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राहुल गांधी का घटता समर्थन? कांग्रेस में दरार, सहयोगियों की दूरी और पारिवारिक संकेतों पर BJP के तीखे दावे

कल्पना कीजिए एक ऐसे नेता की, जिसके अपने ही दल में बंद दरवाज़ों के पीछे सवाल उठने लगें। भारतीय जनता पार्टी (BJP) इस समय राहुल गांधी को इसी रूप में पेश कर रही है। BJP का दावा है कि राहुल गांधी कांग्रेस के भीतर, सहयोगी दलों के बीच और यहाँ तक कि अपने पारिवारिक दायरे में भी समर्थन खो रहे हैं। जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, यह नैरेटिव भारतीय राजनीति में तेज़ी से फैल रहा है।

यह केवल राजनीतिक गपशप नहीं है, बल्कि विपक्ष के नेतृत्व को कमजोर दिखाने की एक रणनीतिक कोशिश है। इस लेख में हम BJP के दावों को अलग-अलग स्तरों पर परखते हैं—कांग्रेस के भीतर असंतोष, गठबंधन सहयोगियों के साथ तनाव और गांधी परिवार की बदलती भूमिकाएँ—ताकि तथ्य और राजनीतिक प्रचार के बीच अंतर स्पष्ट हो सके।

कांग्रेस के भीतर असंतोष: अंदरूनी दरारें

कांग्रेस पार्टी के भीतर लंबे समय से बेचैनी रही है। कई वरिष्ठ नेता राहुल गांधी के नेतृत्व और निर्णयों पर सवाल उठाते रहे हैं। BJP इन्हीं घटनाओं को यह दिखाने के लिए उछालती है कि राहुल गांधी पार्टी के केंद्र में समर्थन खो रहे हैं।

पार्टी बैठकों में अब पहले जैसी एकजुटता नहीं दिखती। जो नेता कभी खुलकर समर्थन करते थे, वे अब चुप्पी साधे हुए हैं। चुनावी माहौल में यह असहजता और ज़्यादा नज़र आती है।

बड़े नेताओं का इस्तीफ़ा और सार्वजनिक आलोचना

2022 में वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद ने कांग्रेस छोड़ते हुए राहुल गांधी के नेतृत्व की खुलकर आलोचना की। उन्होंने फैसलों को “अपरिपक्व” बताया और पार्टी के संगठनात्मक ढांचे पर सवाल उठाए।

2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया का कांग्रेस छोड़कर BJP में जाना भी बड़ा झटका था। मध्य प्रदेश नेतृत्व को लेकर मतभेदों ने यह संदेश दिया कि राहुल गांधी का राज्य इकाइयों पर नियंत्रण कमजोर है।

2024 के अंत में कुछ मंझले स्तर के नेताओं के इस्तीफ़े भी सामने आए। उनका कहना था कि राहुल गांधी की कोर टीम में उन्हें नज़रअंदाज़ किया गया। BJP इन घटनाओं को लगातार उदाहरण के रूप में पेश करती रही है।

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पीढ़ियों के बीच टकराव और संगठनात्मक जड़ता

कांग्रेस में वरिष्ठ नेताओं और युवा नेतृत्व के बीच दृष्टिकोण का अंतर साफ़ दिखता है। पुराने नेता स्थिर और धीमी रणनीति चाहते हैं, जबकि युवा कार्यकर्ता आक्रामक राजनीति के पक्ष में हैं।

राहुल गांधी दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इससे निर्णय प्रक्रिया और धीमी हो जाती है। 2025 में हुई बैठकों में यह सवाल उठा कि क्या राहुल गांधी इन आंतरिक मतभेदों को पाट पाने में सक्षम हैं।

चुनावी नतीजों से उपजा नेतृत्व संकट

2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को 99 सीटें मिलीं। हालांकि यह पिछली बार से बेहतर था, लेकिन पार्टी के भीतर रणनीति को लेकर असंतोष उभरा।

आंतरिक समीक्षा रिपोर्टों में अभियान की दिशा और ज़मीनी संगठन की कमजोरी पर सवाल उठे। कुछ नेताओं का मानना था कि राहुल गांधी के भाषण और संदेश मतदाताओं से जुड़ नहीं पाए।

राज्य स्तर पर भी मिले-जुले नतीजों ने इस बहस को हवा दी कि पार्टी को और मज़बूत नेतृत्व की ज़रूरत है।

