RJD में नेतृत्व संकट: Bihar चुनावी पराजय के बाद भीतर से उठी बगावत
Bihar चुनाव के नतीजों ने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को जोरदार झटका दिया। पार्टी को उम्मीद थी कि इस बार वह दमदार वापसी करेगी, लेकिन नतीजे उम्मीदों से काफी नीचे रहे। हार का ठीकरा अब पार्टी के भीतर ही फोड़ा जा रहा है। आरोप-प्रत्यारोप, असंतोष और नाराज़गी—सब खुलकर सामने आ रहे हैं। यह हार RJD के भीतर ऐसा तूफ़ान लेकर आई है, जिसने नेतृत्व से लेकर संगठन तक सबको सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।
RJD Bihar की राजनीति का अहम स्तंभ रहा है। यादव और मुस्लिम समुदाय इसके मजबूत जनाधार रहे हैं। महागठबंधन के साथ मिलकर इस बार भी NDA के खिलाफ कड़ा मुकाबला किया गया, मगर अंदरूनी खामियों ने उम्मीदों को झटका दे दिया। सूत्रों के अनुसार, सबसे ज्यादा गुस्सा तेजस्वी यादव की कोर टीम पर फूटा है—जो चुनावी रणनीति में कई स्तर पर चूक गई।
यह लेख RJD में उभर रही नेतृत्व की दरारों, नाराज नेताओं, आंतरिक उठा-पटक और इस संकट के बड़े राजनीतिक प्रभावों पर रोशनी डालता है।
चुनावी झटका कितना बड़ा? असर का आकलन
सीटों और वोट शेयर में गिरावट
243 सदस्यीय विधानसभा में RJD और उसके सहयोगी सिर्फ 75 सीटों तक सिमट गए। पिछली बार यह आंकड़ा 110 था। प्री-इलेक्शन सर्वेक्षण 90+ सीटों का अनुमान दे रहे थे, लेकिन नतीजों ने सब चौंका दिया।
मजबूत क्षेत्रों में भी वोट शेयर 26% से घटकर 23% रह गया।
मधुबनी, सीतामढ़ी जैसे ग्रामीण जिलों में पार्टी पिछड़ गई।
कई सीटों पर 5–7% कम वोटिंग RJD को भारी पड़ी।
आरोप है कि पार्टी ने जमीनी प्रचार की बजाय सोशल मीडिया और विज्ञापनों पर जरूरत से ज्यादा खर्च किया। यही अंतर जमीन और हवा के प्रचार के बीच पार्टी को महँगा पड़ा।

कोर वोटबैंक में सेंध
यादव वोट अपेक्षाकृत साथ रहे, लेकिन EBC (अति पिछड़े) समुदाय में 10% तक वोट NDA की ओर शिफ्ट हो गए।
कुछ मुस्लिम इलाकों में भी वोट बंटे, जो RJD के लिए चेतावनी की घंटी है।
एक अध्ययन में यह सामने आया कि युवाओं को लेकर RJD का एजेंडा कमजोर रहा। वे नई सोच चाहते थे, मगर अभियान पुराने ढर्रे पर चला।
तेजस्वी के आंतरिक घेरे पर निशाना
रणनीतिक सलाहकारों पर तीखी आलोचना
तेजस्वी यादव की कोर टीम में शामिल रणनीतिक सलाहकारों पर सबसे ज्यादा गुस्सा है।
नाम उछाले जा रहे हैं—जैसे प्रमुख सहयोगी राजीव रंजन, जिन पर शहरी-केंद्रित रणनीति थोपने के आरोप हैं।
मीडिया हैंडलर प्रिया सिंह पर सोशल मीडिया अभियान को प्रभावी न बना पाने की आलोचना हो रही है।
दिल्ली की कंसल्टेंसी कंपनियों पर ज्यादा भरोसा करने से पुराने नेताओं में नाराजगी है। उनसे कहा जा रहा है कि उन्होंने “बिहार की जमीन” को नजरअंदाज कर दिया।
वरिष्ठ नेताओं की बगावत
शरद राजक, मोहम्मद जावेद जैसे पुराने नेता खुले तौर पर जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।
उनका कहना है कि दशकों की मेहनत के मुकाबले, कोर टीम के “नए चेहरे” अनुभवहीन और जमीनी हकीकत से दूर हैं।
अंदरूनी बैठकें गरम हैं—कुछ नेता सलाहकारों से सार्वजनिक माफी की मांग कर रहे हैं। यह टकराव तेजस्वी की नेतृत्व क्षमता की परीक्षा ले रहा है।
नेतृत्व चुनौती की गहराई: बड़े बदलावों की मांग
संगठन में बड़े फेरबदल की आवाजें
नाराज़ नेताओं की मुख्य मांगें:
38 जिलों में नए संगठनात्मक सेटअप
छह महीने के भीतर आंतरिक चुनाव
चुनाव अभियान की विफलताओं पर पांच सदस्यीय जांच समिति
कंसल्टेंसी बजट आधा करना और पैसा बूथ स्तर पर खर्च करना
ये सुझाव या तो RJD को सुधार की राह दिखाएँगे, या फिर पार्टी को दो खेमों में बाँट सकते हैं।

