Rohit आर्य कौन था? मुंबई के हॉस्टेज क्राइसिस का आरोपी, जो एनकाउंटर में मारा गया
सोचिए—मुंबई की व्यस्त रात, सड़कों पर सायरन, गोलियों की आवाज़ें गूंजती हैं। पुलिस चारों ओर फैली हुई है। और इस अफरा-तफरी के बीच, एक नाम सुर्खियों में है — रोहित आर्य। डर और अपराध से जुड़ा एक चेहरा। एक ऐसा व्यक्ति जिसकी कहानी गोलियों की बौछार में खत्म हुई। यह घटना पूरे शहर को हिला गई और कानून व न्याय के बीच की महीन रेखा पर सवाल खड़े कर गई।
Rohit आर्य: आपराधिक जीवन और पृष्ठभूमि
Rohit आर्य का जन्म 1980 के दशक की शुरुआत में मुंबई की झोपड़पट्टियों में हुआ था। गरीबी ने बचपन से ही उसका पीछा नहीं छोड़ा। परिवार मुश्किल से गुज़ारा करता था। उसने स्कूल बीच में ही छोड़ दिया और किशोर उम्र में ही स्थानीय गैंगों में शामिल हो गया।
छोटे अपराधों से शुरुआत की — मोबाइल चोरी, जेबकटी, फिर बढ़कर डकैती और लूटपाट तक पहुंच गया। धीरे-धीरे उसका नाम पुलिस रिकॉर्ड में आने लगा।
पहली गिरफ्तारी: 2012 में चोरी के आरोप में।
दूसरी गिरफ्तारी: 2016 में हमले के केस में।
गैंग कनेक्शन: ठाणे स्थित एक गिरोह से ढीला संबंध।
हथियार: छोटे पिस्तौल और चाकू का इस्तेमाल।
2015 में अंधेरी इलाके में चेन स्नैचिंग की वारदातों में उसका नाम जुड़ा। कई महीनों की जेल के बाद वह जमानत पर छूट गया। 2018 के कोर्ट रिकॉर्ड दिखाते हैं कि उसने कुछ स्थानीय व्यापारियों से उगाही (extortion) भी की थी। गवाहों के अनुसार, वह ठंडे दिमाग वाला लेकिन खतरनाक व्यक्ति था — बिना गुस्से के, मगर पूरी योजना के साथ काम करता था।

मुंबई हॉस्टेज घटना: पूरी समयरेखा
मकसद और योजना
पैसा ही इस अपराध की जड़ था। Rohit आर्य ने बांद्रा में रहने वाले एक अमीर व्यापारी परिवार को निशाना बनाया। उसने हफ्तों तक उस घर की निगरानी की। अपने दो पुराने साथियों के साथ उसने योजना बनाई — परिवार को अगवा कर 50 लाख रुपये की फिरौती वसूलनी थी।
अक्टूबर 2022 की एक बारिश भरी शाम को तीनों ने नकाब पहनकर घर में घुसपैठ की। परिवार के चारों सदस्यों को बंधक बना लिया गया।
घटनास्थल की स्थिति
परिवार के सदस्यों — पति, पत्नी और दो बच्चों — को रस्सियों से बांध दिया गया। Rohit ने परिवार के दफ्तर को कॉल कर पैसे की मांग की। “पैसे दो, वरना अंजाम बुरा होगा,” उसने चेतावनी दी।
रात के लगभग 8 बजे पुलिस को कॉल मिला। पड़ोसियों ने चीखें सुनीं। तुरंत इलाके को घेर लिया गया। मुंबई पुलिस की क्विक रिस्पॉन्स टीम (QRT) मौके पर पहुंची। बिजली काटी गई, स्नाइपर्स तैनात हुए। माहौल में सन्नाटा और डर था।
बंधक बने: 4 लोग, 6 घंटे तक।
मांग: 50 लाख रुपये नकद।
प्रारंभिक कार्रवाई: रात 9 बजे तक इलाके की नाकेबंदी।
तनाव लगातार बढ़ता गया।
पुलिस की रणनीति और कार्रवाई
QRT ने पहले बातचीत का रास्ता चुना। एक वार्ताकार ने लैंडलाइन पर संपर्क किया। लेकिन Rohit ने आक्रामक लहजे में जवाब दिया — “पैसे दो, वरना जान जाएगी।”
घंटों की बातचीत बेनतीजा रही। पुलिस ने ब्रेक-इन (घुसपैठ) की तैयारी की। ड्रोन से छत की निगरानी की गई। थर्मल कैमरों ने अंदर की गर्मी दिखा दी। और तभी — घर के अंदर से गोलियों की आवाज़ आई।
यही था सिग्नल।
पुलिस ने फ्लैशबैंग ग्रेनेड फेंके और घर में घुस गई। शोर, धुआं और चीखें। कुछ ही मिनटों में सभी बंधक सुरक्षित निकाल लिए गए।
लेकिन रोहित आर्य भाग निकला।

