बिहार चुनाव 2025: महागठबंधन तैयार, लेकिन कांग्रेस अब भी कमजोर कड़ी-Temperature
बिहार की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज़ हो गई है। 2025 के विधानसभा चुनाव करीब हैं, और विपक्षी गठबंधन महागठबंधन — जिसमें RJD, JD(U), कांग्रेस और वामपंथी दल शामिल हैं — NDA को कड़ी चुनौती देने की तैयारी कर रहा है।
हालांकि कागज़ पर यह गठबंधन मज़बूत दिखता है, लेकिन अंदरूनी दरारें साफ झलकने लगी हैं।
कांग्रेस की कमजोर स्थिति महागठबंधन के लिए सबसे बड़ा जोखिम बन सकती है।
आइए समझते हैं कि यह गठबंधन कैसे चुनावी तैयारी में जुटा है, और क्यों कांग्रेस इसका सबसे नाज़ुक हिस्सा बनी हुई है।
महागठबंधन की मौजूदा ताकत और प्रमुख खिलाड़ी-Temperature
महागठबंधन की ताकत उसके क्षेत्रीय दिग्गजों के मेल से आती है।
RJD जमीनी वोट बैंक के साथ नेतृत्व करती है।
JD(U) मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अनुभव से स्थिरता लाती है।
वामदलों और छोटे दलों की मौजूदगी से गठबंधन का जातीय संतुलन मज़बूत होता है।
यह गठजोड़ बिहार के विविध मतदाताओं — किसानों, युवाओं, अल्पसंख्यकों और दलितों — को एक साथ लाने की कोशिश करता है।
RJD की भूमिका और वोट बैंक-Temperature
तेजस्वी यादव गठबंधन का चेहरा बन चुके हैं।
युवा मतदाता उन्हें रोजगार, शिक्षा और विकास के वादों के लिए पसंद करते हैं।
2020 के चुनाव में RJD ने 75 सीटें जीती थीं — यह उसके मजबूत वोट आधार को दिखाता है।
लालू प्रसाद यादव की विरासत अब भी पार्टी के लिए सहानुभूति और निष्ठा दोनों लाती है।
हालांकि पुराने भ्रष्टाचार के आरोप कुछ मतदाताओं को दूर भी कर सकते हैं।

RJD इस बार पटना, मुजफ्फरपुर और गया जैसे जिलों में फोकस कर रही है।
घोषणाओं में मुफ्त बिजली, युवाओं के लिए नौकरियां और बेहतर शिक्षा प्रमुख हैं।
JD(U) की भूमिका और नीतीश कुमार का असर-Temperature
नीतीश कुमार अब भी बिहार के सबसे अनुभवी नेता हैं।
उनकी नीतियाँ — सड़क, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय — ग्रामीण वोटरों में गहरी पकड़ बनाए रखती हैं।
JD(U) का मुख्य आधार अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और महादलित समुदाय हैं, जो मिलकर 30% से ज़्यादा मतदाता बनाते हैं।
नीतीश के आने से महागठबंधन की ग्रामीण पहुंच और मजबूत होती है।
हालांकि CM पद को लेकर JD(U) और RJD में खींचतान की संभावना भी बनी रहती है।
अन्य सहयोगी दलों की भूमिका
वामपंथी दल (CPI, CPM) मजदूर वर्ग और औद्योगिक इलाकों में सक्रिय हैं।
HAM (जीतनराम मांझी) और VIP (मुकेश सहनी) जैसे छोटे दल दलित और निषाद समुदायों में पैठ रखते हैं।
यह पूरा गठजोड़ मुस्लिम और दलित वोटों को एकजुट करने की कोशिश करता है।
बिहार में मुसलमानों की आबादी लगभग 17% और
दलितों की करीब 16% है।
पिछले चुनावों में महागठबंधन ने इन समुदायों के लगभग 70% वोट अपने पक्ष में किए थे।
कांग्रेस: महागठबंधन की सबसे कमजोर कड़ी-Temperature
कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखती है, लेकिन बिहार में उसका हाल चिंताजनक है।
कमज़ोर संगठन, गुटबाज़ी और निष्क्रियता गठबंधन के लिए परेशानी बन रही है।
संगठनात्मक कमजोरी और जमीनी निष्क्रियता-Temperature
बिहार कांग्रेस अंदरूनी झगड़ों में उलझी हुई है।
कई जिलों में स्थानीय नेताओं की आपसी खींचतान से कार्यकर्ता भ्रमित हैं।

