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मेरी शादी को पूरे 4 साल हो चुके थे। घर में मेरे

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मेरे पति के अतिरिक्त सासु मां और एक ननद रहती थीं। ननद की भी शादी हो चुकी थी और वह अक्सर हमारे घर आती-जाती रहती थी। एक दिन, मेरे पति और मेरे बीच झगड़ा हो गया। झगड़े के दौरान, मेरी सासु मां हमें समझाने आईं।
मैंने तुरंत ही मां से कहा, “मां जी, आप क्यों नहीं समझा रही हैं इन्हें? मुझे अब अलग रहना है, मुझे अब एक में नहीं रह सकती हूं और मैंने इनसे कहा है कि अब आप में से और मुझ में से किसी एक को चुन लें।”
मां जी ने हैरानी से पूछा, “अरे, यह क्या बोल रही हो? भला मेरा बेटा मुझ में और आप में से किसी एक को क्यों चुनेगा? अभी तक तो सब ठीक ही चल रहा है।”
मैंने कहा, “मां जी, कल आप खुद ननदोई जी को समझा रही थीं कि कैसे उन्हें अपनी पत्नी को चुनना चाहिए। आपने कहा था कि पति-पत्नी का रिश्ता ही सबसे मजबूत होता है और उन्हें अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचना चाहिए। अब वही बात आप अपने बेटे को भी समझाइए।”
मां जी की आँखों में असमंजस था। मैंने अपने पति की तरफ मुड़ते हुए कहा, “मां जी भी आपको यही समझाएंगी कि मां को छोड़कर आप मेरा साथ दीजिए। मैं ही आपके साथ उम्र भर रहूंगी, आप मेरे साथ चलिए, हम बाहर रहेंगे और अपना भविष्य बनाएंगे।”
मां जी अचानक से अपने बेटे के सामने खड़ी हो गईं और रोने लगीं, “नहीं-नहीं, ऐसा मत करना। मैं अपने बेटे के बिना नहीं रह सकती हूं, मेरे बेटे को मुझसे दूर मत ले जाना। मैंने दामाद जी को गलत सलाह दी थी। अब मैं अपनी बेटी को समझाऊंगी।”
मैंने अपनी सास का हाथ पकड़ कर बोला, “मां जी, आप परेशान न हों। हम आपको छोड़कर कहीं नहीं जा रहे हैं। बस हम आपको समझाना चाहते थे कि कल आप जो ननदोई जी को समझा रही थीं, वह पूरी तरह गलत था। कोई पति अपनी पत्नी के लिए अपने परिवार को कैसे छोड़ सकता है?”
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मां जी ने धीरे-धीरे सब समझ लिया। उन्होंने अपनी बेटी को बहुत प्यार से समझाया और एक परिवार टूटने से बच गया। मैंने कहा, “पारिवारिक जिम्मेदारियों से आजाद होना कोई आजादी नहीं होती है। उम्मीद है, आप अब ननद जी को भी जरूर समझाएंगी। जैसे आपको आपका बेटा प्यारा है, वैसे ही ननदोई जी को भी अपने माता-पिता प्यारे हैं।”
मां जी ने मेरी बातें समझी और उन्होंने अपनी बेटी को समझाया। इस तरह, एक घर जो टूटने की कगार पर था, वह बच गया और हमें एक नई समझ और सामंजस्य का रास्ता मिला।