नेहरू–गांधी उत्तराधिकार की राजनीति: Congress में फिर क्यों उभर रहा है ‘प्रियंका बनाम राहुल’ का विमर्श?
भारतीय राजनीति के गरम माहौल में एक बार फिर परिवार के भीतर नेतृत्व को लेकर फुसफुसाहट सुनाई दे रही है। पिछले महीने दिल्ली में हुई Congress की एक अहम रणनीतिक बैठक में राहुल गांधी जहाँ राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक नीतियों के खिलाफ बड़े आंदोलन की वकालत कर रहे थे, वहीं प्रियंका गांधी वाड्रा आगामी राज्यों के चुनावों के लिए ज़मीनी संगठन को मज़बूत करने पर ज़ोर दे रही थीं।
यही मतभेद Congress में उभरते नए “प्रियंका बनाम राहुल” क्षण को रेखांकित करता है। दो भाई-बहन, एक ही विरासत—लेकिन पार्टी को आगे ले जाने की उनकी राहें थोड़ी अलग दिखती हैं। जैसे-जैसे 2026 की राजनीतिक लड़ाइयाँ नज़दीक आ रही हैं, सवाल फिर खड़ा है: कांग्रेस के पुनरुत्थान का चेहरा कौन हो?
खंड 1: भाई-बहन की राजनीति और उत्तराधिकार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
विरासत का बोझ: उम्मीदें और जनधारणा
नेहरू–गांधी नाम भारतीय राजनीति में भारी अपेक्षाएँ लेकर आता है। जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक की विरासत अब राहुल और प्रियंका के कंधों पर है। अक्सर उनकी तुलना 1970 के दशक की इंदिरा बनाम संजय गांधी की चर्चा से की जाती है, जहाँ साहसी अंदाज़ और रणनीतिक सोच के बीच टकराव दिखा था।
राहुल को कभी “अनिच्छुक नेता” कहा गया, तो प्रियंका को इंदिरा की छवि से जोड़ा गया। यह तुलना मतदाताओं के मन में दोनों को आमने-सामने खड़ा कर देती है। वजह साफ है—इतिहास की ऊँची कसौटी।
राहुल गांधी: बदली हुई राजनीतिक कहानी
राहुल गांधी ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी छवि में बड़ा बदलाव किया है। भारत जोड़ो यात्रा (2022–23) ने उन्हें एक जमीनी नेता के रूप में स्थापित किया। 4,000 किलोमीटर की इस यात्रा ने बेरोज़गारी, महंगाई और सामाजिक तनाव जैसे मुद्दों पर उनकी पकड़ मज़बूत की।
2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने 50 से ज़्यादा सीटों पर सक्रिय प्रचार किया, जिससे कांग्रेस को 99 सीटें मिलीं—2019 के मुक़ाबले लगभग दोगुनी। केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों में पार्टी के वोट शेयर में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई।
अब राहुल की छवि एक ऐसे नेता की है जो राष्ट्रीय मुद्दों पर टिके रहते हैं, भले ही कुछ लोग उन्हें रोज़मर्रा की राजनीति में कम आक्रामक मानते हों।
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प्रियंका गांधी वाड्रा: ज़मीनी राजनीति की मज़बूत कड़ी
प्रियंका गांधी ने 2019 के बाद तेज़ी से सक्रिय भूमिका निभाई। उत्तर प्रदेश में संगठन की ज़िम्मेदारी संभालने के बाद उन्होंने घर-घर संपर्क और छोटे लेकिन प्रभावी अभियानों पर ध्यान दिया।
हिमाचल प्रदेश के 2022 चुनावों में उनकी सक्रियता से कांग्रेस को बहुमत मिला। उनकी शैली—सीधी बातचीत, भावनात्मक जुड़ाव और तीखे राजनीतिक वार—खासतौर पर महिलाओं और युवाओं को आकर्षित करती है।
वायनाड उपचुनाव और यूपी के कई क्षेत्रों में उनकी मौजूदगी से मतदान प्रतिशत बढ़ा, खासकर महिला मतदाताओं में। इससे यह धारणा बनी कि प्रियंका कांग्रेस की “ग्रासरूट ताकत” हैं।
