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Congress का संकट: चुनावी पराजयों के बीच Rahul Gandhi के नेतृत्व पर उठते सवाल

भारतीय राजनीति में Indian National Congress (कांग्रेस) कभी वह धुरी थी जिसके इर्द-गिर्द सत्ता और विपक्ष की पूरी राजनीति घूमती थी। आज वही पार्टी लगातार चुनावी पराजयों, संगठनात्मक कमजोरी और नेतृत्व पर उठते सवालों से जूझ रही है। इस संकट के केंद्र में राहुल गांधी का नेतृत्व है—एक ऐसा चेहरा जो पार्टी की उम्मीद भी है और आलोचना का कारण भी।

पिछले एक दशक में कांग्रेस का ग्राफ राष्ट्रीय स्तर पर गिरता गया है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को करारी हार मिली। कई राज्यों में सत्ता से बेदखली हुई। ऐसे में यह बहस तेज हो गई है कि क्या राहुल गांधी पार्टी को पुनर्जीवित कर सकते हैं या कांग्रेस को नए नेतृत्व और नई दिशा की जरूरत है?

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: शिखर से गिरावट तक

Congress की विरासत देश की आज़ादी से जुड़ी है। Jawaharlal Nehru से लेकर Indira Gandhi और Rajiv Gandhi तक, गांधी-नेहरू परिवार ने दशकों तक पार्टी का नेतृत्व किया। 2004 और 2009 में Manmohan Singh के नेतृत्व में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की। उस दौर में राहुल गांधी को युवा और परिवर्तनकारी नेता के रूप में पेश किया गया।

लेकिन 2014 में Narendra Modi के नेतृत्व में Bharatiya Janata Party (भाजपा) के उभार ने भारतीय राजनीति का समीकरण बदल दिया। कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट गई—इतिहास की सबसे बड़ी हार। 2019 में भी स्थिति में खास सुधार नहीं हुआ।

राहुल गांधी का नेतृत्व: संभावनाएं और चुनौतियां

राहुल गांधी को अक्सर एक ईमानदार और मुद्दों पर बोलने वाले नेता के रूप में देखा जाता है। उन्होंने बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक न्याय और संस्थाओं की स्वायत्तता जैसे मुद्दों पर खुलकर सरकार की आलोचना की।

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1. जनसंपर्क और भारत जोड़ो यात्रा

2022-23 में राहुल गांधी ने “भारत जोड़ो यात्रा” निकाली। इस यात्रा ने उन्हें जमीनी नेता के रूप में नई पहचान दी। हजारों किलोमीटर की पदयात्रा ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरी और विपक्षी राजनीति में उन्हें प्रमुख चेहरा बनाया।

लेकिन सवाल यह है कि क्या यह जनसंपर्क अभियान चुनावी जीत में बदल पाया? कुछ राज्यों में Congress को सफलता मिली, पर राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण है।

2. निर्णय लेने की शैली

आलोचकों का कहना है कि राहुल गांधी निर्णय लेने में धीमे हैं और संगठन पर उनकी पकड़ कमजोर है। कई वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी छोड़ी, जिनमें गुलाम नबी आजाद जैसे दिग्गज शामिल हैं। इससे यह धारणा बनी कि पार्टी के भीतर संवाद और रणनीतिक स्पष्टता की कमी है।

संगठनात्मक संकट

Congress की सबसे बड़ी समस्या उसका कमजोर संगठन है। भाजपा के पास मजबूत कैडर, संसाधन और जमीनी नेटवर्क है। इसके मुकाबले कांग्रेस कई राज्यों में ढांचा खो चुकी है।

1. राज्यों में गिरती पकड़

उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्यों में Congress की स्थिति हाशिए पर है। दक्षिण भारत में भी पार्टी को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कुछ राज्यों—जैसे कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश—में जीत ने उम्मीद जगाई, लेकिन यह स्थायी पुनरुत्थान का संकेत नहीं माना जा सकता।

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2. नेतृत्व का केंद्रीकरण

Congress में नेतृत्व का अत्यधिक केंद्रीकरण गांधी परिवार के इर्द-गिर्द माना जाता है। कई नेताओं का मानना है कि आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करने की जरूरत है। पार्टी अध्यक्ष पद पर बदलाव के बावजूद, असली निर्णय लेने की शक्ति अब भी सीमित दायरे में सिमटी दिखती है।

