राहुल गांधी का Parliament में तीखा सवाल: एपस्टीन सूची में नाम आने के बाद अनिल अंबानी जेल में क्यों नहीं?
भारतीय Parliament में फरवरी 2026 के सत्र के दौरान राहुल गांधी ने एक ऐसा सवाल उठाया जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। उन्होंने सरकार से पूछा कि जब अमेरिकी अदालत द्वारा सार्वजनिक किए गए जेफ्री एपस्टीन से जुड़े दस्तावेजों में उद्योगपति अनिल अंबानी का नाम सामने आया है, तो उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया?
यह सवाल केवल एक व्यक्ति पर आरोप का मामला नहीं है, बल्कि यह सत्ता, न्याय और अंतरराष्ट्रीय घोटालों के भारतीय राजनीति पर प्रभाव से जुड़ा व्यापक मुद्दा बन गया है।
एपस्टीन फाइल्स क्या हैं और उनका महत्व
जेफ्री एपस्टीन एक अमेरिकी वित्तीय कारोबारी था, जिसे यौन शोषण और मानव तस्करी जैसे गंभीर अपराधों में गिरफ्तार किया गया था। उसकी 2019 में जेल में मृत्यु हो गई, लेकिन उसके खिलाफ चल रहे मामलों के दौरान कई दस्तावेज, ईमेल, फ्लाइट लॉग और संपर्क सूची अदालत के आदेश पर सार्वजनिक किए गए।
2026 की शुरुआत में न्यूयॉर्क की एक अदालत के आदेश के बाद इन दस्तावेजों के अतिरिक्त हिस्से सार्वजनिक किए गए। इनमें कथित तौर पर दुनिया भर के कई प्रभावशाली व्यक्तियों के नाम दर्ज हैं, जो किसी न किसी रूप में एपस्टीन से जुड़े थे—चाहे सामाजिक, व्यावसायिक या यात्रा संबंधी संपर्क के माध्यम से।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इन दस्तावेजों में नाम आना अपने आप में अपराध सिद्ध नहीं करता, बल्कि केवल संभावित संबंध या संपर्क को दर्शाता है।
अनिल अंबानी का नाम और कथित संबंध-Parliament
सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार, 2005 के एक फ्लाइट लॉग में अनिल अंबानी का नाम दर्ज बताया गया है। यह लॉग न्यूयॉर्क से पाम बीच की उड़ान से संबंधित है—ऐसी जगहें जो एपस्टीन की गतिविधियों से जुड़ी रही हैं।
हालांकि अब तक कोई प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं आया है जो यह दर्शाए कि अंबानी किसी अवैध गतिविधि में शामिल थे। उपलब्ध जानकारी केवल यात्रा या मुलाकात का संकेत देती है, न कि आपराधिक संलिप्तता का।
अनिल अंबानी की ओर से जारी बयान में कहा गया कि यदि कोई मुलाकात हुई भी थी, तो वह व्यावसायिक संदर्भ में थी और किसी भी आपराधिक गतिविधि से उनका कोई संबंध नहीं है।

राहुल गांधी का संसद में सवाल: जवाबदेही की मांग-Parliament
राहुल गांधी ने लोकसभा में सरकार से सीधे पूछा कि जब किसी भारतीय उद्योगपति का नाम एक अंतरराष्ट्रीय यौन तस्करी मामले से जुड़े दस्तावेजों में आता है, तो क्या भारतीय एजेंसियों को स्वतः जांच शुरू नहीं करनी चाहिए?
उन्होंने इसे नैतिकता और शासन की पारदर्शिता का मुद्दा बताया। उनका तर्क था कि यदि छोटे मामलों में भी लोगों को पूछताछ और गिरफ्तारी का सामना करना पड़ता है, तो बड़े उद्योगपतियों के मामले में समान मानदंड क्यों नहीं अपनाए जाते?
यह सवाल राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि कांग्रेस लंबे समय से भाजपा सरकार पर “कॉरपोरेट पक्षपात” (crony capitalism) का आरोप लगाती रही है।
कानूनी जटिलताएं: क्या केवल नाम आने से गिरफ्तारी संभव है?
यहां सबसे महत्वपूर्ण पहलू कानूनी प्रक्रिया का है।
1. अंतरराष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction)
एपस्टीन मामला अमेरिकी न्यायालयों के अधीन है। भारत की एजेंसियां तभी कार्रवाई कर सकती हैं जब:
भारत में कोई संबंधित अपराध दर्ज हो,
या अमेरिका से औपचारिक कानूनी सहायता (Mutual Legal Assistance Treaty – MLAT) के तहत ठोस साक्ष्य प्राप्त हों।
सिर्फ फ्लाइट लॉग में नाम होना भारतीय कानून के तहत गिरफ्तारी के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।
2. भारतीय कानून और जांच की प्रक्रिया-Parliament
यदि किसी व्यक्ति पर धन शोधन (Money Laundering) या विदेशी लेन-देन में अनियमितता का संदेह हो, तो प्रवर्तन निदेशालय (ED) या सीबीआई जांच शुरू कर सकती है।
लेकिन इसके लिए प्राथमिक साक्ष्य, शिकायत या ठोस दस्तावेजी आधार आवश्यक होता है। अदालतें केवल सार्वजनिक आरोपों के आधार पर गिरफ्तारी की अनुमति नहीं देतीं।