लालू प्रसाद यादव की छाया
लालू अभी भी RJD की आत्मा हैं। भले उनकी तबीयत पहले जैसी राजनीति की अनुमति न दे, पर उनकी राय अहम रहती है।
लेकिन सवाल है—क्या यह बगावत उनके परिवारवाद मॉडल पर भी सवाल है?
कुछ नेता लालू परिवार के अन्य सदस्यों को बड़े पदों में देखने की भी इच्छा रखते हैं।
2005 की हार के बाद जैसा विभाजन हुआ था, वैसी स्थिति की आशंका फिर मंडरा रही है।
महागठबंधन पर असर और विपक्षी एकता की चुनौती
गठबंधन में तनाव
RJD की अंदरूनी लड़ाई कांग्रेस और वाम पार्टियों तक असर डाल रही है।
सीटों के बंटवारे को लेकर हालिया बैठकों में तनाव दिखा।
सहयोगी परेशान हैं कि RJD के अंदरूनी झगड़ों का नुकसान पूरे गठबंधन को होगा।
एक सहयोगी नेता ने कहा,
“हमें एकजुट मोर्चा चाहिए, परिवार की लड़ाई नहीं।”
आगे की रणनीति पर असर
2025 के चुनावों से पहले यह संकट निर्णायक मोड़ बन सकता है।
अगर तेजस्वी समय रहते सुधार कर लेते हैं, तो वे पार्टी पर पकड़ मजबूत कर सकते हैं।
देर हुई तो RJD खेमों में बँट सकता है और विपक्ष कमजोर पड़ जाएगा।
पोस्ट-पोल सर्वे में विपक्षी एकता पर भरोसा 55% से घटकर 45% रह गया है—यह गंभीर संकेत है।
उथल-पुथल से निकलने का रास्ता
मुख्य सीख
चुनावी हार ने RJD की आंतरिक दरारें उजागर कर दीं।
रणनीति, संगठन और नेतृत्व—तीनों स्तरों पर चूकें हुईं।
युवा टीम और पुराने नेताओं के बीच संघर्ष चरम पर है।
वोटबैंक में गिरावट और गठबंधन में अविश्वास की स्थिति बनी है।

RJD को अब क्या करना चाहिए?
अनुभवी नेताओं और युवाओं का संतुलित नेतृत्व ढाँचा बनाना
जमीनी कैडर को मजबूत करना
सलाहकारों और कंसल्टेंट्स का पुनर्मूल्यांकन
ओपन फोरम और कार्यकर्ता संवाद कार्यक्रम
गठबंधन में भरोसा बहाल करने के लिए पारदर्शी कदम
Bihar की राजनीति हमेशा चलायमान रहती है।
अगर RJD ने तेजी से कदम उठाए, तो वह फिर से मज़बूत वापसी कर सकता है।
नजरें अब पटना पर होंगी—यह संकट टूटेगा या पार्टी को नई दिशा देगा, आने वाले महीने तय करेंगे।
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