Uttar Pradesh

नवरात्रि हिन्दू धर्म

नवरात्रि हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। नवमी (नवाँ दिन), जिसे महानवमी कहा जाता है, विशेष महत्व रखती है। इस दिन विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, जिनमें कन्या पूजन एक प्रतिष्ठित विधि है—जिसमें छोटी कन्याओं को देवी का रूप मानकर पूजा जाता है, उनके चरण धोए जाते हैं, चुनरी ओढ़ाई जाती है और उन्हें आशीर्वाद व प्रसाद दिया जाता है।

Uttar Pradesh के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, जो गोरखनाथ मठ के गोरक्षपीठाधीश्वर भी हैं, ने हाल ही में (1 अक्टूबर 2025) शारदीय नवरात्र की महानवमी पर गोरखनाथ मंदिर परिसर में कन्या पूजन की। यह काम उनकी धार्मिक आस्था, राजनीतिक छवि और सांस्कृतिक प्रतीकवाद का मिश्रण है।

नीचे इस घटना का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत है:

1. घटना का संक्षिप्त विवरण

  • तारीख और स्थान: 1 अक्टूबर 2025 (बुधवार), गोरखनाथ मंदिर, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।

  • अधिकारिक स्थिति: योगी आदित्यनाथ न केवल मुख्यमंत्री हैं, बल्कि गोरखनाथ मंदिर से जुड़े गोरक्षपीठाधीश्वर की भूमिका भी निभाते हैं, इस कारण उनकी भागीदारी धार्मिक पैमाने पर भी ध्यान खींचती है।

  • पूजा‑अनुष्ठान: योगी आदित्यनाथ ने मां सिद्धिदात्री (नवाँ स्वरूप) की विधि-विधान से पूजा की। इसके बाद उन्होंने कन्याओं के पांव धोए, उन पर तिलक लगाया, चुनरी ओढ़ाई, आशीर्वाद लिया और उन्हें भोजन कराया। उन्होंने कन्याओं को दक्षिणा एवं उपहार भी दिए।

  • अन्य आयोजन: इस आयोजन के दौरान मंदिर परिसर में भक्ति का माहौल था। कार्यक्रम का वीडियो भी सामने आया, जिसमें स्पष्ट दिखाया गया कि यह समारोह बड़ी श्रद्धा व परंपरा के अनुरूप हुआ।

इस घटना को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए — यह राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश भी देता है।

2. धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि: कन्या पूजन की महत्वता

2.1 नवरात्रि और महानवमी की पावनता

नवरात्रि नौ रातों तक चलने वाला उत्सव है, जिसमें माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है — शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कायलकमणि, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। नवमी तिथि पर विशेष पूजा, हवन आदि अनुष्ठान किए जाते हैं।

सीएम योगी ने चैत्र नवरात्र की नवमी तिथि पर नौ दुर्गा स्वरूपा कुंवारी  कन्याओं के पखारे पांव

महानवमी के दिन अक्सर विजया दशमी / दशहरा की पूर्व संध्या भी होती है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। इसलिए नवमी को अधिष्ठात्री देवी का विशेष सम्मान प्राप्त है।

2.2 कन्या पूजन की शुरुआत और दर्शन

कन्या पूजन (जिसे “कन्याघ्नता” या “कन्यापूजा” भी कहा जाता है) का लोकतांत्रिक एवं सांस्कृतिक महत्व है। इस अनुष्ठान में:

  • कन्याओं को देवी का रूप माना जाता है।

  • उनके चरणों को धोया जाता है — यह सेवा और भक्ति का प्रतीक है।

  • चुनरी, तिलक, आशीर्वाद, दक्षिणा — ये सब विधियां उन्हें सम्मान देने की अभिव्यक्ति हैं।

