Punjab कांग्रेस में नई खटास: रंधावा ने वारींग के ‘एक परिवार, एक टिकट’ नियम को चुनौती दी
Punjab कांग्रेस में लंबे समय से चल रही अंदरूनी खींचतान एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और गुरदासपुर से सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वारींग के ‘एक परिवार, एक टिकट’ फॉर्मूले को सार्वजनिक मंच से चुनौती दी है। रंधावा ने साफ कहा कि टिकट देने का आधार परिवार नहीं, बल्कि चुनाव जीतने की क्षमता यानी ‘विनेबिलिटी’ होनी चाहिए। उनके इस बयान ने 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी को और उजागर कर दिया है।
रंधावा ने क्या कहा?
Punjabcलुधियाना के इस्सरू में आयोजित एक राजनीतिक सम्मेलन में रंधावा ने वारींग के उस बयान पर सवाल उठाया, जिसमें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा था कि आगामी विधानसभा चुनाव में एक परिवार को केवल एक टिकट दिया जाएगा। रंधावा ने कहा कि अगर एक ही परिवार के कई सदस्य चुनाव जीतने की क्षमता रखते हैं तो उन्हें टिकट देने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने यहां तक कहा कि किसी परिवार के दो नहीं, बल्कि चार उम्मीदवार भी जीतने की क्षमता रखते हों तो उन्हें टिकट दिया जा सकता है।
रंधावा का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह लंबे समय से वारींग के नेतृत्व से असहमत नेताओं के समूह में दिखाई दे रहे हैं। उनके साथ पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और कुछ अन्य वरिष्ठ नेता भी प्रदेश नेतृत्व में बदलाव की मांग कर चुके हैं। जुलाई में इन नेताओं ने वारींग के नेतृत्व में पार्टी के कार्यक्रमों के बहिष्कार की रणनीति तक अपनाई थी।
वारींग का जवाब भी आया
रंधावा के बयान के कुछ ही घंटों बाद राजा वारींग ने सोशल मीडिया के जरिए अपना जवाब दिया। उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी की तस्वीर साझा करते हुए संकेत दिया कि ‘एक परिवार, एक टिकट’ की नीति उनका व्यक्तिगत फैसला नहीं बल्कि राहुल गांधी द्वारा समर्थित सिद्धांत है। राहुल गांधी पहले भी परिवारवाद को सीमित करने और संगठन में नए लोगों को अवसर देने की बात कर चुके हैं।
वारींग ने इससे पहले कहा था कि उनके नेतृत्व में पार्टी एक परिवार से केवल एक उम्मीदवार को टिकट देने के सिद्धांत पर चलेगी। उन्होंने यह भी कहा था कि पार्टी में युवाओं को बड़े पैमाने पर मौका दिया जाएगा। उनका तर्क है कि लंबे समय से राजनीति कर रहे कुछ बड़े नेताओं के परिवारों तक टिकट सीमित रहने से आम कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए आगे बढ़ने के अवसर कम हो जाते हैं।
विवाद सिर्फ टिकट का नहीं
ऊपरी तौर पर यह विवाद टिकट वितरण की नीति को लेकर दिखाई देता है, लेकिन इसके पीछे पंजाब कांग्रेस में चल रही व्यापक नेतृत्व की लड़ाई भी है। कांग्रेस हाईकमान ने जुलाई में वारींग को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर बनाए रखने का फैसला किया था। इसके साथ ही चरणजीत सिंह चन्नी को चुनाव अभियान समिति की जिम्मेदारी दी गई। इस फैसले से चन्नी समर्थक खेमे में नाराजगी देखी गई और कुछ नेताओं ने वारींग को हटाने की मांग की।
चन्नी समर्थक नेताओं की गतिविधियां लगातार वारींग के लिए चुनौती बनती रही हैं। जुलाई में चन्नी के साथ रंधावा, परगट सिंह और अन्य वरिष्ठ नेताओं की बैठक को शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा गया था। इन नेताओं ने प्रदेश संगठन की कार्यशैली पर सवाल उठाए और पार्टी हाईकमान के सामने अपनी चिंताएं रखने की बात कही।
इस्सरू सम्मेलन ने बढ़ाई चर्चा
