चुनावों के दौरान Rahul गांधी क्यों गायब हो जाते हैं? पप्पू यादव ने क्या कहा
भारत में हर चुनावी मौसम में एक सवाल फिर उठता है — राहुल गांधी कहाँ हैं?
कांग्रेस नेता के इस कम दिखने वाले अंदाज़ पर समर्थक और आलोचक दोनों हैरान रहते हैं। कोई इसे रणनीति कहता है, तो कोई इसे जिम्मेदारी से बचना।
Rahul गांधी कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में हैं, उन पर मीडिया और विपक्ष दोनों की लगातार निगाह रहती है। लेकिन चुनाव के सबसे गर्म दौर में उनका लो प्रोफाइल रहना हमेशा चर्चा में रहता है। कुछ लोग इसे सोची-समझी चाल बताते हैं, जबकि कई इसे उनकी कमजोरी का प्रतीक मानते हैं।
ऐतिहासिक झलक: चुनावी अभियानों में गैप की कहानी
2014 और 2019 के चुनाव: नजर आने वाले ठहराव
2014 में जब नरेंद्र मोदी पूरे देश में रैलियाँ कर रहे थे,Rahul गांधी सीमित इलाकों में ही सक्रिय दिखे।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि उन्होंने ज़रूरी राज्यों में उतनी मौजूदगी नहीं दर्ज कराई। मीडिया कवरेज भी कम मिला।
2019 में भी यही पैटर्न दिखा — रैलियाँ हुईं, लेकिन उतनी नहीं जितनी विपक्षी दलों की।
चुनाव विश्लेषकों के अनुसार, उनके दौरे मोदी और अमित शाह की तुलना में 20–30% कम रहे।
नतीजा: कांग्रेस सिर्फ़ 44 सीटों पर सिमट गई।

चुनाव के बाद ‘सन्नाटा काल’
हार के बाद Rahul गांधी अक्सर सार्वजनिक जीवन से कुछ समय के लिए दूर हो जाते हैं।
2014 के बाद और फिर 2019 के बाद भी ऐसा हुआ।
पार्टी इसे “रीसेट फेज़” कहती है — सोचने और सुधार की अवधि।
पर आलोचकों का कहना है, यह विपक्ष की भूमिका से भागना है।
2019 के बाद उन्होंने लगभग 100 दिनों तक कोई बड़ा बयान या कार्यक्रम नहीं किया — मीडिया ने इसे “गायब दौर” कहा।
अन्य नेताओं से तुलना
अमित शाह, अरविंद केजरीवाल या नरेंद्र मोदी जैसे नेता चुनावों में रोज़ दिखते हैं — रैलियाँ, मीटिंग, ऑनलाइन बातचीत, लगातार जुड़ाव।
Rahul गांधी के अभियान सीमित रहते हैं।
डेटा दिखाता है कि वे सालाना लगभग 150 रैलियाँ करते हैं, जबकि मोदी की संख्या 300 तक पहुँचती है।
इस तुलना से उनका “कम दिखना” और अधिक उभर जाता है।
कांग्रेस का पक्ष: रणनीति या स्वास्थ्य का कारण?
कांग्रेस पार्टी कहती है कि यह सब एक रणनीतिक योजना का हिस्सा है।
उनका दावा — Rahul पर्दे के पीछे बैठकर संगठन मजबूत करने, टीम तैयार करने और नई रणनीतियाँ बनाने में व्यस्त रहते हैं।
कभी-कभी यह आराम या स्वास्थ्य के कारण भी होता है।
2023 की भारत जोड़ो यात्रा को पार्टी ने “राहुल का पुनः चार्ज होने का तरीका” बताया।
लेकिन विरोधी इसे “भागने का बहाना” कहते हैं।
पप्पू यादव का आरोप: ‘चुनावी पर्यटक’ या गंभीर नेता?
