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Congress ने पीएम मोदी के इज़राइल रुख पर साधा निशाना, कहा – ‘यह अत्यधिक नैतिक कायरता’

भारत की विदेश नीति को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। इस बार मुद्दा इज़राइल और गाजा संघर्ष पर भारत की स्थिति को लेकर उठा है। Congress पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि सरकार ने इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष के दौरान “अत्यधिक नैतिक कायरता” दिखाई है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि भारत की पारंपरिक और संतुलित विदेश नीति को कमजोर किया गया है तथा मानवीय मुद्दों पर सरकार ने स्पष्ट और साहसिक रुख अपनाने से परहेज़ किया है।

Congress का आरोप

Congress महासचिव और पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने हाल ही में बयान जारी कर कहा कि भारत ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीन के अधिकारों का समर्थक रहा है। जवाहरलाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह सरकार तक भारत ने दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन किया था, जिसमें इज़राइल और फिलिस्तीन दोनों के शांतिपूर्ण अस्तित्व की बात कही जाती रही है।

Congress का आरोप है कि मौजूदा केंद्र सरकार ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्पष्ट संदेश देने में असफल रही है। पार्टी नेताओं ने कहा कि गाजा में लगातार हो रही नागरिक मौतों, अस्पतालों और शरणार्थी शिविरों पर हमलों के बावजूद भारत सरकार ने खुलकर मानवीय चिंता व्यक्त नहीं की।

Congress प्रवक्ताओं ने कहा कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र से उम्मीद की जाती है कि वह मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून के पक्ष में मजबूती से बोले। लेकिन मोदी सरकार “रणनीतिक चुप्पी” बनाए हुए है।

‘नैतिक कायरता’ टिप्पणी क्यों?

Congress ने अपने बयान में कहा कि सरकार का रुख केवल कूटनीतिक संतुलन नहीं बल्कि “अत्यधिक नैतिक कायरता” का उदाहरण है। पार्टी का तर्क है कि जब दुनिया के कई देश गाजा में युद्धविराम और मानवीय सहायता की मांग कर रहे हैं, तब भारत की आवाज अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई दी।

Congress नेताओं ने यह भी कहा कि भारत को केवल रणनीतिक साझेदारी के आधार पर विदेश नीति तय नहीं करनी चाहिए। यदि कहीं बड़े पैमाने पर नागरिकों की जान जा रही हो तो भारत को अपनी ऐतिहासिक नैतिक स्थिति के अनुरूप स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।

पार्टी ने संयुक्त राष्ट्र में भारत की कुछ वोटिंग और आधिकारिक बयानों का हवाला देते हुए कहा कि केंद्र सरकार अक्सर अस्पष्ट भाषा का इस्तेमाल कर रही है ताकि किसी भी पक्ष को नाराज़ न किया जाए। कांग्रेस का कहना है कि यह नीति भारत की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचा सकती है।

भाजपा का पलटवार

भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक और गैर-जिम्मेदाराना बताया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि भारत की विदेश नीति राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर तय की जाती है, न कि विपक्ष की राजनीतिक बयानबाज़ी के आधार पर।

भाजपा प्रवक्ताओं ने कहा कि भारत ने हमेशा आतंकवाद की निंदा की है और साथ ही मानवीय सहायता की भी वकालत की है। केंद्र सरकार का कहना है कि भारत ने गाजा के नागरिकों के लिए राहत सामग्री भेजी है और युद्धविराम के साथ-साथ बातचीत के जरिए समाधान की अपील भी की है।

सरकार समर्थकों का यह भी कहना है कि इज़राइल भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। रक्षा, कृषि, तकनीक और सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच मजबूत संबंध हैं। ऐसे में भारत को संतुलित और व्यावहारिक नीति अपनानी पड़ती है।

भारत-इज़राइल संबंधों का इतिहास

भारत और इज़राइल के संबंध पिछले तीन दशकों में काफी मजबूत हुए हैं। 1992 में पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2017 में इज़राइल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने थे। इस यात्रा को दोनों देशों के रिश्तों में ऐतिहासिक मोड़ माना गया।

हालांकि, भारत ने हमेशा फिलिस्तीन के समर्थन की अपनी पारंपरिक नीति भी जारी रखी। भारत ने कई बार दो-राष्ट्र समाधान की बात दोहराई है और फिलिस्तीनी जनता के लिए आर्थिक सहायता भी दी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा दौर में भारत “रणनीतिक संतुलन” की नीति अपना रहा है। एक ओर वह इज़राइल के साथ करीबी संबंध बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर अरब देशों और फिलिस्तीन के साथ भी अच्छे संबंध बनाए रखना उसके लिए जरूरी है।

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अंतरराष्ट्रीय दबाव और भारत

गाजा संघर्ष के बाद दुनिया भर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र समेत कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने नागरिकों की सुरक्षा और मानवीय सहायता पर चिंता जताई है। अमेरिका और यूरोपीय देशों की नीतियों पर भी लगातार सवाल उठे हैं।

भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी रणनीतिक साझेदारियों को बनाए रखते हुए मानवीय मुद्दों पर अपनी विश्वसनीयता भी कायम रखे। विदेश नीति विशेषज्ञों का कहना है कि भारत अब एक उभरती वैश्विक शक्ति है, इसलिए उससे अधिक स्पष्ट और प्रभावशाली भूमिका की अपेक्षा की जाती है।

विपक्ष की रणनीति

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे को केवल विदेश नीति तक सीमित नहीं रखना चाहते। विपक्ष इसे सरकार की “चुप्पी” और “नैतिक नेतृत्व की कमी” से जोड़कर पेश कर रहा है। आगामी राजनीतिक अभियानों में भी यह मुद्दा उठाया जा सकता है, खासकर तब जब अंतरराष्ट्रीय मामलों पर भारत की भूमिका चर्चा में हो।

हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विदेश नीति के मुद्दों पर भारत में आमतौर पर सरकार को व्यापक समर्थन मिलता है। फिर भी कांग्रेस इस बहस के जरिए यह संदेश देना चाहती है कि भारत को केवल रणनीतिक हितों ही नहीं बल्कि मानवीय मूल्यों के आधार पर भी वैश्विक नेतृत्व दिखाना चाहिए।

निष्कर्ष

इज़राइल-गाजा संघर्ष पर भारत का रुख एक बार फिर घरेलू राजनीति का विषय बन गया है। कांग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार ने नैतिक साहस नहीं दिखाया, जबकि भाजपा का कहना है कि सरकार संतुलित और जिम्मेदार विदेश नीति अपना रही है।

इस बहस के बीच यह साफ है कि भारत को आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर और अधिक सावधानी से कदम बढ़ाने होंगे। एक ओर राष्ट्रीय हित और रणनीतिक साझेदारी हैं, तो दूसरी ओर मानवीय मूल्य और वैश्विक नैतिक जिम्मेदारियां। यही संतुलन भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी परीक्षा बना हुआ है।

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