एनकाउंटर: रोहित आर्य का अंत
दो दिन बाद, पुलिस को सूचना मिली कि वह नवी मुंबई के एक फ्लैट में छिपा है। रात करीब 11:45 बजे पुलिस ने इलाके को घेर लिया।
मध्यरात्रि में 12:05 बजे दरवाज़ा तोड़ा गया। अंदर से पहली गोली रोहित ने चलाई। पुलिस ने जवाबी फायरिंग की। मुठभेड़ मुश्किल से 10 मिनट चली।
नतीजा:
Rohit को छाती और पैर में गोली लगी।
दो पुलिसकर्मी हल्के घायल हुए।
उसके साथी आत्मसमर्पण कर गए।
घटनास्थल से एक पिस्तौल और कई कारतूस बरामद हुए।
रोहित की मौके पर ही मौत हो गई।
जांच रिपोर्ट और आधिकारिक निष्कर्ष
पुलिस रिपोर्ट में साफ लिखा गया — यह आत्मरक्षा (Self-Defense) का मामला था। Rohit ने पहले गोली चलाई, इसलिए जवाबी फायर जरूरी था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी गोली से मौत की पुष्टि हुई।
एक गवाह ने कहा — “ऐसा लगा जैसे पटाखे फूट रहे हों।”
कुछ ही दिनों में जांच पूरी कर दी गई। बैलिस्टिक टेस्ट ने साबित किया कि गोली पहले Rohit की बंदूक से चली थी। पुलिस आयुक्त ने बयान दिया,
“ऑपरेशन साफ-सुथरा था। किसी निर्दोष को नुकसान नहीं हुआ।”
मानवाधिकार और कानूनी सवाल
इसके बावजूद, मानवाधिकार संगठनों ने सवाल उठाए — क्या पुलिस ने अत्यधिक बल प्रयोग किया? क्या उसे आत्मसमर्पण का मौका मिला?
अदालत ने मामले पर संज्ञान लिया, लेकिन अब तक पुलिस पर कोई आरोप नहीं लगा।
एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाओं ने मांग की कि भविष्य में सभी ऑपरेशनों में बॉडी कैम अनिवार्य हों।
घटना के बाद का प्रभाव
यह मुठभेड़ मुंबई पुलिस के सिस्टम को हिला गई।
क्विक रिस्पॉन्स ड्रिल्स 20% तेज़ की गईं।
स्पेशल यूनिट्स में बॉडी कैम और AI मॉनिटरिंग सिस्टम लगाए गए।
अगले साल बंधक घटनाओं में 15% की कमी दर्ज हुई।
हालांकि कुछ लोगों ने पुलिस पर सवाल उठाए, लेकिन आम जनता ने राहत महसूस की कि शहर में एक खतरनाक अपराधी का अंत हुआ।

सीख और सबक
पुलिस ने इस घटना से कई सबक लिए:
पहले बातचीत, फिर बल प्रयोग।
मानसिक विशेषज्ञों की टीम शामिल करना।
रात में ऑपरेशन की विशेष ट्रेनिंग।
इन कदमों से भविष्य की घटनाओं में जानें बचाई जा सकती हैं।
एक खतरनाक सफर का अंत
Rohit आर्य ने गरीबी से लड़ने की जगह अपराध का रास्ता चुना। उसका अंत गोलीबारी में हुआ, लेकिन उसकी कहानी एक चेतावनी बन गई —
कानून देर से आए, पर सख्त आया।
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