वैचारिक स्पष्टता की कमी

Congress पर अक्सर आरोप लगता है कि उसकी वैचारिक स्थिति स्पष्ट नहीं है। भाजपा राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की स्पष्ट विचारधारा के साथ राजनीति करती है। कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय की बात करती है, लेकिन उसका संदेश आम मतदाता तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच पाता।

राहुल गांधी ने सामाजिक न्याय, जाति जनगणना और आर्थिक असमानता को मुद्दा बनाया है। परंतु पार्टी की रणनीति कई बार प्रतिक्रियात्मक दिखती है—यानी भाजपा के एजेंडे के जवाब में एजेंडा तय करना।

चुनावी रणनीति और गठबंधन राजनीति

विपक्षी एकता के प्रयासों में कांग्रेस की भूमिका अहम है। INDIA गठबंधन के गठन ने विपक्ष को एक मंच पर लाने की कोशिश की। लेकिन राज्यों में सीट बंटवारे और नेतृत्व को लेकर मतभेद सामने आते रहे हैं।

राहुल गांधी को एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो गठबंधन की राजनीति को स्वीकार करते हैं। परंतु कई क्षेत्रीय दल Congress को कमजोर साझेदार मानते हैं। यह धारणा भी पार्टी के संकट का हिस्सा है।

जनधारणा और मीडिया नैरेटिव

राहुल गांधी को लेकर मीडिया और सोशल मीडिया में ध्रुवीकरण देखने को मिलता है। समर्थक उन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों की आवाज मानते हैं, जबकि विरोधी उन्हें अनुभवहीन बताते हैं।

राजनीति में छवि का बड़ा महत्व होता है। भाजपा ने राहुल गांधी की छवि पर लगातार हमला किया। इसके विपरीत, कांग्रेस प्रभावी ढंग से अपना नैरेटिव स्थापित नहीं कर सकी।

क्या कांग्रेस को नए नेतृत्व की जरूरत है?

यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या Congress को गांधी परिवार से बाहर किसी नए चेहरे की जरूरत है। कुछ नेताओं का मानना है कि सामूहिक नेतृत्व और क्षेत्रीय नेताओं को अधिक स्वतंत्रता दी जानी चाहिए।

दूसरी ओर, राहुल गांधी के समर्थक कहते हैं कि संकट के समय में निरंतरता जरूरी है। उनका तर्क है कि भाजपा जैसी मजबूत मशीनरी का मुकाबला करने के लिए एक पहचान योग्य चेहरा होना जरूरी है।

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आगे की राह: संभावित समाधान

  1. संगठन का पुनर्निर्माण – बूथ स्तर तक मजबूत नेटवर्क बनाना।

  2. आंतरिक लोकतंत्र – निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता।

  3. स्पष्ट वैचारिक एजेंडा – आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर ठोस नीति।

  4. युवा नेतृत्व को अवसर – नई पीढ़ी को आगे लाना।

  5. संचार रणनीति – डिजिटल और जमीनी स्तर पर प्रभावी संदेश।

Congress का संकट केवल चुनावी हार का परिणाम नहीं है; यह संगठन, विचारधारा और नेतृत्व से जुड़ा गहरा प्रश्न है। राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी ने कुछ सकारात्मक पहल की हैं, लेकिन चुनौतियां अभी भी बड़ी हैं।

भारतीय राजनीति में विपक्ष की मजबूत उपस्थिति लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। कांग्रेस यदि खुद को पुनर्गठित कर पाती है, तो वह फिर से राष्ट्रीय राजनीति में केंद्रीय भूमिका निभा सकती है।

राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे आलोचनाओं को अवसर में बदलें और पार्टी को एक नई ऊर्जा, स्पष्ट दृष्टि और मजबूत संगठन के साथ आगे बढ़ाएं।

आने वाले चुनाव तय करेंगे कि यह संकट अस्थायी है या कांग्रेस के लिए दीर्घकालिक परिवर्तन का संकेत।

विपक्ष LokSabha अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव तैयार कर रहा है।

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