  • यह नारी-शक्ति (स्त्री शक्ति) की प्रतिष्ठा करता है।

यह रीति हिन्दू समाज में यह विचार देता है कि “नारी नहीं, देवी” — अर्थात् प्रत्येक लड़की में दिव्य शक्ति विद्यमान है। ऐसे अनुष्ठान सामाजिक सोच को प्रभावित करते हैं, जो लड़कियों को सम्मान और गरिमा देने की संस्कृति को बढ़ावा देते हैं।

2.3 उत्तर प्रदेश और गोरखनाथ मठ में परंपरा

गोरखनाथ मंदिर और उससे जुड़े गोरक्षपीठ धर्म और संस्कृति में प्राचीन महत्व रखते हैं। योगी आदित्यनाथ, गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर होने के नाते, इन धार्मिक अनुष्ठानों को अपनाते हैं। इस वातावरण में, वैसे अनुष्ठान जो मंदिर से जुड़े हों, धार्मिक व सांस्कृतिक मान्यता पाते हैं और जनसाधारण में उनकी विश्वसनीयता अधिक होती है।

3. योगी आदित्यनाथ की भूमिका: धार्मिक, राजनीतिक और छवि निर्माण

3.1 धार्मिक नेता के रूप में

योगी आदित्यनाथ ने खुद भी सनातन धर्म और नाथ पंथ की परंपरा से जुड़ी छवि बनाई है। वे गोरखनाथ मठ से सीधे जुड़े रहे हैं और धार्मिक आयोजनों में उनकी उपस्थिति नियमित है। इस प्रकार, कन्या पूजन जैसे अनुष्ठान उन्हें धार्मिक नेता के रूप में और अधिक प्रतिष्ठा देते हैं।

UP News: सीएम योगी ने कन्या पूजन कर मातृ शक्ति की आराधना की, कन्याओं के  पखारे पांव; देखें तस्वीरें - CM Yogi Adityanath Worships Mother Power by  Performing Kanya Pujan in Gorakhpur

3.2 राजनीतिक संदेश

इस तरह के अनुष्ठान में भागीदारी राजनीतिक लाभ भी देती है:

  • सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सशक्त संकेत मिलता है।

  • उनकी हिंदू‑धार्मिक नेतृत्व की छवि को मजबूत करती है।

  • उन समर्थकों को संदेश देती है कि उनका नेता धार्मिक परंपराओं से समर्पित है।

  • विरोधी दलों को यह चुनौती देती है कि “संस्कृति और धर्म” मुद्दे को कैसे पकड़ेंगे।

इस प्रकार, कन्या पूजन एक धार्मिक आयोजन होने के साथ-साथ सामाजिक-राजनीतिक प्रतीक भी बन जाता है।

3.3 सामाजिक और नैतिक दायित्व

पुरी तरह से यह भी देखा जाता है कि इस तरह का आयोजन एक नैतिक दायित्व का भाव देता है — अर्थात् सरकार और सत्ता यह दिखाना चाहती है कि वे नारी-शक्ति का सम्मान करते हैं। इस तरह की छवि उन सामाजिक समूहों को प्रभावित करती है जो महिला सशक्तिकरण, बेटी बचाओ आदि अभियानों को महत्व देते हैं।

4. विश्लेषण: इस क्रिया का समाज पर संभावित प्रभाव

यहां हम इस घटना के सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों पहलुओं का विश्लेषण करेंगे।

4.1 सकारात्मक प्रभाव

  1. महिला सम्मान की संस्कृति को बढ़ावा
    कन्या पूजन का आयोजन यह संदेश देता है कि लड़कियों को देवी का दर्जा देना चाहिए। यह सामाजिक चेतना को बढ़ावा दे सकता है कि बच्ची को माता समान सम्मान मिले।

  2. धार्मिक और सांस्कृतिक जागरूकता
    इस प्रकार के आयोजनों से लोग अपने धर्म, परंपरा और रीति-रिवाजों के प्रति अधिक जागरूक होते हैं। वे पुराने त्योहारों और अनुष्ठानों को पुनर्जीवित करते हैं।