3. दोष सिद्धि बनाम सार्वजनिक आरोप
लोकतांत्रिक व्यवस्था में “दोष सिद्ध होने तक निर्दोष” (Presumption of Innocence) का सिद्धांत लागू होता है।
किसी सूची में नाम आने से नैतिक प्रश्न उठ सकते हैं, लेकिन कानूनी कार्रवाई के लिए ठोस प्रमाण जरूरी है—जैसे प्रत्यक्ष गवाह, वित्तीय लेन-देन का रिकॉर्ड या आपराधिक गतिविधि से सीधा संबंध।
सरकार की प्रतिक्रिया
सरकार की ओर से प्रारंभिक प्रतिक्रिया सीमित रही। कुछ मंत्रियों ने इसे अमेरिकी मामला बताते हुए कहा कि भारत में अभी तक कोई औपचारिक जांच की मांग या कानूनी आधार नहीं बना है।
यह सीमित प्रतिक्रिया विपक्ष को सरकार पर “चुप्पी” का आरोप लगाने का अवसर देती है।
राजनीतिक निहितार्थ
राहुल गांधी का यह सवाल कई राजनीतिक संदेश देता है:
कॉरपोरेट-सरकार संबंधों पर सवाल – क्या बड़े उद्योगपतियों को विशेष संरक्षण मिलता है?
अंतरराष्ट्रीय घोटालों का घरेलू राजनीति में उपयोग – वैश्विक आरोपों को स्थानीय जवाबदेही से जोड़ना।
युवा मतदाताओं को संदेश – भ्रष्टाचार और नैतिकता के मुद्दे को चुनावी विमर्श में लाना।
हालांकि, यह रणनीति जोखिम भरी भी हो सकती है। यदि पर्याप्त प्रमाण सामने नहीं आते, तो यह आरोप राजनीतिक अतिशयोक्ति माना जा सकता है।
निवेशकों और बाजार पर प्रभाव
Parliamentमें इस मुद्दे के उठने के बाद अनिल अंबानी से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में हल्का उतार-चढ़ाव देखा गया।
बाजार में ऐसी खबरें “प्रतिष्ठा जोखिम” (reputational risk) पैदा करती हैं। हालांकि अभी तक कोई औपचारिक जांच शुरू नहीं हुई है, लेकिन निवेशक सतर्क नजर रखे हुए हैं।
नियामक संस्थाएं जैसे सेबी (SEBI) और आरबीआई संभावित वित्तीय जोखिमों पर नजर रख सकती हैं, यदि कोई ठोस संकेत सामने आता है।

व्यापक सवाल: न्याय, शक्ति और जवाबदेही
यह मामला तीन स्तरों पर सवाल उठाता है:
क्या अंतरराष्ट्रीय आरोपों पर भारतीय एजेंसियों को स्वतः संज्ञान लेना चाहिए?
क्या बड़े उद्योगपतियों के लिए अलग मानदंड लागू होते हैं?
राजनीति में ऐसे आरोपों का उपयोग कितनी जिम्मेदारी से होना चाहिए?
राजनीति और कानून के बीच संतुलन
राहुल गांधी का संसद में उठाया गया सवाल राजनीतिक रूप से प्रभावशाली है। यह सरकार को जवाब देने के लिए मजबूर करता है और कॉरपोरेट जवाबदेही पर बहस छेड़ता है।
लेकिन कानूनी दृष्टि से केवल किसी विदेशी दस्तावेज में नाम आने से गिरफ्तारी संभव नहीं है। जांच और कार्रवाई के लिए ठोस साक्ष्य और विधिक प्रक्रिया आवश्यक है।
अंततः यह मामला इस बात का प्रतीक है कि वैश्विक घोटाले किस तरह घरेलू राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं। आगे क्या होता है, यह इस पर निर्भर करेगा कि क्या कोई औपचारिक जांच शुरू होती है या यह मुद्दा केवल राजनीतिक विमर्श तक सीमित रह जाता है।
लोकतंत्र में सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन न्याय प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। दोनों के बीच संतुलन ही स्वस्थ व्यवस्था की पहचान है।

