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भारत की ऊर्जा संप्रभुता: रूसी तेल पर पीएम मोदी को लेकर US दावे के बाद रूस का दिल्ली को खुला समर्थन

वैश्विक ऊर्जा कूटनीति में तनाव बढ़ गया है। US का दावा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद रोकने पर सहमति जताई है। इस बयान के तुरंत बाद रूस ने साफ़ शब्दों में पलटवार किया—यह कहते हुए कि भारत अपनी ऊर्जा नीति खुद तय करेगा। यह टकराव सिर्फ़ बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा ज़रूरतों और भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता की परीक्षा बन गया है।

दांव बहुत बड़े हैं। भारत की ऊर्जा ज़रूरतें उसकी विदेश नीति को दिशा देती हैं। एक तरफ़ रूस से सस्ता तेल, दूसरी ओर अमेरिका की ओर से प्रतिबंधों में एकजुटता का दबाव—इन सबके बीच भारत संतुलन साध रहा है। आइए समझते हैं कि यह टकराव वैश्विक राजनीति में भारत की स्थिति को कैसे परिभाषित करता है।

रूस का स्पष्ट समर्थन: नई दिल्ली के लिए एक रणनीतिक आधार

रूस इस पूरे विवाद में भारत के साथ मजबूती से खड़ा है। मॉस्को के नेतृत्व ने दो टूक कहा है कि भारत अपने ऊर्जा आयात पर खुद फैसला करेगा। यह समर्थन ऐसे समय आया है जब रूसी कच्चे तेल के आयात को लेकर US का दबाव बढ़ रहा है।

भारत–रूस रणनीतिक साझेदारी की पुनः पुष्टि

भारत और रूस का रिश्ता दशकों पुराना है। एस-400 मिसाइल प्रणाली जैसे रक्षा सौदे, संयुक्त सैन्य अभ्यास और तकनीकी सहयोग इस साझेदारी की रीढ़ हैं। ऊर्जा संबंध भी उतने ही गहरे हैं—रूसी तेल भारत की आर्थिक रफ्तार को ईंधन देता है।

रूसी अधिकारी भारत के फैसले को संप्रभुता का सवाल बताते हैं और बाहरी हस्तक्षेप को सिरे से खारिज करते हैं। यह वही भरोसा है जिसने दोनों देशों को पश्चिमी आलोचनाओं के बावजूद साथ बनाए रखा।

हाल ही में मॉस्को में हुई बैठकों में रूसी नेताओं ने कठिन वैश्विक बाज़ार में भारत की “व्यावहारिक नीति” की सराहना की। इससे साफ़ होता है कि रूस भारत को केवल ग्राहक नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदार मानता है।

पश्चिमी प्रतिबंधों और भारतीय तेल खरीद पर रूस का रुख

रूस US प्रतिबंधों को अनुचित मानता है और भारत को तेल आपूर्ति जारी रखने का भरोसा देता है। मॉस्को का कहना है कि सेकेंडरी सैंक्शन्स भी उसकी सप्लाई चेन को नहीं रोक पाएंगे।

पिछले साल दिल्ली में हुई उच्चस्तरीय बैठकों में रूस ने भुगतान व्यवस्था में अड़चन आने पर वैकल्पिक रास्तों का आश्वासन दिया। यह रुख अमेरिकी जी20 बैठकों में दी गई चेतावनियों से बिल्कुल उलट है—जहाँ विकल्प नहीं, बल्कि दबाव की भाषा दिखती है।

रूस साझा लाभ की बात करता है। रुपये–रूबल में व्यापार से डॉलर पर निर्भरता कम होती है, जिससे भारत को सस्ता और स्थिर तेल मिलता है।

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भारत की व्यावहारिक तेल खरीद नीति का विश्लेषण

भारत तेल सौदे राजनीति नहीं, ज़रूरत के आधार पर करता है। रूसी कच्चा तेल भारी छूट के साथ मिलता है और जल्दी आपूर्ति होती है। यही नीति भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक मूल्य झटकों से बचाती है।

