UP में मतदाता सूची से 2.79 करोड़ नाम हटाए गए: अखिलेश यादव का BJP पर ‘वोटर दमन’ का आरोप
UP में मतदाता सूची से 2.79 करोड़ नामों के हटाए जाने की खबर ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा किया गया “वोटर दमन” बताया है। उनका आरोप है कि आने वाले चुनावों से पहले विपक्ष के समर्थक वर्गों को वोट देने से वंचित करने की साजिश रची गई है।
वहीं, चुनाव आयोग (ECI) का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन रखने के लिए की गई एक नियमित कवायद है। लेकिन इतनी बड़ी संख्या में नाम हटने से सवाल उठना स्वाभाविक है—खासकर तब, जब आशंका जताई जा रही हो कि इसका असर गरीबों, अल्पसंख्यकों और प्रवासी मज़दूरों पर ज़्यादा पड़ा है।
मतदाता सूची संशोधन: आंकड़े और चुनाव आयोग का पक्ष-UP
चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के सभी 80 ज़िलों में मतदाता सूची का व्यापक पुनरीक्षण किया। इसका उद्देश्य मृत मतदाताओं, स्थान बदल चुके लोगों और डुप्लीकेट नामों को हटाना बताया गया।
आधिकारिक आंकड़े क्या कहते हैं?
2.79 करोड़ नाम हटाए गए
करीब 1.5 करोड़ नए मतदाता जोड़े गए
कुल मिलाकर मतदाता संख्या में लगभग 1.29 करोड़ की कमी
अब यूपी में कुल मतदाता लगभग 14.5 करोड़
चुनाव आयोग के अनुसार:
सबसे ज़्यादा नाम ग्रामीण इलाकों से हटे (लगभग 60%)
मृतकों, पलायन कर चुके लोगों और दोहरे नामों को हटाया गया
नए मतदाता ज़्यादातर युवा और नए पते पर रहने वाले लोग हैं

चुनाव आयोग का तर्क
ECI का कहना है कि:
यह प्रक्रिया Representation of the People Act के तहत की गई
हर हटाए गए नाम के लिए आपत्ति और अपील का मौका दिया गया
बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) ने घर-घर जाकर सत्यापन किया
इसमें कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं हुआ
फिर भी, आलोचकों का कहना है कि इतनी तेज़ और बड़े पैमाने पर की गई प्रक्रिया में गलतियाँ होना तय है।
अखिलेश यादव का हमला: “वोट की चोरी”-UP
अखिलेश यादव ने इस पूरे मामले को लेकर BJP पर तीखा हमला बोला। उन्होंने सोशल मीडिया और रैलियों में कहा:
“यह वोटर लिस्ट की सफाई नहीं, बल्कि वोटरों की सफाई है।”
समाजवादी पार्टी ने चुनाव आयोग से औपचारिक शिकायत की है और प्रभावित लोगों की मदद के लिए दोबारा पंजीकरण अभियान शुरू किया है।
हाशिए के वर्गों को निशाना बनाने का आरोप
SP का दावा है कि:
दलित, मुस्लिम और गरीब मज़दूर वर्ग सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए
लखनऊ, वाराणसी और पूर्वी यूपी के इलाकों में SP समर्थक क्षेत्रों से ज़्यादा नाम हटे
बिहार और अन्य राज्यों में काम करने गए प्रवासी मज़दूरों के नाम हटाए गए
कई बुज़ुर्ग मतदाताओं के नाम भी गलती से काट दिए गए
एक SP सांसद ने कहा,
“जो आवाज़ें BJP को पसंद नहीं, उन्हें चुप कराने की कोशिश हो रही है।”
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चुनावी असर और राजनीतिक नतीजे-UP
यह मुद्दा आने वाले:
उपचुनावों
2027 के विधानसभा चुनावों
पर बड़ा असर डाल सकता है।
अखिलेश यादव इसे BJP के खिलाफ एक बड़े मुद्दे के तौर पर उठा रहे हैं। SP की रणनीति है:
घर-घर जाकर नाम जुड़वाना
युवाओं और प्रवासियों को जागरूक करना
इसे “लोकतंत्र बनाम सत्ता” की लड़ाई बनाना
तकनीकी प्रक्रिया: नाम कैसे हटते हैं?
EPIC और आधार लिंकिंग
हर मतदाता का EPIC (वोटर ID) होता है
इसे आधार, मृत्यु रजिस्टर और माइग्रेशन डेटा से मिलाया जाता है
मेल न होने पर नाम “संदिग्ध” माना जाता है
करीब 40% नाम ऑटोमैटिक डेटा मिलान के ज़रिए हटे।
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बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) की भूमिका
UP में करीब 2 लाख BLOs
घर जाकर सत्यापन
घर बंद मिलने या पड़ोसियों से जानकारी मिलने पर नाम हटाना
तेज़ समयसीमा और मानवीय भूल से गलतियाँ होने की आशंका रहती है।
पहले भी हुए हैं ऐसे बड़े संशोधन-UP
UP 2021: 1.2 करोड़ नाम हटे
बिहार 2020: 70 लाख नाम हटे
लेकिन 2025 का आंकड़ा अब तक का सबसे बड़ा है। तकनीक बेहतर हुई है, लेकिन विवाद भी उतना ही बढ़ा है।
अगर आपका नाम हट गया है तो क्या करें?
घबराने की ज़रूरत नहीं है।
तुरंत ये कदम उठाएँ:
NVSP पोर्टल या Voter Helpline ऐप पर नाम चेक करें
Form 6 भरकर दोबारा पंजीकरण करें
पहचान और पते का प्रमाण लगाएँ
आवेदन की स्थिति ट्रैक करें
कई नागरिक संगठन मुफ्त मदद भी दे रहे हैं।
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BJP का बचाव: “स्वच्छ चुनाव की दिशा में कदम”-UP
BJP का कहना है:
“घोस्ट वोटर” हटाए गए
1 करोड़ से ज़्यादा नाम मृत व्यक्तियों के थे
प्रवास और डुप्लीकेट एंट्री हटाई गई
युवाओं के नाम जोड़े गए हैं
उनका आरोप है कि विपक्ष डर फैलाकर राजनीतिक फायदा उठाना चाहता है।
सवाल अब भी कायम
2.79 करोड़ नामों का हटना कोई छोटी बात नहीं है।
एक तरफ चुनाव आयोग और BJP इसे चुनावी शुद्धता बता रहे हैं,
तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव इसे लोकतंत्र पर चोट मानते हैं।
सच क्या है—यह आगे की जांच, अपीलों और पारदर्शिता से ही साफ़ होगा।
BJP के अनुसार, राहुल गांधी कांग्रेस, सहयोगी दलों और यहां तक कि परिवार के भीतर भी अपना समर्थन खो रहे हैं।
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