खंड 2: नेतृत्व शैलियों का अंतर और चुनावी असर
राहुल गांधी: राष्ट्रीय रणनीतिकार
राहुल गांधी राष्ट्रीय स्तर पर सोचते हैं। वे संवैधानिक मुद्दों, बेरोज़गारी और सामाजिक न्याय को केंद्र में रखते हैं। पार्टी ढांचे में सुधार, युवा नेतृत्व और डिजिटल रणनीति उनके एजेंडे में है।
भारत जोड़ो यात्रा के बाद उन्होंने महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों में ज़मीनी हस्तक्षेप भी बढ़ाया, जिससे उनका संतुलित नेतृत्व उभरा।
प्रियंका गांधी: जनसंवाद की ताकत
प्रियंका की सबसे बड़ी ताकत उनकी वक्तृत्व क्षमता और मानवीय जुड़ाव है। वे व्यक्तिगत किस्सों के ज़रिए राजनीति को लोगों के जीवन से जोड़ती हैं।
अमेठी और यूपी के कई इलाकों में उनके दौरों से कांग्रेस के वोट शेयर में बढ़ोतरी देखी गई। संकट के समय—जैसे बाढ़ या स्थानीय आंदोलन—उनकी मौजूदगी भरोसा पैदा करती है।
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आँकड़ों की नज़र से: कौन कहाँ असरदार?
राहुल गांधी से जुड़ा प्रभाव:
लोकसभा 2024: कांग्रेस को 99 सीटें
राष्ट्रीय वोट शेयर में लगभग 2.5% की बढ़ोतरी
कर्नाटक, राजस्थान में मज़बूत प्रदर्शन
प्रियंका गांधी से जुड़ा प्रभाव:
हिमाचल प्रदेश 2022: पूर्ण बहुमत
यूपी में महिला मतदाताओं की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि
सीमित संसाधनों में नुकसान कम करने की क्षमता
निष्कर्ष यही है कि राहुल राष्ट्रीय लहर बनाते हैं, जबकि प्रियंका स्थानीय स्तर पर उसे थामे रखती हैं।
खंड 3: पार्टी के भीतर संतुलन और शक्ति संरचना
Congress में पुराने नेता अक्सर राहुल की रणनीतिक सोच के साथ खड़े दिखते हैं, जबकि युवा और नए चेहरे प्रियंका की जनअपील को अहम मानते हैं।
फैसले साझा रूप से लिए जाते हैं—नीति और राष्ट्रीय दिशा राहुल के हाथ में, जबकि राज्यों की रणनीति में प्रियंका की भूमिका बढ़ती जा रही है। इससे पार्टी में एक तरह का द्वि-नेतृत्व मॉडल उभरता है।
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खंड 4: बाहरी छवि और मीडिया नैरेटिव
मीडिया अक्सर इस रिश्ते को “वंशवाद बनाम सुधार” के फ्रेम में दिखाता है। राहुल को सुधारक और प्रियंका को करिश्माई वंशज के रूप में पेश किया जाता है।
हालाँकि कांग्रेस अब गैर-गांधी नेतृत्व को भी आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है, फिर भी पार्टी का केंद्र इन दोनों के इर्द-गिर्द ही घूमता है।
नेहरू–गांधी भविष्य का अनिवार्य समीकरण
“प्रियंका बनाम राहुल” की चर्चा इसलिए बार-बार लौटती है क्योंकि कांग्रेस को दोनों की ज़रूरत है।
राहुल दिशा तय करते हैं, प्रियंका जनाधार को मज़बूत करती हैं।
अल्पकाल में यह साझेदारी लाभदायक है, लेकिन दीर्घकाल में पार्टी को या तो स्पष्ट नेतृत्व चुनना होगा या साझा नेतृत्व को संस्थागत रूप देना होगा।
अगर दोनों पूरी तरह एकजुट होकर आगे बढ़े, तो कांग्रेस के लिए मजबूत विपक्ष बनना संभव है।
आने वाले सालों में भारतीय राजनीति की दिशा काफी हद तक इसी रिश्ते पर निर्भर करेगी।
आपकी राय क्या है—Congress के लिए कौन ज़्यादा प्रभावी चेहरा है?
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