UP में एकीकृत न्यायालय परिसरों की पहल: न्यायिक अवसंरचना के लिए राष्ट्रीय मानक
कल्पना कीजिए एक ऐसी इमारत की, जहाँ आप मुकदमा दर्ज करा सकें, सुनवाई में शामिल हों और कानूनी सहायता भी पा सकें—वह भी एक ही जगह। यही वादा UP में बन रहे नए एकीकृत न्यायालय परिसरों (Integrated Court Complexes) का है। हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ ने इन परियोजनाओं को पूरे देश के लिए “गेम प्लान” बताया और कहा कि ये न्याय व्यवस्था की गहरी जड़ों वाली समस्याओं को दूर करने की क्षमता रखती हैं।
आज भारत में अदालतों की स्थिति अक्सर पुरानी और बिखरी हुई लगती है। वादियों को अपने ही मामले के अलग-अलग चरणों के लिए अलग-अलग इमारतों में भटकना पड़ता है। इससे समय और पैसे दोनों की बर्बादी होती है—खासतौर पर UP जैसे राज्य में, जहाँ आबादी 20 करोड़ से ज्यादा है। CJI के बयान यह साफ करते हैं कि ये एकीकृत परिसर सिर्फ इमारतें नहीं हैं, बल्कि न्याय को तेज, निष्पक्ष और सुलभ बनाने की दिशा में बड़ा कदम हैं। संक्षेप में, यूपी की यह पहल पूरे देश को बेहतर न्यायिक ढांचे की राह दिखा सकती है।
CJI का समर्थन: एकीकृत परिसरों के पीछे का विज़न और तर्क
आधुनिकीकरण और दक्षता की जरूरत
मुख्य न्यायाधीश ने साफ कहा कि पुरानी अदालत संरचनाएँ अब काम की नहीं रहीं। उन्होंने बताया कि UP में वकीलों और वादियों को छोटे-छोटे कामों के लिए भी कई किलोमीटर यात्रा करनी पड़ती है। नए एकीकृत परिसर सभी सेवाओं को एक छत के नीचे लाते हैं, जिससे झंझट कम होता है और काम तेज होता है।
इसे आप “वन-स्टॉप जस्टिस हब” कह सकते हैं। इसमें कोर्टरूम, दफ्तर और सहायक सेवाएँ एक साथ होती हैं। इससे मामलों में अनावश्यक देरी घटती है और लोगों को जल्दी न्याय मिलता है। CJI के अनुसार, यह मॉडल देशभर में लंबित मामलों (जो 5 करोड़ से अधिक हैं) को निपटाने में मदद कर सकता है।

देशभर में अवसंरचना की कमी को दूर करना
भारत की कई अदालतें जगह और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रही हैं। कई जगहों पर न तो पर्याप्त कोर्टरूम हैं, न ही बिजली या एयर कंडीशनिंग जैसी सुविधाएँ। ग्रामीण इलाकों में तो हालत और भी खराब है, जहाँ लोग पहुँच के अभाव में सुनवाई तक छोड़ देते हैं।
UP के एकीकृत परिसर राष्ट्रीय स्तर पर न्यायिक अवसंरचना सुधार की मांगों से जुड़ते हैं। CJI ने कहा कि यूपी इन निर्देशों पर तेजी से काम कर रहा है, जिससे बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के लिए भी एक मिसाल बनती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे केंद्रों के बिना न्याय आम लोगों की पहुँच से बाहर ही रहेगा।
UP के एकीकृत न्यायालय परिसरों की प्रमुख विशेषताएँ
तकनीकी एकीकरण और डिजिटल ढांचा
इन परिसरों में आधुनिक तकनीक का व्यापक इस्तेमाल हो रहा है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए दूरदराज के लोगों के लिए सुनवाई आसान होती है। यह व्यवस्था राष्ट्रीय ई-कोर्ट्स परियोजना से जुड़ी हुई है।
ई-फाइलिंग से दस्तावेज ऑनलाइन जमा होते हैं, लंबी कतारों की जरूरत नहीं। महामारी के दौरान शुरू हुई वर्चुअल सुनवाई अब स्थायी व्यवस्था बन चुकी है। केस ट्रैकिंग सिस्टम से जज और वादी दोनों को रियल-टाइम अपडेट मिलते हैं। यूपी जल्द ही ऐसे 20 परिसरों की योजना बना रहा है।
वास्तुशिल्प और सुलभता मानक
इन इमारतों का डिज़ाइन सभी के लिए अनुकूल है। व्हीलचेयर रैंप, चौड़े दरवाजे और सुलभ शौचालय दिव्यांगों के लिए मददगार हैं। कोर्टरूम में बेहतर रोशनी और वेंटिलेशन है। जजों के लिए पास में ही चैंबर, वकीलों के लिए लाइब्रेरी और बार रूम उपलब्ध हैं।
कानूनी सहायता केंद्र, महिलाओं और बच्चों के लिए सुरक्षित प्रतीक्षालय और सूचना revealing स्क्रीन इन परिसरों को डरावनी नहीं, बल्कि मित्रवत बनाते हैं। साथ ही, सोलर पैनल और जल संरक्षण जैसी हरित तकनीकें भी अपनाई जा रही हैं।