आर्थिक मजबूरी: सस्ता कच्चा तेल और वित्तीय स्थिरता

रूस का यूराल्स ब्लेंड अक्सर अंतरराष्ट्रीय कीमतों से 10–15 डॉलर प्रति बैरल सस्ता मिलता है। 2022 की शुरुआत से भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 2% से बढ़कर 40% से अधिक हो गई है।

इससे भारत को हर साल लगभग 5–7 अरब डॉलर की बचत हुई है। जामनगर और कोच्चि की रिफाइनरियाँ इस तेल को प्रोसेस कर वाहनों और उद्योगों के लिए ईंधन बनाती हैं। नतीजा—महंगाई पर नियंत्रण और ऊर्जा क्षेत्र में रोज़गार को सहारा।

अगर ये सौदे न होते, तो भारत का तेल आयात बिल 20–30% तक बढ़ सकता था। सरकारी आंकड़े दिखाते हैं कि पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें अपेक्षाकृत स्थिर रहीं—सीधा फायदा आम जनता को।

ऊर्जा तटस्थता और “नॉन-अलाइनमेंट 2.0”

भारत हर उस देश से तेल खरीदता है जहाँ सौदा फायदेमंद हो। विदेश मंत्रालय इसे “ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि” नीति कहता है। नैतिक उपदेश इस फैसले को नहीं बदलते।

यह पुरानी गुटनिरपेक्ष नीति का आधुनिक रूप है। प्रधानमंत्री मोदी कई बार कह चुके हैं कि भारत “तेल युद्धों” में किसी का पक्ष नहीं लेगा। लक्ष्य सिर्फ़ विकास के लिए ऊर्जा सुनिश्चित करना है।

पश्चिमी देशों के बहिष्कार आह्वानों के जवाब में भारत तथ्य रखता है—उसकी 80% से अधिक ऊर्जा आयात पर निर्भर है। सस्ते स्रोत छोड़ना गरीबों पर सीधा बोझ डालेगा। यही रुख ग्लोबल साउथ के कई देशों को भी प्रेरित करता है।

विविधीकरण बनाम निर्भरता: वैश्विक आपूर्ति संतुलन

भारत पूरी तरह रूस पर निर्भर नहीं है। सऊदी अरब, इराक और अन्य देशों से भी आयात जारी है। रूसी तेल एक अहम हिस्सा है, लेकिन एकमात्र नहीं।

भुगतान के लिए रुपये–रूबल व्यवस्था अपनाई जा रही है, जिससे डॉलर जोखिम घटता है। भारतीय बैंकों में रूसी फंड जमा रहते हैं, जिनका उपयोग व्यापार संतुलन के लिए होता है।

हालाँकि बीमा और शिपिंग एक चुनौती हैं। फिर भी भारत का लक्ष्य स्पष्ट है—विश्वसनीय आपूर्ति, बिना किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता के।

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US कूटनीतिक दबाव और संदेशों की व्याख्या

US सार्वजनिक बयानबाज़ी और निजी बातचीत—दोनों रास्तों से भारत को प्रभावित करने की कोशिश करता है। सार्वजनिक बयान सहयोगियों को साधने के लिए होते हैं, जबकि बंद कमरे की बातचीत में साझेदारी की भाषा रहती है।

सार्वजनिक दावे बनाम निजी कूटनीति

US विदेश विभाग समय-समय पर भारत के रूसी तेल आयात का ज़िक्र करता है और पीएम मोदी से कथित सहमति की बात करता है। लेकिन ठोस विवरण सामने नहीं आते।

निजी स्तर पर अमेरिकी ट्रेज़री और ऊर्जा दूत भारतीय अधिकारियों से मिलकर प्रतिबंधों के जोखिम समझाते हैं। यहाँ ज़ोर दंड पर नहीं, बल्कि साझेदारी पर होता है।

