India–अमेरिका व्यापार समझौते पर सियासी संग्राम: Rahul Gandhi के ‘सरल सवाल’ बनाम Amit Shah का ‘झूठ फैलाने’ का आरोप
Indiaकी राजनीति में भारत–अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर नई बहस छिड़ गई है। राहुल गांधी ने संसद में इस समझौते से जुड़े कुछ “सरल सवाल” उठाए, जबकि अमित शाह ने उन पर “झूठ फैलाने” का आरोप लगाया। यह विवाद सिर्फ बयानबाज़ी नहीं है, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था, किसानों, उद्योगों और दवा क्षेत्र से सीधे जुड़ा मुद्दा है।
राहुल गांधी के ‘सरल सवाल’ क्या हैं?
राहुल गांधी ने सरकार से स्पष्टता मांगी कि प्रस्तावित व्यापार समझौते का असर आम लोगों पर क्या होगा। उनके सवाल मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों पर केंद्रित थे:
1. टैरिफ (आयात शुल्क)
क्या अमेरिका से आने वाले उत्पादों पर शुल्क कम किए जाएंगे?
यदि ऐसा होता है, तो क्या इससे भारतीय लघु और मध्यम उद्योगों पर दबाव बढ़ेगा?
India की औसत टैरिफ दर अमेरिका से अधिक है। ऐसे में शुल्क कटौती स्थानीय निर्माताओं के लिए चुनौती बन सकती है।
2. बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR)
क्या सख्त पेटेंट नियमों से भारतीय जेनेरिक दवाओं का उत्पादन प्रभावित होगा?
Indiaसस्ती दवाओं का बड़ा निर्यातक है। कड़े IPR नियम दवा कीमतों में वृद्धि कर सकते हैं।
3. कृषि और बाजार पहुंच
क्या अमेरिकी डेयरी और कृषि उत्पादों को भारतीय बाजार में अधिक पहुंच मिलेगी?
इससे छोटे किसानों की प्रतिस्पर्धा क्षमता पर असर पड़ सकता है।
राहुल गांधी का तर्क है कि इन मुद्दों पर पारदर्शिता जरूरी है, क्योंकि ये सीधे रोज़गार और महंगाई से जुड़े हैं।

अमित शाह का जवाब: “झूठ फैलाया जा रहा है”
अमित शाह ने राहुल गांधी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि सरकार राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगी। उन्होंने दावा किया कि:
संवेदनशील क्षेत्रों में टैरिफ सुरक्षा बनी रहेगी।
जेनेरिक दवाओं के हितों की रक्षा की जाएगी।
किसानों के लिए सुरक्षा उपाय सुनिश्चित होंगे।
भाजपा का रुख यह है कि भारत मजबूत स्थिति में बातचीत कर रहा है और कोई भी समझौता “आत्मनिर्भर भारत” की भावना के अनुरूप होगा।
असली मुद्दा क्या है?
राजनीतिक आरोप–प्रत्यारोप से परे, भारत–अमेरिका व्यापार संबंधों का आकार बहुत बड़ा है। दोनों देशों के बीच व्यापार 200 अरब डॉलर से अधिक का है। फिर भी कई विवादित मुद्दे बने हुए हैं:
उच्च टैरिफ दरें
डिजिटल व्यापार और डेटा नियम
कृषि सब्सिडी
बौद्धिक संपदा विवाद
India अपने घरेलू उद्योगों की रक्षा करना चाहता है, जबकि अमेरिका बाजार पहुंच और पेटेंट सुरक्षा चाहता है।

विशेषज्ञों की राय
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि India के पास बड़ा उपभोक्ता बाजार एक मजबूत सौदेबाजी शक्ति है। लेकिन अमेरिका तकनीक, निवेश और रक्षा सहयोग में महत्वपूर्ण भागीदार है।
इसलिए समझौते में संतुलन आवश्यक है—न तो अत्यधिक रियायतें, न ही पूर्ण टकराव।
मीडिया और जनमत की भूमिका
इस मुद्दे पर मीडिया कवरेज भी विभाजित दिखा। कुछ प्लेटफॉर्म राहुल गांधी के सवालों को जवाबदेही का प्रयास बता रहे हैं, तो कुछ उन्हें राजनीतिक बयानबाजी करार दे रहे हैं।
सोशल मीडिया पर दोनों पक्षों के समर्थकों ने अपने-अपने नैरेटिव को आगे बढ़ाया, जिससे बहस और तीखी हो गई।

बयानबाज़ी से आगे नीति की स्पष्टता जरूरी
यह विवाद सिर्फ दो नेताओं के बीच शब्दों की जंग नहीं है। यह India की आर्थिक दिशा और वैश्विक व्यापार नीति से जुड़ा प्रश्न है।
राहुल गांधी पारदर्शिता और स्पष्ट जवाब की मांग कर रहे हैं। अमित शाह सरकार की नीति को राष्ट्रीय हित में बताते हुए विपक्ष के आरोपों को खारिज कर रहे हैं।
आखिरकार, देशहित में यह आवश्यक है कि व्यापार समझौते जैसे संवेदनशील मुद्दों पर स्पष्ट जानकारी, तथ्यात्मक संवाद और संतुलित नीति अपनाई जाए।
India की अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों का भविष्य इन निर्णयों पर निर्भर करता है—इसलिए सवाल भी जरूरी हैं और जवाब भी।
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