Rajya Sabha सीट के लिए बीजेपी ने एच.डी. देवेगौड़ा के बजाय एम. नगराज को चुना, कर्नाटक की राजनीति में नई चर्चा शुरू
बेंगलुरु: कर्नाटक से राज्यसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल (सेक्युलर) के संरक्षक H. D. Deve Gowda को दोबारा उम्मीदवार बनाने के बजाय प्रोफेसर M. Nagaraj को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। इस फैसले ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है और इसके दूरगामी राजनीतिक प्रभावों पर चर्चा शुरू हो गई है। भाजपा के इस निर्णय को देवेगौड़ा के लंबे संसदीय करियर के संभावित समापन के रूप में भी देखा जा रहा है।
Rajya Sabha की जिन सीटों के लिए चुनाव होने हैं, उनमें से एक सीट वर्तमान में देवेगौड़ा के पास है। लंबे समय से यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) उन्हें एक और कार्यकाल के लिए समर्थन दे सकता है। हालांकि भाजपा ने अंततः अपने नेता एम. नगराज को मैदान में उतारकर इन अटकलों पर विराम लगा दिया।
कौन हैं एम. नगराज?
प्रोफेसर एम. नगराज कर्नाटक भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं। वे शिक्षा, प्रशासन और संगठनात्मक कार्यों में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। उन्होंने छात्र संगठन से लेकर भाजपा संगठन तक विभिन्न जिम्मेदारियां निभाई हैं। नगराज पहले भाजपा के राज्य उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं और कर्नाटक लोक सेवा आयोग (केपीएससी) के सदस्य के रूप में भी कार्य कर चुके हैं। भाजपा नेतृत्व का मानना है कि उनका अनुभव और संगठनात्मक समझ उन्हें राज्यसभा के लिए उपयुक्त उम्मीदवार बनाती है।
देवेगौड़ा की उम्मीदों को झटका
93 वर्षीय देवेगौड़ा भारतीय राजनीति के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं। वे भारत के पूर्व प्रधानमंत्री रह चुके हैं और कर्नाटक की राजनीति में उनका विशेष प्रभाव रहा है। जेडी(एस) के कई नेताओं और समर्थकों को उम्मीद थी कि भाजपा गठबंधन धर्म निभाते हुए उन्हें एक और कार्यकाल के लिए समर्थन देगी। लेकिन भाजपा के फैसले ने इन उम्मीदों को समाप्त कर दिया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने यह फैसला भविष्य की राजनीति और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर लिया है। रिपोर्टों के अनुसार, नगराज अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समुदाय से आते हैं और भाजपा इस वर्ग में अपनी पकड़ को और मजबूत करना चाहती है।
कांग्रेस ने साधा निशाना
भाजपा के फैसले के बाद कांग्रेस ने तुरंत हमला बोल दिया। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि भाजपा ने एक पूर्व प्रधानमंत्री को सम्मानजनक विदाई देने के बजाय उन्हें नजरअंदाज किया है। कांग्रेस का कहना है कि यह केवल जेडी(एस) का नहीं बल्कि कर्नाटक के सम्मान का भी प्रश्न है। कुछ कांग्रेस नेताओं ने इसे जेडी(एस) के लिए राजनीतिक अपमान तक करार दिया- Rajya Sabha
कांग्रेस ने यह भी याद दिलाया कि अतीत में राजनीतिक मतभेदों के बावजूद उसने देवेगौड़ा को राज्यसभा पहुंचाने में समर्थन दिया था। अब भाजपा द्वारा उन्हें टिकट न देना कई सवाल खड़े करता है।
जेडी(एस) की स्थिति
जेडी(एस) ने सार्वजनिक रूप से भाजपा के फैसले का तीखा विरोध नहीं किया है, लेकिन पार्टी के भीतर इस मुद्दे को लेकर चर्चा जारी है। पार्टी नेताओं का कहना है कि एनडीए के भीतर सभी फैसले सामूहिक रूप से लिए जाते हैं और वे गठबंधन की मजबूती को प्राथमिकता देते हैं। हालांकि राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस घटनाक्रम ने जेडी(एस) कार्यकर्ताओं के बीच कुछ निराशा जरूर पैदा की है।
क्या यह देवेगौड़ा के संसदीय करियर का अंत है?
भाजपा द्वारा नगराज को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद कई राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे देवेगौड़ा के संसदीय जीवन के एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा है। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि उम्र और स्वास्थ्य संबंधी कारणों को देखते हुए स्वयं देवेगौड़ा ने भी सक्रिय चुनावी राजनीति से दूरी बनाने का फैसला किया है। यदि ऐसा है तो यह उनके सात दशक से अधिक लंबे राजनीतिक सफर का एक ऐतिहासिक अध्याय साबित होगा।
भाजपा की रणनीति
भाजपा का यह फैसला केवल एक उम्मीदवार चयन भर नहीं माना जा रहा है। इसके पीछे पार्टी की व्यापक राजनीतिक रणनीति भी देखी जा रही है। कर्नाटक में भाजपा आने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए नए नेतृत्व को आगे बढ़ाने और विभिन्न सामाजिक वर्गों में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश कर रही है। नगराज की उम्मीदवारी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
आगे की राजनीति पर नजर
राज्यसभा चुनावों के परिणाम भले ही संख्या बल के आधार पर काफी हद तक स्पष्ट दिखाई दें, लेकिन उम्मीदवारों के चयन ने राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। भाजपा, जेडी(एस) और कांग्रेस तीनों ही दल इस मुद्दे को अपने-अपने तरीके से जनता के सामने रख रहे हैं।
फिलहाल इतना तय है कि एम. नगराज की उम्मीदवारी ने कर्नाटक की राजनीति में नई चर्चा को जन्म दिया है। वहीं, देवेगौड़ा को दोबारा राज्यसभा न भेजे जाने का फैसला आने वाले दिनों में एनडीए गठबंधन और राज्य की राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु बना रहेगा।

