क्यों RJD को मिले वोट, लेकिन BJP–नीतीश ने जीतीं सीटें?
बिहार चुनाव नतीजों की पूरी व्याख्या**
सोचिए: 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन—जिसकी अगुवाई RJD कर रही थी—को पूरे राज्य में लगभग 28% वोट मिले।
फिर भी NDA—BJP और नीतीश कुमार की JD(U)—ने 125 सीटें जीतकर सरकार बना ली।
कैसे?
यही है भारतीय चुनावों की असली “कहानी” जहाँ वोट ≠ सीट।
यह लेख इसी गैप को समझाता है—कैसे गठबंधन की रणनीति, वोटों का भूगोल और स्मार्ट सीट मैनेजमेंट ने खेल पलट दिया। पढ़ते-पढ़ते आपको समझ आएगा कि केवल वोट ज्यादा होना जीत की गारंटी क्यों नहीं होता।
वोट शेयर बनाम सीट शेयर: बिहार की चुनावी गणित का विचित्र अंतर
बिहार में “फ़र्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट” यानी जो सबसे आगे, वही विजेता वाला सिस्टम है। इससे वही दल फायदे में होते हैं जिनका समर्थन छितरा हुआ नहीं बल्कि संतुलित और केंद्रित होता है।
2020 में:
महागठबंधन: ~27% वोट → 110 सीट
NDA: ~37% वोट → 125 सीट
मुख्य बात?
कहाँ वोट मिले—यह ज्यादा महत्वपूर्ण है, कितने मिले से भी ज्यादा।
बहु-दलीय राज्यों में यह असमानता अक्सर दिखती है। वोट बँटते हैं, लेकिन सीटें मजबूत गठबंधनों की तरफ जाती हैं।

फ़र्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट सिस्टम का असर
इस सिस्टम में 50% वोट जरूरी नहीं। बस दूसरे नंबर वाले से एक वोट ज्यादा, और सीट आपकी।
अगर कोई पार्टी 30% वोट राज्यभर में पाए लेकिन 100 चुनिंदा सीटों में अपनी पकड़ मजबूत कर दे—तो वह बहुत सीटें जीत सकती है।
दूसरी तरफ, 35% वोट पाए लेकिन वोट बिखर गए—तो सीटें कम मिलेंगी।
रural pockets में स्थानीय नेताओं की पकड़ भी इस सिस्टम को और असमान बनाती है।
RJD का मजबूत आधार, लेकिन बिखरा हुआ प्रदर्शन
RJD का कोर—यादव+मुस्लिम वर्ग (लगभग 15–20% राज्य जनसंख्या)—काफी वफादार है।
2020 में RJD को 23% वोट मिले, जो उनके लिए बड़ा सुधार था।
फिर भी सीटें?
पूरे महागठबंधन को सिर्फ 110, जिनमें RJD को 75।
क्यों?
क्योंकि—
कुछ जिलों में वोट बहुत ज्यादा थे (जैसे सिवान, गोपालगंज—40%+),
लेकिन कई जगहों पर बहुत मामूली कम अंतर से हार (जैसे मधुबनी—तीन सीटें <5,000 वोट से हारीं)।
शहरी क्षेत्रों में RJD कमजोर (पटना शहरी—20% से भी कम)।
किसी-किसी सीट पर वोट बहुत अधिक, और कई सीटों पर बहुत कम—इससे सीटें नहीं बढ़ पातीं।

