विवाद की शुरुआत: स्पीकर के निर्णय पर असहमति
नेसेट speaker द्वारा मोदी के संबोधन के लिए तय किए गए नियमों पर विपक्ष ने आपत्ति जताई। उनका आरोप है कि पारंपरिक संसदीय प्रक्रियाओं—जैसे पूर्ण बहस या मतदान—को दरकिनार किया गया। विपक्ष का कहना है कि इससे संसद की निष्पक्षता पर सवाल उठता है।
विपक्षी नेताओं का दावा है कि कार्यक्रम की रूपरेखा पर पर्याप्त चर्चा नहीं हुई और इसे जल्दबाजी में मंजूरी दी गई। उनके अनुसार, यह सरकार की विदेश नीति को बढ़ावा देने के लिए संसदीय परंपराओं में ढील देने जैसा है।
विपक्ष की एकजुटता और राजनीतिक संदेश-speaker
लेबर पार्टी और अन्य विपक्षी गुट इस मुद्दे को सरकार की विदेश नीति के खिलाफ व्यापक विरोध के रूप में पेश कर रहे हैं। उनका मानना है कि मौजूदा सरकार भारत के साथ संबंधों को प्राथमिकता दे रही है, जबकि अन्य वैश्विक मुद्दों की अनदेखी हो रही है।
बहिष्कार की रणनीति के जरिए विपक्ष संसद में “निष्पक्षता” और “लोकतांत्रिक प्रक्रिया” की रक्षा का संदेश देना चाहता है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि यह कदम राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश भी हो सकता है।

मोदी की यात्रा का महत्व-speaker
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह यात्रा भारत और इज़राइल के बीच मजबूत होते संबंधों का प्रतीक मानी जा रही है। दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग, आतंकवाद-रोधी साझेदारी, कृषि तकनीक और जल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा है।
मुख्य सहयोग के क्षेत्र:
रक्षा और ड्रोन तकनीक
साइबर सुरक्षा और स्टार्टअप सहयोग
जल प्रबंधन और कृषि नवाचार
दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है, और यह दौरा नए समझौतों को अंतिम रूप देने का अवसर माना जा रहा था। हालांकि, बहिष्कार की धमकी से इस कूटनीतिक कार्यक्रम पर राजनीतिक छाया पड़ सकती है।
नेसेट speaker की भूमिका
नेसेट speaker संसद के कार्यक्रमों और विदेशी नेताओं के संबोधन के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे समय-निर्धारण और प्रक्रियात्मक नियम तय करते हैं। विपक्ष का आरोप है कि इस मामले में स्पीकर ने तटस्थता नहीं दिखाई।
विपक्षी नेता यायर लापिड जैसे कुछ राजनेताओं ने स्पीकर के फैसले की आलोचना की है और इसे पक्षपातपूर्ण बताया है। उनका कहना है कि इससे संसद की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।

वैश्विक प्रभाव और मीडिया की प्रतिक्रिया-speaker
अंतरराष्ट्रीय मीडिया इस विवाद को इज़राइल की आंतरिक राजनीतिक खींचतान के रूप में देख रहा है। भारतीय मीडिया ने इसे एक “अनावश्यक विवाद” बताया है, जबकि पश्चिमी मीडिया इसे इज़राइल की राजनीतिक ध्रुवीकरण का उदाहरण मान रहा है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद अल्पकालिक हो सकता है और इससे दीर्घकालिक भारत–इज़राइल संबंधों पर गंभीर असर पड़ने की संभावना कम है। फिर भी, कूटनीतिक शिष्टाचार और संसदीय परंपराओं के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा।
यह पूरा विवाद केवल एक भाषण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इज़राइल की घरेलू राजनीति और विदेश नीति की दिशा पर चल रही बहस का प्रतीक बन गया है। मोदी की यात्रा कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, लेकिन संसद के भीतर की राजनीति ने इसे संवेदनशील बना दिया है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि विपक्ष अपने रुख पर कायम रहता है या कोई समझौता निकलता है। एक बात स्पष्ट है—कूटनीतिक मंच पर आंतरिक राजनीतिक मतभेदों का असर दूर तक जा सकता है।
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