इस्सरू में हुआ सम्मेलन भी कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के लिहाज से अहम रहा। कार्यक्रम में रंधावा के साथ पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी भी मौजूद थे, जबकि वारींग मंच पर नहीं थे। कार्यक्रम का आयोजन प्रदेश कांग्रेस कमेटी के आधिकारिक कार्यक्रम के तौर पर नहीं हुआ था। ऐसे में रंधावा का वहां से वारींग की टिकट नीति पर सीधा हमला करना पार्टी के भीतर चल रहे शक्ति संघर्ष का सार्वजनिक संकेत माना जा रहा है।
रंधावा ने अपने भाषण में कांग्रेस के पुराने इतिहास और पार्टी के प्रति अपने परिवार की प्रतिबद्धता का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस उनके परिवार के लिए सिर्फ एक राजनीतिक दल नहीं बल्कि लंबे समय से जुड़ी राजनीतिक विरासत है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मौजूदा दौर में पार्टी के भीतर मतभेद पहले की तुलना में ज्यादा सार्वजनिक हो गए हैं।
विनेबिलिटी बनाम संगठनात्मक सुधार
इस विवाद में दो अलग-अलग राजनीतिक तर्क सामने आ रहे हैं। रंधावा का जोर ‘विनेबिलिटी’ पर है। उनका मानना है कि यदि किसी उम्मीदवार की जीत की संभावना मजबूत है तो केवल इस वजह से उसे टिकट से वंचित नहीं किया जाना चाहिए कि उसके परिवार के किसी दूसरे सदस्य को भी टिकट मिल रहा है।
दूसरी ओर, वारींग का फॉर्मूला पार्टी में परिवारवाद कम करने और ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ताओं को अवसर देने पर आधारित है। यह तर्क कांग्रेस के उस व्यापक प्रयास से जुड़ा है जिसमें पार्टी संगठन में नए चेहरों और युवाओं को बढ़ावा देने की बात करती रही है। विवाद इसलिए गहरा है क्योंकि पंजाब की राजनीति में कई परिवारों का लंबे समय से मजबूत प्रभाव रहा है। ऐसे में इस नियम का असर टिकट के दावेदार कई प्रभावशाली परिवारों पर पड़ सकता है।
BJP को मिला कांग्रेस पर हमला करने का मौका
कांग्रेस के भीतर शुरू हुए इस विवाद का राजनीतिक लाभ विपक्षी दल उठाने लगे हैं। BJP नेता रवनीत सिंह बिट्टू ने रंधावा के रुख का समर्थन करते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि गांधी परिवार के कई सदस्य संसद में रह सकते हैं, तो दूसरे राजनीतिक परिवारों के लिए अलग नियम क्यों हों। बिट्टू ने कांग्रेस के 2022 उदयपुर घोषणा-पत्र में दिए गए ‘एक परिवार, एक टिकट’ सिद्धांत का भी हवाला दिया।
इस तरह कांग्रेस के भीतर का विवाद अब केवल संगठनात्मक मामला नहीं रह गया है। BJP और अन्य विपक्षी दल इसे कांग्रेस के कथित दोहरे मानदंड और परिवारवाद के मुद्दे से जोड़कर जनता के सामने पेश कर सकते हैं।
2027 चुनाव से पहले बड़ी चुनौती
Punjab में अगला विधानसभा चुनाव 2027 में होना है और कांग्रेस के सामने आम आदमी पार्टी तथा BJP जैसी राजनीतिक ताकतों से मुकाबला करने की चुनौती है। ऐसे समय में पार्टी के भीतर लगातार सार्वजनिक मतभेद चुनावी तैयारियों को प्रभावित कर सकते हैं। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने भी माना है कि पिछले कुछ महीनों से चल रही खींचतान का असर पार्टी की चुनावी तैयारियों पर पड़ना शुरू हो गया है।
फिलहाल कांग्रेस हाईकमान वारींग के पीछे खड़ा दिखाई देता है। पंजाब के पार्टी प्रभारी भूपेश बघेल भी कई मौकों पर नेतृत्व में तत्काल बदलाव की संभावना को खारिज कर चुके हैं। वहीं, चन्नी और रंधावा खेमे की असहमति पूरी तरह समाप्त होती नहीं दिख रही।
आने वाले महीनों में टिकट वितरण का मुद्दा कांग्रेस के लिए और संवेदनशील हो सकता है। यदि ‘एक परिवार, एक टिकट’ नीति सख्ती से लागू होती है तो कई प्रभावशाली नेताओं के राजनीतिक हित प्रभावित होंगे। यदि पार्टी विनेबिलिटी के आधार पर नियम में ढील देती है तो परिवारवाद के खिलाफ उसके अभियान पर सवाल उठ सकते हैं। इसलिए रंधावा और वारींग के बीच शुरू हुआ यह विवाद केवल व्यक्तिगत मतभेद नहीं, बल्कि पंजाब कांग्रेस की चुनावी रणनीति, नेतृत्व और संगठन के भविष्य की दिशा तय करने वाली बड़ी बहस बन चुका है।