  3. स्थानीय समाज में प्रेरणा
    जब मुख्यमंत्री जैसे उच्च पदाधिकारियों द्वारा ऐसा किया जाए, तो यह आम लोगों को प्रेरणा दे सकता है कि वे भी धार्मिक व सामाजिक कार्यों में भाग लें।

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  1. नारी सशक्तिकरण की प्रतीकात्मकता
    कन्याओं को सम्मान देना, उन्हें आशीर्वाद देना और उनकी गरिमा को उजागर करना एक सशक्त प्रतीक बन सकता है, विशेषकर उन इलाकों में जहाँ लैंगिक भेदभाव गहरा है।

4.2 आलोचनाएँ और नकारात्मक पहलू

  1. प्रतीकात्मकता बनकर रह जाना
    अगर इस तरह के आयोजन केवल दिखावा बन जाए, लेकिन सरकार की नीतियाँ (शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा) लड़कियों के लिए मजबूत न हों, तो यह सिर्फ प्रतीकात्मक रह जाता है।

  2. लेखा-जोखा का दबाव
    जनता और विपक्ष यह पूछ सकते हैं — इतने धार्मिक कार्यक्रमों के बीच, क्या बेटियों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता जैसे ठोस कदम उठाए जा रहे हैं?

  3. धार्मिक ताने-बाने और विभाजन
    जब कोई धार्मिक अनुष्ठान ऐसी स्थिति में आयोजित हो, तो संप्रदाय या अल्पसंख्यक समुदाय इसे राजनीतिक उद्देश्य या सांप्रदायिक संकेत मान सकते हैं। धार्मिक राजनीति और सांस्कृतिक हाशिएकरण की संभावना बन सकती है।

  4. आयोजन का खर्च और प्राथमिकता
    बड़े आयोजन में संसाधन और सरकारी मशीनरी लगती है। जनता यह सवाल उठा सकती है कि क्या ऐसे कार्यक्रमों पर खर्च करना प्राथमिकता है जब विकास, बुनियादी सुविधाएँ, शिक्षा और स्वास्थ्य को बेहतर करना आवश्यक है।

  5. समान अवसर की समस्या
    यदि केवल कुछ चयनित कन्याओं को ही पूजन और सम्मान मिलें, तो यह असमानता का संकेत बन सकता है। की दृष्टि से, आयोजन को अधिक समावेशी बनाना चाहिए।

5. तुलनात्मक दृष्टि: पूर्व वर्षों में कन्या पूजन और योगी की शैली

योगी आदित्यनाथ ने पहले भी नवरात्रि, रामनवमी आदि अवसरों पर कन्या पूजन किया है:

  • साल 2024 में उन्होंने महानवमी पर गोरखनाथ मंदिर में कन्या पूजन किया, जिसमें नौ कन्याओं के चरण धोए, चुनरी पहनाई और भोजन कराया गया।

  • 2022 में रामनवमी के अवसर पर भी उन्होंने कन्या पूजन किया था।

  • 2025 के चैत (वसंत नवरात्र) पर भी उन्होंने कन्या पूजन किया, इस अवसर पर “मातृशक्ति की भक्ति” पर बल दिया।

इस रीतिगत निरंतरता से यह स्पष्ट है कि योगी आदित्यनाथ यह अनुष्ठान नियमित रूप से करते हैं, और इसे अपनी धार्मिक छवि से जोड़ते हैं।

6. राजनीतिक, सामाजिक और मीडिया पक्ष

6.1 मीडिया कवरेज और सार्वजनिक प्रतिध्वनि

  • दैनिक समाचार पत्रों और ऑनलाइन मीडिया ने इस घटना को प्रमुखता से प्रकाशित किया है। (उदाहरण: Navbharat Times ने विस्तृत रिपोर्ट दी है)

  • TOI ने लिखा कि इस अवसर पर ‘मातृशक्ति’ के प्रति भारतीय संस्कृति की श्रद्धा को उजागर किया गया। अन्य मीडिया सूत्रों ने इसे सकारात्मक सामाजिक संदेश के रूप में देखा।

जनता में प्रतिक्रियाएँ मिली-जुली हो सकती हैं — समर्थक इसे धार्मिक श्रद्धा और महिला सम्मान का प्रतीक मानेंगे; आलोचक सवाल उठाएंगे कि यह राजनीति की चाबी तो नहीं?