गठबंधन की चुनौती: सहयोगी दलों की बदलती प्राथमिकताएँ

विपक्षी राजनीति में गठबंधन अहम भूमिका निभाते हैं। लेकिन BJP का दावा है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस सहयोगियों को भरोसा नहीं दे पा रही।

क्षेत्रीय दल अब अपने-अपने राज्यों में मज़बूत पकड़ के आधार पर शर्तें तय कर रहे हैं। इससे राहुल गांधी की राष्ट्रीय नेतृत्व भूमिका पर सवाल उठते हैं।

क्षेत्रीय दलों का स्थानीय हितों पर ज़ोर

बिहार में जेडीयू, तमिलनाडु में डीएमके और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस जैसे दल राष्ट्रीय एकता से ज़्यादा अपने राज्य हितों को प्राथमिकता देते दिखते हैं।

कई मौकों पर इन दलों ने राहुल गांधी के नेतृत्व वाले साझा मंचों से दूरी बनाई या अपनी शर्तें रखीं।

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गठबंधन वार्ताओं में ‘नेतृत्व का वजन’

BJP का आरोप है कि राहुल गांधी में वह राजनीतिक “गंभीरता” नहीं है, जो गठबंधन बातचीत में प्रभाव डाल सके। सहयोगी दल ज़्यादा सीटों और स्वायत्तता की मांग करते हैं।

महाराष्ट्र, कर्नाटक और झारखंड जैसे राज्यों में गठबंधन को लेकर सार्वजनिक मतभेद सामने आए, जिससे विपक्षी एकता को नुकसान पहुँचा।

परिवार का पहलू: वंशवाद की थकान या भूमिका परिवर्तन?

गांधी परिवार कांग्रेस की पहचान रहा है। लेकिन BJP का कहना है कि अब यही पहचान बोझ बन रही है।

प्रियंका गांधी की बढ़ती भूमिका

प्रियंका गांधी वाड्रा की सक्रियता और जनसभाओं में लोकप्रियता ने चर्चा को जन्म दिया है। कुछ लोग इसे राहुल गांधी के लिए समर्थन मानते हैं, तो कुछ इसे नेतृत्व विकल्प के रूप में देखते हैं।

सोनिया गांधी की सीमित भूमिका

स्वास्थ्य कारणों और उम्र के चलते सोनिया गांधी अब कम सक्रिय हैं। BJP इसे राहुल गांधी के प्रति घटते पारिवारिक समर्थन के रूप में पेश करती है, जबकि कांग्रेस इसे स्वाभाविक परिवर्तन बताती है।

मीडिया में वंशवाद बनाम एकता की बहस

BJP वंशवाद को कांग्रेस की कमजोरी बताती है, जबकि कांग्रेस इसे अपनी ऐतिहासिक ताकत के रूप में पेश करती है। जनता के बीच यह सवाल बना हुआ है कि क्या एक ही परिवार पर निर्भरता अब मतदाताओं को आकर्षित कर पा रही है या नहीं।

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BJP की रणनीति: “समर्थन घटने” की कहानी को हथियार बनाना

BJP इस नैरेटिव को चुनावी रणनीति के रूप में इस्तेमाल कर रही है। राहुल गांधी को कमजोर और अकेला दिखाकर विपक्ष को अविश्वसनीय साबित करना इसका उद्देश्य है।

पूर्व कांग्रेस नेताओं के बयान, मीडिया कवरेज और सोशल मीडिया अभियानों के ज़रिए BJP इस धारणा को मज़बूत करने की कोशिश करती है।

BJP के दावों में कितना दम?

कांग्रेस के भीतर असंतोष, गठबंधन की चुनौतियाँ और पारिवारिक भूमिका में बदलाव—ये सभी वास्तविक मुद्दे हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि राहुल गांधी का नेतृत्व पूरी तरह समाप्त हो गया है।

कांग्रेस आज भी कई राज्यों में सत्ता में है और राष्ट्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। BJP का नैरेटिव प्रभावी ज़रूर है, लेकिन अंतिम फ़ैसला चुनावी नतीजे ही करेंगे।

आने वाले राज्य चुनाव राहुल गांधी के नेतृत्व की असली परीक्षा होंगे। क्या वे संगठन को मज़बूत कर पाएँगे, या आलोचकों की आवाज़ और तेज़ होगी—यह देखना दिलचस्प होगा।