्धांजलि केवल अतीत को याद करना नहीं थी, बल्कि भविष्य के लिए संकल्प भी थी।
अहिंसा, सत्य, आत्मनिर्भरता और एकता—ये गांधी के चार स्तंभ आज भी भारत के रास्ते को रोशन करते हैं।

आज की सीख:

  • रोज़मर्रा के जीवन में हिंसा से दूर रहना

  • सत्य और संवाद को प्राथमिकता देना

  • स्थानीय और स्वदेशी को बढ़ावा देना

  • विविधता में एकता को सम्मान देना

गांधीजी की मशाल आज भी जल रही है—ज़रूरत है कि हम सब उसे आगे बढ़ाएं।

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