बिहार के नेता पप्पू यादव लंबे समय से राहुल गांधी की आलोचना करते रहे हैं।
वे कहते हैं, “वो चुनावों में बस फोटो खिंचवाने आते हैं, फिर गायब हो जाते हैं।”
उन्होंने एक टीवी इंटरव्यू में कहा था — “देश का नेता वो होता है जो मैदान में रोज़ उतरे, सिर्फ ट्विटर पर नहीं।”
पप्पू यादव का यह तंज बिहार और उत्तर भारत में खासा चर्चित हुआ।
उनका कहना है कि Rahul की यह शैली कांग्रेस की कमजोर जड़ों की वजह है।
मीडिया की भूमिका: कहानी कैसे गढ़ी जाती है
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स इसे “रणनीतिक मौन” कहती हैं — यानी Rahul गांधी जानबूझकर शांत रहते हैं ताकि विपक्ष के जाल में न फँसे।
लेकिन ज़्यादातर चैनल और बहस इसे “नेतृत्व की कमी” बताते हैं।
सोशल मीडिया पर हैशटैग #WhereIsRahul अक्सर ट्रेंड करता है।
यानी जनता के बीच यह सवाल लगातार जिंदा रहता है।
क्या यह सोची-समझी रणनीति है?
कुछ विश्लेषक कहते हैं कि राहुल की “कंट्रोल्ड विज़िबिलिटी” यानी सीमित लेकिन प्रभावी मौजूदगी की नीति है।
वो चाहते हैं कि राज्य स्तर के नेता ज्यादा उभरें।
जैसे 2024 में उत्तर-पूर्व के इलाकों में केंद्रित अभियान देखा गया।
फायदा — ऊर्जा बचती है, रहस्य बना रहता है।
नुकसान — विपक्ष मीडिया में पूरी जगह घेर लेता है।
परिवार और निजी समय की भूमिका
Rahul गांधी का परिवार राजनीति से गहराई से जुड़ा है।
सोनिया गांधी की तबीयत की वजह से वे कई बार परिवार को प्राथमिकता देते हैं।
पर जनता इसे “बहाना” समझती है।
उच्च दबाव वाली राजनीति में ब्रेक लेना जरूरी है, लेकिन जनता 24/7 सक्रिय नेता चाहती है।
राजनीतिक असर और नुकसान
जब Rahul लंबे समय तक शांत रहते हैं, तो पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है।
विपक्ष प्रचार पर कब्जा कर लेता है।
एक अध्ययन के अनुसार, राहुल की अनुपस्थिति के बाद कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं की सक्रियता में 5–10% की गिरावट देखी गई।
वंशवाद और छवि की चुनौती
गांधी परिवार का नाम Rahul के लिए वरदान भी है और बोझ भी।
नेहरू-इंदिरा-राजीव जैसी सक्रियता की उम्मीद जनता उनसे करती है।
उनका हर ठहराव मीडिया में बड़ा मुद्दा बन जाता है।
छवि सुधार की कोशिशें
भारत जोड़ो यात्रा (2022–23) Rahul गांधी की छवि बदलने की बड़ी पहल रही।
4,000 किलोमीटर पैदल चलकर उन्होंने यह दिखाया कि वे जमीनी हैं।
इससे कांग्रेस को नई जान मिली — 2024 में पार्टी ने 99 सीटें जीतीं, जो 2019 से दोगुनी थी।
यह बताता है कि जब राहुल सक्रिय रहते हैं, तो असर दिखता है।
भविष्य के लिए सबक
जनता अब 24/7 जुड़ाव चाहती है — वीडियो संदेश, सोशल मीडिया, टाउनहॉल आदि से।
लंबी चुप्पी अब रणनीति नहीं, कमजोरी समझी जाती है।
राहुल को अपनी मौजूदगी लगातार बनाए रखनी होगी — न सिर्फ़ चुनावों में, बल्कि रोज़मर्रा की राजनीति में भी।
अनुपस्थिति, रणनीति या गलती?
Rahul गांधी की चुनावी “गायबियाँ” कई कारणों का मिश्रण हैं —
व्यक्तिगत पसंद, पार्टी रणनीति और विपक्ष की तीखी आलोचना।
पप्पू यादव जैसे नेता इसे “कमज़ोरी” कहते हैं, जबकि कांग्रेस इसे “रणनीति” बताती है।
सवाल वही है —
क्या जनता अब भी रणनीतिक चुप्पी को स्वीकार करेगी,
या उसे चाहिए एक ऐसा नेता जो हर दिन, हर मंच पर दिखे?
आपका क्या मानना है — यह रणनीति है या राहुल गांधी की राजनीतिक भूल?

