Ayodhya ट्रस्ट सरकार के सामने जवाबदेह नहीं है, पिछले साल MHA ने CIC से कहा
Ayodhya में राम मंदिर निर्माण और उससे जुड़े दान, ट्रस्ट के कामकाज तथा पारदर्शिता को लेकर समय-समय पर सार्वजनिक बहस होती रही है। इसी क्रम में पिछले वर्ष एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया, जब केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के समक्ष कहा कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट केंद्र सरकार के प्रति जवाबदेह सार्वजनिक प्राधिकरण (Public Authority) नहीं है। इस बयान के बाद सूचना के अधिकार (RTI) कानून के दायरे में ट्रस्ट की स्थिति को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई।
गृह मंत्रालय का पक्ष मुख्य रूप से इस बात पर आधारित था कि Ayodhya श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन भारतीय ट्रस्ट अधिनियम और संबंधित कानूनी प्रावधानों के अनुरूप किया गया है। मंत्रालय का कहना था कि यह ट्रस्ट अपनी प्रशासनिक और वित्तीय गतिविधियों के संचालन में स्वतंत्र है तथा केंद्र सरकार द्वारा नियंत्रित या संचालित सार्वजनिक संस्था नहीं माना जा सकता। इसलिए इसे स्वतः सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत “लोक प्राधिकरण” की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
यह मामला तब सामने आया जब एक आरटीआई आवेदन के माध्यम से ट्रस्ट से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जानकारी मांगी गई थी। सूचना उपलब्ध न होने पर मामला केंद्रीय सूचना आयोग तक पहुंचा। सुनवाई के दौरान गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि ट्रस्ट सरकार का कोई विभाग या सरकारी निकाय नहीं है और न ही वह मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करता है। इसलिए मंत्रालय के पास ट्रस्ट की आंतरिक गतिविधियों या निर्णयों से संबंधित जानकारी उपलब्ध नहीं है।
गौरतलब है कि वर्ष 2020 में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के बाद केंद्र सरकार ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया था। इस ट्रस्ट का उद्देश्य अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण, रखरखाव और उससे जुड़े धार्मिक एवं प्रशासनिक कार्यों का संचालन करना है। ट्रस्ट में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े सदस्य शामिल हैं और यह अपने नियमों के अनुसार कार्य करता है।
हालांकि, आलोचकों का तर्क है कि ट्रस्ट का गठन केंद्र सरकार द्वारा किया गया था और उसे व्यापक जनसमर्थन तथा करोड़ों Ayodhya श्रद्धालुओं से प्राप्त दान का प्रबंधन करना पड़ता है। ऐसे में उसके कार्यों में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। उनका मानना है कि जनता से प्राप्त धन और राष्ट्रीय महत्व की परियोजना होने के कारण ट्रस्ट को अधिक सार्वजनिक उत्तरदायित्व निभाना चाहिए।
दूसरी ओर, ट्रस्ट के समर्थकों का कहना है कि धार्मिक और धर्मार्थ ट्रस्टों की अपनी स्वतंत्र कानूनी पहचान होती है। केवल सरकार द्वारा गठन किए जाने या किसी विशेष उद्देश्य के लिए स्थापित होने से कोई संस्था स्वतः आरटीआई के दायरे में नहीं आ जाती। यदि किसी संस्था पर सरकार का प्रत्यक्ष नियंत्रण, पर्याप्त वित्तीय सहायता या प्रशासनिक निगरानी नहीं है, तो उसे सार्वजनिक प्राधिकरण मानना कानून की भावना के अनुरूप नहीं होगा।
सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 2(h) के अनुसार, किसी संस्था को सार्वजनिक प्राधिकरण तभी माना जाता है जब उसका गठन संविधान, संसद या राज्य विधानमंडल के कानून अथवा सरकारी अधिसूचना से हुआ हो और उस पर सरकार का पर्याप्त नियंत्रण या वित्तीय पोषण हो। इसी कानूनी व्याख्या के आधार पर गृह मंत्रालय ने केंद्रीय सूचना आयोग के समक्ष अपना पक्ष रखा।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा किया है कि धार्मिक ट्रस्टों और सार्वजनिक महत्व वाली संस्थाओं में पारदर्शिता का स्तर क्या होना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि कानूनी स्थिति और नैतिक जवाबदेही दो अलग-अलग विषय हैं। कोई संस्था कानूनी रूप से आरटीआई के दायरे में न हो, फिर भी वह स्वेच्छा से अपनी आय, व्यय, दान और प्रमुख निर्णयों की जानकारी सार्वजनिक कर सकती है, जिससे लोगों का विश्वास और मजबूत होता है।
Ayodhya राम मंदिर से जुड़े दान और ट्रस्ट के कार्यों को लेकर समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों द्वारा सवाल उठाए जाते रहे हैं। वहीं ट्रस्ट की ओर से भी कई अवसरों पर निर्माण कार्य की प्रगति, धार्मिक कार्यक्रमों और अन्य गतिविधियों की जानकारी सार्वजनिक की जाती रही है। हालांकि, आरटीआई के माध्यम से जानकारी उपलब्ध कराने का प्रश्न अभी भी कानूनी बहस का विषय बना हुआ है।
भविष्य में यदि इस विषय पर कोई नया न्यायिक निर्णय, विधायी संशोधन या केंद्रीय सूचना आयोग का अंतिम आदेश आता है, तो उससे ट्रस्ट की जवाबदेही और सूचना उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर प्रभाव पड़ सकता है। फिलहाल गृह मंत्रालय का रुख यही है कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट केंद्र सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करने वाला सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं है और इसलिए वह सरकार के प्रति उसी प्रकार जवाबदेह नहीं है, जैसे कोई सरकारी विभाग या सार्वजनिक निकाय होता है।
इस पूरे मामले ने पारदर्शिता, धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता और सूचना के अधिकार के बीच संतुलन की आवश्यकता पर एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है। आने वाले समय में इस विषय पर कानूनी और नीतिगत स्तर पर होने वाले निर्णय यह तय करेंगे कि राष्ट्रीय महत्व के धार्मिक ट्रस्टों की जवाबदेही का दायरा किस प्रकार परिभाषित किया जाएगा।

