क्या Rahul गांधी लोकसभा प्रोटोकॉल से ऊपर हैं? किरेन रिजिजू के बयान का विश्लेषण
भारतीय राजनीति में संसद के भीतर होने वाली बहसें अक्सर बड़े विवाद का रूप ले लेती हैं। हाल ही में केंद्रीय मंत्री Kiren Rijiju ने सवाल उठाया कि क्या Rahul Gandhi लोकसभा के नियमों और प्रोटोकॉल से ऊपर हैं?
यह विवाद Lok Sabha के एक सत्र के दौरान Rahul गांधी के भाषण के बाद सामने आया, जब उन्होंने आर्थिक नीतियों और बेरोज़गारी पर सरकार की आलोचना की। रिजिजू का आरोप है कि Rahul गांधी ने भाषण के दौरान कई संसदीय नियमों का उल्लंघन किया।
यह बहस केवल एक नेता तक सीमित नहीं है; यह सवाल उठाती है कि संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुशासन के बीच संतुलन कैसे रखा जाए।
लोकसभा के नियम और सांसदों का आचरण
संसद में बहस को व्यवस्थित और सम्मानजनक बनाए रखने के लिए स्पष्ट नियम बनाए गए हैं।
सांसदों के लिए आचरण के नियम
Lok Sabha की Rules of Procedure and Conduct of Business के अनुसार:
सांसद को स्पीकर के माध्यम से ही बोलना होता है
व्यक्तिगत आरोप या अपमानजनक भाषा का उपयोग नहीं किया जा सकता
बिना अनुमति लगातार बाधा डालना नियमों के खिलाफ है
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उदाहरण के लिए:
Rule 352 के अनुसार “झूठा” या “भ्रष्ट” जैसे शब्द बिना प्रमाण के इस्तेमाल नहीं किए जा सकते।
कुछ विशेष बहसों में नोट्स से पढ़ना भी सीमित होता है।
इन नियमों का उद्देश्य संसद की गरिमा बनाए रखना है।
संसद में अनुशासनात्मक कार्रवाई के उदाहरण
संसदीय इतिहास में कई बार नियम तोड़ने पर कार्रवाई हुई है।
2011 में तत्कालीन स्पीकर Meira Kumar ने बजट सत्र में हंगामे के कारण 25 सांसदों को निलंबित किया।
2023 में कई विपक्षी सांसदों को नारेबाजी के कारण निलंबित किया गया।
यह दिखाता है कि संसद में अनुशासन बनाए रखने के लिए कठोर कदम उठाए जाते रहे हैं।
स्पीकर की भूमिका
संसद की कार्यवाही को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी स्पीकर की होती है।
वर्तमान स्पीकर Om Birla के पास अधिकार है कि वे:
किसी सांसद की माइक बंद कर सकते हैं
नियमों का उल्लंघन होने पर चेतावनी दे सकते हैं
गंभीर मामलों में निलंबन की सिफारिश कर सकते हैं
स्पीकर का निर्णय आमतौर पर अंतिम माना जाता है।

किरेन रिजिजू के आरोप
Kiren Rijiju ने आरोप लगाया कि Rahul गांधी ने संसद में बोलते समय कुछ संसदीय नियमों का पालन नहीं किया।
उनके मुख्य आरोप:
भाषण के दौरान लिखित नोट्स से पढ़ना
सरकार पर तीखी टिप्पणी करते हुए कठोर शब्दों का इस्तेमाल
बोलते समय हाव-भाव और इशारों से व्यवधान पैदा करना
रिजिजू के अनुसार, इस तरह का व्यवहार संसद की गरिमा के खिलाफ है।
रिकॉर्ड और मीडिया क्लिप में अंतर
रिजिजू ने यह भी कहा कि कई बार टीवी या सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाले क्लिप और संसद के आधिकारिक रिकॉर्ड में अंतर होता है।
उदाहरण:
वीडियो में तेज़ बहस या नारेबाज़ी दिखाई देती है
लेकिन आधिकारिक रिकॉर्ड में भाषा को अक्सर नरम रूप में दर्ज किया जाता है
इससे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और बढ़ जाते हैं।

विपक्ष का जवाब
Indian National Congress और अन्य विपक्षी नेताओं ने रिजिजू के आरोपों को राजनीतिक हमला बताया।
उनका कहना है:
संसद में सरकार की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है
अगर सांसद जनता की समस्याओं को जोरदार तरीके से नहीं उठाएंगे, तो संसद का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा
विपक्ष का आरोप है कि सत्ताधारी दल भी कई बार कठोर भाषा का इस्तेमाल करता है, लेकिन उस पर उतनी कार्रवाई नहीं होती।
संसद के कामकाज पर असर
ऐसे विवाद संसद के कामकाज को भी प्रभावित करते हैं।
2025 में कई रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 20% सत्र समय हंगामे में नष्ट हुआ
इससे कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा कम हो जाती है
इससे जनता में संसद की कार्यक्षमता को लेकर सवाल उठने लगते हैं।

सुधार के संभावित कदम
विशेषज्ञों के अनुसार कुछ कदम स्थिति सुधार सकते हैं:
नए सांसदों के लिए संसदीय नियमों पर प्रशिक्षण
स्पष्ट रूप से असंसदीय शब्दों की सूची जारी करना
संवेदनशील मुद्दों पर पहले से सहमति बनाना
इन उपायों से संसद में अनुशासन और प्रभावी बहस दोनों बनाए रखे जा सकते हैं।
Rahul Gandhi और Kiren Rijiju के बीच यह विवाद केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि संसदीय परंपराओं और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है।
मुख्य सवाल यही है:
क्या संसद में नियमों का सख्ती से पालन होना चाहिए?
या लोकतांत्रिक बहस के लिए अधिक खुलापन होना चाहिए?
संसद की प्रभावशीलता इसी संतुलन पर निर्भर करती है—जहाँ कड़ी आलोचना भी हो और संसदीय गरिमा भी बनी रहे।
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