तकनीक और रक्षा सहयोग का दबाव बिंदु

US उन्नत तकनीक और रक्षा सहयोग की पेशकश करता है—सेमीकंडक्टर, एआई और रक्षा नवाचार के जरिए। iCET जैसी पहलें इसका उदाहरण हैं।

लेकिन रूस से मिले S-400 जैसे सिस्टम CAATSA प्रतिबंधों से टकराते हैं। भारत इस संतुलन को साधते हुए अमेरिका से अपाचे हेलिकॉप्टर भी खरीदता है और रूसी प्लेटफॉर्म भी बनाए रखता है।

G7 मूल्य सीमा और वैश्विक ऊर्जा शासन

G7 ने रूसी तेल पर 60 डॉलर प्रति बैरल की मूल्य सीमा तय की। भारत इस व्यवस्था में शामिल नहीं हुआ और छूट के साथ तेल खरीद जारी रखी।

भारत का तर्क है कि यह सीमा अप्रत्यक्ष रूप से उसकी लागत बढ़ाती है। इसलिए वह WTO और IEA जैसे मंचों पर “न्यायसंगत ऊर्जा नियमों” की वकालत करता है।

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व्यवहार में संप्रभुता: भारत का अडिग निर्णय ढांचा

भारत की नीति एक मूल सिद्धांत पर टिकी है—हर देश अपने फैसले खुद करता है। इतिहास इसकी पुष्टि करता है।

स्वतंत्र विदेश नीति के ऐतिहासिक उदाहरण

1971 में बांग्लादेश युद्ध के दौरान भारत ने अमेरिकी दबाव को नज़रअंदाज़ किया और सोवियत संघ के साथ समझौता किया। 1970 के तेल संकट में भी भारत ने समय रहते आपूर्ति विविध की।

आज रूस से तेल खरीद उसी परंपरा की निरंतरता है—राष्ट्रीय हित पहले।

घरेलू राजनीति और जनसमर्थन

सरकार सस्ते तेल को सीधे जनता से जोड़ती है—कम ईंधन कीमतें, किसान और उद्योगों को राहत। सर्वे बताते हैं कि इस नीति को व्यापक समर्थन मिला है।

विपक्ष भी आर्थिक तर्कों से असहमत नहीं। बजट भाषणों में बचत को प्रमुखता से दिखाया जाता है। सोशल मीडिया पर इसे भारत के आत्मसम्मान से जोड़ा जा रहा है।

सीख: बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा में कैसे रास्ता निकाला जाए

भारत का मॉडल दूसरों के लिए सीख है:

  • ज़रूरी वस्तुओं के लिए दीर्घकालिक अनुबंध

  • स्थानीय मुद्राओं में भुगतान

  • आपूर्तिकर्ताओं का विविधीकरण

  • स्पष्ट और तथ्यात्मक कूटनीति

व्यवसायों के लिए भी सबक हैं—वैकल्पिक सप्लायर, अलग वित्तीय चैनल और मजबूत संचार रणनीति।

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भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का भविष्य

रूस का खुला समर्थन भारत को ऊर्जा लक्ष्यों पर अडिग रहने की ताकत देता है। US का दबाव भारत–अमेरिका साझेदारी की सीमाओं को परखता है, लेकिन दिल्ली का रुख स्थिर है।

यह प्रकरण दिखाता है कि 2026 में भी गुटनिरपेक्षता प्रासंगिक है। भारत सस्ता ईंधन हासिल करता है, विकास को गति देता है और दुनिया को दिखाता है कि संप्रभुता कैसे निभाई जाती है।

आगे भी यह संतुलन देखने लायक होगा। अगर आप ऊर्जा, नीति या व्यापार से जुड़े हैं—तो भारत के इस “प्लेबुक” को ध्यान से पढ़िए।
जानकार बने रहिए—आज की दुनिया को ऐसे ही समझदार खिलाड़ियों की ज़रूरत है।

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