आर्थिक और न्यायिक प्रभाव
वादियों के अनुभव और न्याय तक पहुँच में सुधार
आम नागरिकों के लिए यह व्यवस्था बड़ा बदलाव है। एक ही स्थान पर पूरा काम होने से यात्रा खर्च घटता है, जो खासकर गरीब और मध्यम वर्ग के लिए राहत है। पीड़ितों और गवाहों के लिए सुरक्षित कमरे, महिलाओं और बच्चों के लिए प्राथमिक सुविधाएँ न्याय प्रक्रिया को मानवीय बनाती हैं।
कानूनी पेशेवरों के विकास को बढ़ावा
वकीलों को बेहतर लाइब्रेरी और शांत कार्यस्थल मिलते हैं। जजों के लिए अतिरिक्त कोर्टरूम और प्रशिक्षण कक्ष उपलब्ध हैं। इससे न केवल कार्यक्षमता बढ़ती है, बल्कि मनोबल भी ऊँचा होता है। यूपी में सैकड़ों नई बेंच जुड़ने की संभावना है, जिससे लंबित मामलों का बोझ घटेगा।
वित्तपोषण, क्रियान्वयन और राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार
सार्वजनिक-निजी भागीदारी और निवेश रणनीति
इन परियोजनाओं में केंद्र सरकार से ₹1,000 करोड़ से अधिक की सहायता मिली है। राज्य सरकार और निजी साझेदार तकनीक व सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में योगदान दे रहे हैं। कुल निवेश लगभग ₹5,000 करोड़ का है। लखनऊ और आगरा में परियोजनाएँ 2026 तक पूरी होने की राह पर हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर अपनाने की संभावना
कम समय में निर्माण और तेज तकनीकी अपनाने के कारण यूपी मॉडल चर्चा में है। विशेषज्ञों का मानना है कि 2030 तक इसे देशभर में लागू किया जा सकता है, स्थानीय जरूरतों के अनुसार थोड़े बदलावों के साथ।

भारत में न्यायिक अवसंरचना का नया युग
UP के एकीकृत न्यायालय परिसर न्यायिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव लाते हैं। ये बिखरी हुई अदालतों को एक संगठित, आधुनिक और सुलभ प्रणाली में बदलते हैं। CJI का समर्थन बताता है कि यह मॉडल पूरे देश में न्याय को बेहतर बना सकता है।
वादियों को सुविधा, पेशेवरों को बेहतर संसाधन और सिस्टम को गति—यही इस पहल की ताकत है। UP ने रास्ता दिखाया है; अब उम्मीद है कि बाकी देश भी इसका अनुसरण करेगा।
मुख्य बिंदु
आधुनिकीकरण: एक ही छत के नीचे सेवाएँ, कम देरी
सुलभता: दिव्यांगों और जरूरतमंदों के लिए अनुकूल डिज़ाइन
तकनीक: ई-कोर्ट्स, वीडियो सुनवाई और डिजिटल ट्रैकिंग
राष्ट्रीय मानक: UP मॉडल, अन्य राज्यों के लिए मार्गदर्शक
न्याय व्यवस्था में इस बदलाव पर आपकी क्या राय है? क्या आपके इलाके में ऐसे सुधारों की जरूरत है?
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