2020 के चुनावों में कांग्रेस की कई सीटों पर बूथ एजेंट ही नहीं पहुंचे।
गांवों में पार्टी की मौजूदगी बेहद कम है।
उदाहरण के तौर पर, पटना जिले में कांग्रेस के सिर्फ कुछ ही ब्लॉक्स में सक्रिय कार्यकर्ता बचे हैं।
सीट बंटवारे को लेकर असमंजस-Temperature
सीटों को लेकर कांग्रेस और RJD में हमेशा तकरार रहती है।
2020 में कांग्रेस को 70 सीटें मिलीं, लेकिन वह सिर्फ 19 सीटें जीत पाई।
अब RJD और JD(U) कांग्रेस को कम और मुश्किल सीटें देना चाहते हैं।
टिकट वितरण में देरी से प्रचार में भी नुकसान होता है।
राहुल गांधी की छवि और असर
राहुल गांधी की लोकप्रियता राष्ट्रीय स्तर पर है, लेकिन बिहार में स्थानीय नेताओं की तुलना में उनकी अपील सीमित है।
2023 की पटना रैली में बड़ी भीड़ जुटी, मगर बाद में संगठन उस लहर को वोटों में नहीं बदल पाया।
बिहार के मतदाता स्थानीय मुद्दों पर वोट करते हैं — रोजगार, शिक्षा, कानून-व्यवस्था।
राहुल गांधी की सभाओं से चर्चा तो होती है, पर असर सीमित रहता है।
NDA की रणनीति और भाजपा का पलटवार-Temperature
BJP और NDA विपक्ष की कमजोरियों को भांप चुके हैं।
वे कांग्रेस को “महागठबंधन की अस्थिर जड़” बताकर प्रचार कर रहे हैं।
NDA की एकजुटता और मोदी फैक्टर
NDA के लिए सबसे बड़ा सहारा अब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं।
भाजपा, JDU और LJP (RV) जैसे सहयोगी मिलकर जातीय समीकरण साधते हैं।
125 सीटों की पिछली जीत इसी रणनीति की देन थी।

केंद्रीय योजनाओं से जुड़ा लाभ
भाजपा “लाभार्थी वोट बैंक” पर ध्यान दे रही है।
प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 20 लाख से अधिक घर बने।
मुफ्त राशन योजना से 8 करोड़ लोगों को फायदा हुआ।
गरीब और मध्य वर्ग भाजपा के वोट बैंक के रूप में जुड़ रहे हैं।
शहरी युवाओं को नौकरी और स्टार्टअप योजनाओं से लुभाया जा रहा है।
कांग्रेस की कमजोरी का असर-Temperature
महागठबंधन में कांग्रेस की कमजोर स्थिति पूरे गठबंधन का वोट शेयर गिरा सकती है।
अगर कांग्रेस 15 से कम सीटें जीतती है, तो गठबंधन की कुल सीटें 10–20 घट सकती हैं।
कांग्रेस के पास 5–7% वोट शेयर है, जो अगर बिखरता है, तो सीधा फायदा NDA को मिलता है।
उदाहरण के तौर पर,
अगर मुस्लिम वोट कांग्रेस से खिसक गए, तो NDA करीब 40 सीटों में बढ़त बना सकता है।
क्या कांग्रेस की कमजोरी गठबंधन पर भारी पड़ेगी?-Temperature
महागठबंधन के पास तेजस्वी यादव की युवा ताकत और नीतीश कुमार का अनुभव है।
लेकिन कांग्रेस की गुटबाज़ी, सुस्ती और सीमित उपस्थिति इस गठबंधन को कमजोर बना सकती है।
2025 का चुनाव “एकजुटता बनाम संगठन” की परीक्षा होगा।
अगर कांग्रेस ने सुधार किया, तो गठबंधन 100 से अधिक सीटें पलट सकता है।
वरना NDA फिर सत्ता में लौटेगा।
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