BJP–NDA की ‘एफ़िशिएंट वोट कंसोलिडेशन’ रणनीति
BJP ने JD(U) और छोटे दलों के साथ मिलकर वोटों का एक ठोस ब्लॉक बनाया।
अकेली BJP के 19% वोट शायद कम पड़ते,
लेकिन NDA के संयुक्त 37% ने सीटों में बदलकर उन्हें बाज़ी दिलाई।
जहाँ लड़ाई करीबी थी, NDA को साथी दलों के वोट मिले।
वैश्याली, बेगूसराय, समस्तीपुर जैसे इलाकों में यही निर्णायक रहा।
upper castes → BJP
EBC → JD(U)
यह कास्ट-अलाइनमेंट वोट वेस्ट होने से बचाता है।
नीतीश फैक्टर: JD(U) की रणनीति और सीटों पर पकड़
नीतीश कुमार की JD(U) को 15% वोट मिले, लेकिन 43 सीटें।
यह उनकी पकड़ और सीटों के बंटवारे की रणनीति दिखाता है।
EBC (36% तक) नीतीश का स्थायी वोट बैंक
शासन और विकास की उनकी ‘सुसाशन’ छवि
लंबे कार्यकाल के बावजूद एंटी-इंकम्बेंसी को मैनेज करने की कला
उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता ने कई करीबी सीटें बचाईं।
अल्पसंख्यक वोटों का बँटवारा और JD(U) का फायदा
मुस्लिम वोट आमतौर पर RJD के पास जाता है,
लेकिन 2020 में AIMIM के आने से सीमांचल में बड़े पैमाने पर वोट कटे।
AIMIM ने 1% वोट लिए, लेकिन 4–5 सीटों में RJD को नुकसान पहुँचाया।
JD(U) को 10% तक मुस्लिम वोट मिले।
जैसे किशनगंज में—RJD और AIMIM के बीच बँटवारे से JD(U) ने 30% वोट लेकर जीत ली।
अगर यह वोट एकजुट होते, महागठबंधन 10 और सीटें निकाल सकता था।

एंटी-इंकम्बेंसी और नीतीश का ‘स्थिर नेता’ टैग
हालाँकि नीतीश के खिलाफ नाराज़गी थी—बेकारी, भ्रष्टाचार, शिक्षकों के मुद्दे—लेकिन ग्रामीण इलाकों में उनकी स्थिरता और योजनाओं का प्रभाव कायम था।
EBC और महिलाओं में उनकी मजबूत पकड़ NDA को लाभ देती रही।
BJP की संगठनात्मक ताकत और बूथ प्रबंधन
BJP का कैडर पूरे बिहार में बेहद मजबूत है।
करीब 10 लाख कर्मठ कार्यकर्ता
booth-level mapping
swing voters को identify करने के लिए apps
door-to-door micro-campaigning
इस संगठनात्मक नेटवर्क ने BJP के 19% वोट को 74 सीटों में बदल दिया—जो एक बड़ा रूपांतरण है।
NDA का मजबूत ‘वोट ट्रांसफर’—महागठबंधन की कमजोरी
NDA में BJP से JD(U) और JD(U) से छोटे दलों को वोट का सुचारु ट्रांसफर हुआ।
ये 75–85% तक सफल माना जाता है।
महागठबंधन में यह सिर्फ 50% के आसपास रहा—यही कारण रहा कि बहुत सी सीटें बेहद छोटे अंतर से हाथ से निकल गईं।
छोटे दलों की भूमिका: वोट कटवा और fragmentation
बिहार में छोटे दल चुनावों में बड़ा फर्क डालते हैं। 2020 में भी ऐसा हुआ।
LJP (चिराग पासवान) का असर
वोट शेयर ~5%
JD(U) को 10–12 सीटों में नुकसान
पर BJP को फायदा—25 सीटों में NDA की मदद
कई जगहों पर LJP की वजह से विपक्षी वोट कट गए और NDA लाभ में गया।
Left पार्टियों का सीमित लेकिन रणनीतिक प्रभाव
वोट शेयर कम (<3%), लेकिन
महागठबंधन के साथ जुड़कर 12 सीटें जीतीं
लाल बेल्ट में बीजेपी/जेडीयू को रोकने में मदद की
शहरी इलाकों में असर कम, ग्रामीण में ठोस

बिहार के जनादेश से सीखें
बिहार 2020 का संदेश साफ है—
वोट ज्यादा होना पर्याप्त नहीं।
वोट सही जगह और सही अनुपात में होना ज़रूरी है।
गठबंधन की मजबूती, वोट ट्रांसफर, उम्मीदवार चयन और ग्राउंड मशीनरी—ये सब सीटें तय करते हैं।
RJD को वोट मिले,
लेकिन NDA ने रणनीति, नीतीश फैक्टर, संगठनात्मक ताकत और वोट बँटवारे के कारण सीटें जीत लीं।
आगे भी बिहार में राजनीति गठबंधन-आधारित ही रहेगी। दलों को व्यापक सामाजिक गठजोड़ और मजबूत बूथ मैनेजमेंट पर ध्यान देना होगा।
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