6.2 राजनीतिक दृष्टिकोण

  • भाजपा समर्थकों और धर्मनिरपेक्ष समूहों में यह कदम सराहनीय माना जाएगा।

  • विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ता यह कह सकते हैं कि इस तरह की धार्मिक गतिविधियों को राजनीतिक लाभ के उद्देश्य से प्रयोग किया जाता है।

  • आगामी चुनावों में धार्मिक- सांस्कृतिक मुद्दों का उपयोग होने की संभावना बढ़ जाती है।

6.3 सामाजिक विमर्श

इस तरह की घटनाओं से समाज में यह विमर्श उठ सकता है:

  • क्या धार्मिक अनुष्ठानों को राजनीतिक प्रचार का हिस्सा बनाया जाना चाहिए?

  • समाज में लड़कियों की सशक्तिकरण की दिशा में कितने ठोस कदम उठाए जाते हैं?

  • क्या इस तरह के अनुष्ठानों को और अधिक समावेशी बनाया जाना चाहिए (समाज के सभी वर्गों को शामिल करना)?

  • धार्मिक नेता और राजनीतिक नेता के बीच विभाजित भूमिका — कब वे धर्म के प्रतिनिधि हैं, और कब राजनीतिक प्रतिनिधि?

UP News: सीएम योगी ने कन्या पूजन कर मातृ शक्ति की आराधना की, कन्याओं के  पखारे पांव; देखें तस्वीरें - CM Yogi Adityanath Worships Mother Power by  Performing Kanya Pujan in Gorakhpur

7.1 सुझाव

  1. समावेशी आयोजन
    कन्या पूजन कार्यक्रमों में अधिक संख्या में लड़कियों को शामिल किया जाए, विविध पृष्ठभूमि से — ग्रामीण, शहरी, वंचित समुदायों से।

  2. पाठशाला, स्वास्थ्य, सुरक्षा पूर्वानुभव
    कार्यक्रमों को इस तरह जोड़ा जाए कि समारोह के साथ-साथ लड़कियों को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं या सुरक्षा जानकारी भी दी जाए।

  3. पारदर्शिता और बजट लेखा-जोखा
    आयोजन की लागत, संसाधन उपयोग, और सरकार की प्राथमिकताओं का सार्वजनिक लेखा-जोखा हो।

  4. बहु-सांस्कृतिक संवाद
    अन्य धर्मों और समुदायों को भी शामिल करने की पहल की जाए ताकि यह सिर्फ धार्मिक आयोजन न बनकर सांस्कृतिक संवाद बने।

  5. निरंतरता और नीतिगत समर्थन
    केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि नीतियों (शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा) पर निरंतर काम किया जाए।

Uttar Pradesh के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा महानवमी पर गोरखनाथ मंदिर में कन्या पूजन करना धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण घटना है। यह एक ऐसी शक्ति का प्रतीक बन जाता है जो नारी सम्मान, देवी पूजा और सामाजिक मान्यताओं को जोड़ता है। लेकिन इस तरह के आयोजनों को केवल उत्सव या प्रतीकात्मकता तक सीमित नहीं रहने देना चाहिए — उन्हें सशक्त नीति, समावेशी दृष्टिकोण और सामाजिक न्याय के साथ जोड़ना चाहिए।

इस घटना से स्पष्ट है कि राजनीति और धर्म का परस्पर संबंध कितना जटिल हो सकता है। एक तरफ यह धार्मिक श्रद्धा को पुष्ट करती है, तो दूसरी ओर लोगों के मन में यह सवाल भी खड़ा कर सकती है कि क्या ये अनुष्ठान वास्तविक सुधार के साथ जुड़े हैं, या केवल छवि निर्माण का माध्यम हैं।

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