Mahayuti में सीट वार्ता ठप, दिल्ली रवाना हुए एकनाथ शिंदे; महाराष्ट्र की राजनीति में बढ़ी हलचल
महाराष्ट्र की सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर जारी खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है। मुख्यमंत्री Eknath Shinde के अचानक दिल्ली रवाना होने से राजनीतिक गलियारों में अटकलें तेज हो गई हैं। माना जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी, शिंदे गुट की शिवसेना और अजित पवार गुट की एनसीपी के बीच सीट साझेदारी को लेकर बातचीत फिलहाल ठप पड़ गई है और इसी गतिरोध को दूर करने के लिए शिंदे दिल्ली पहुंचे हैं।
सूत्रों के मुताबिक महायुति के सहयोगी दलों के बीच कई सीटों को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है। खासकर उन सीटों पर विवाद ज्यादा है जहां तीनों दल अपने-अपने मजबूत दावे पेश कर रहे हैं। आगामी चुनावों को देखते हुए यह मामला गठबंधन के लिए बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।
सीट बंटवारे पर क्यों फंसा मामला?
महाराष्ट्र की राजनीति में Mahayuti गठबंधन फिलहाल भाजपा, शिंदे गुट की शिवसेना और अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी के सहारे चल रहा है। लेकिन चुनावी रणनीति बनाते समय तीनों दलों के बीच सीटों की संख्या और प्रभाव वाले क्षेत्रों को लेकर मतभेद उभर आए हैं।
शिंदे गुट चाहता है कि उसे शिवसेना की पारंपरिक सीटों पर प्राथमिकता दी जाए। वहीं भाजपा राज्य में अपने बढ़ते जनाधार का हवाला देकर अधिक सीटों की मांग कर रही है। दूसरी ओर अजित पवार गुट भी पश्चिम महाराष्ट्र और कुछ शहरी इलाकों में मजबूत हिस्सेदारी चाहता है।
राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि कई दौर की बैठकों के बावजूद अंतिम सहमति नहीं बन पाई है। यही कारण है कि अब मामला दिल्ली के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच गया है।
दिल्ली दौरे के पीछे क्या संदेश?
मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का दिल्ली दौरा केवल औपचारिक बैठक नहीं माना जा रहा। माना जा रहा है कि वह भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से सीधे बातचीत कर सीट बंटवारे में अपने गुट की स्थिति मजबूत करने की कोशिश करेंगे।
दिल्ली में उनकी मुलाकात भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और केंद्रीय नेतृत्व से हो सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा हाईकमान महाराष्ट्र में किसी भी प्रकार का सार्वजनिक विवाद नहीं चाहता, क्योंकि राज्य देश की राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
शिंदे का दिल्ली जाना यह भी संकेत देता है कि गठबंधन के भीतर कुछ मुद्दों पर भरोसे की कमी महसूस की जा रही है और अब अंतिम फैसला केंद्रीय नेतृत्व की मध्यस्थता से ही संभव होगा।
भाजपा की रणनीति क्या है?
Bharatiya Janata Party महाराष्ट्र में खुद को सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में स्थापित करना चाहती है। लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों को देखते हुए भाजपा कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। पार्टी का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और संगठनात्मक ताकत के आधार पर वह अधिक सीटों पर चुनाव लड़ सकती है।
हालांकि भाजपा यह भी जानती है कि शिंदे गुट और अजित पवार गुट के सहयोग के बिना राज्य में राजनीतिक संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा। इसलिए पार्टी फिलहाल गठबंधन को टूटने से बचाने की रणनीति पर काम कर रही है।
भाजपा नेताओं का कहना है कि सीट बंटवारे को लेकर बातचीत सकारात्मक दिशा में चल रही है और जल्द ही समाधान निकाल लिया जाएगा। लेकिन अंदरखाने जारी तनाव अलग तस्वीर पेश कर रहा है।
शिंदे गुट की चिंता
शिंदे गुट की सबसे बड़ी चिंता अपनी राजनीतिक पहचान और संगठन को मजबूत बनाए रखना है। उद्धव ठाकरे से अलग होने के बाद शिंदे गुट लगातार यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि वही असली शिवसेना का प्रतिनिधित्व करता है।
ऐसे में यदि सीट बंटवारे में उसे अपेक्षा से कम हिस्सेदारी मिलती है, तो यह उसके कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच असंतोष पैदा कर सकता है। यही वजह है कि शिंदे किसी भी कीमत पर अपनी राजनीतिक ताकत कमज़ोर नहीं दिखाना चाहते।
Mahayuti -राजनीतिक जानकारों का कहना है कि शिंदे गुट के लिए यह चुनाव केवल सीटों का नहीं बल्कि अस्तित्व और प्रभाव का भी सवाल है।
अजित पवार गुट भी बना दबाव
Ajit Pawar के नेतृत्व वाला एनसीपी गुट भी गठबंधन में अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटा हुआ है। अजित पवार चाहते हैं कि पश्चिम महाराष्ट्र की कई अहम सीटों पर उनके उम्मीदवारों को मौका मिले।
एनसीपी गुट का तर्क है कि उनके पास स्थानीय स्तर पर मजबूत संगठन और प्रभावशाली नेता हैं। इसलिए सीट बंटवारे में उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती।
यही कारण है कि महायुति के भीतर तीनों दलों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं हो रहा।
विपक्ष की नजर भी महायुति पर
महायुति के भीतर जारी खींचतान पर विपक्षी गठबंधन महाविकास आघाड़ी भी नजर बनाए हुए है। Uddhav Thackeray और कांग्रेस नेताओं ने दावा किया है कि महायुति के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है।
विपक्ष का कहना है कि सत्ता में रहने के बावजूद गठबंधन के सहयोगी दल आपस में भरोसे की कमी से जूझ रहे हैं। महाविकास आघाड़ी इस स्थिति को राजनीतिक अवसर के रूप में देख रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि Mahayuti सीट बंटवारे को लेकर जल्द सहमति नहीं बना पाती, तो इसका फायदा विपक्ष उठा सकता है।
महाराष्ट्र की राजनीति पर असर
महाराष्ट्र देश के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक राज्यों में से एक है। यहां की राजनीतिक स्थिति राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित करती है। ऐसे में Mahayuti के भीतर जारी यह संघर्ष केवल राज्य तक सीमित नहीं माना जा रहा।
यदि सीट बंटवारे का विवाद लंबा खिंचता है, तो इससे कार्यकर्ताओं के मनोबल और चुनावी तैयारियों पर असर पड़ सकता है। वहीं यदि भाजपा नेतृत्व सफलतापूर्वक समझौता करा देता है, तो गठबंधन एकजुट होकर चुनाव मैदान में उतर सकता है।
Mahayuti में सीट बंटवारे को लेकर पैदा हुआ गतिरोध महाराष्ट्र की राजनीति में नई हलचल पैदा कर रहा है। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का दिल्ली दौरा इस बात का संकेत है कि मामला अब शीर्ष नेतृत्व के हस्तक्षेप तक पहुंच चुका है।
भाजपा, शिंदे गुट और अजित पवार गुट के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा, लेकिन चुनावी मजबूरियां तीनों दलों को साथ रहने के लिए प्रेरित भी करती हैं। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि महायुति अपने अंदरूनी मतभेदों को कितनी जल्दी सुलझा पाती है और इसका आगामी चुनावों पर क्या प्रभाव पड़ता है।
Lucknow के हजरतगंज इलाके में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ पोस्टर लगाए गए।
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