Kuki जनगणना से पहले NRC की मांग को कुकी-ज़ो काउंसिल ने बताया ‘अति समयपूर्व’
मणिपुर में नागरिकता और जनसांख्यिकीय स्थिति को लेकर जारी बहस के बीच Kuki-ज़ो समुदाय की प्रमुख संस्था कुकी-ज़ो काउंसिल ने जनगणना पूरी होने से पहले राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) लागू करने की मांग का विरोध किया है। काउंसिल ने ऐसी मांग को ‘अति समयपूर्व’ बताते हुए कहा है कि नागरिकों की पहचान और जनसंख्या से जुड़े किसी भी बड़े निर्णय से पहले विश्वसनीय तथा व्यापक आंकड़े उपलब्ध होना आवश्यक है। इस रुख ने मणिपुर में जनगणना, नागरिकता और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।
Kuki-ज़ो काउंसिल का तर्क है कि जनगणना किसी भी क्षेत्र की जनसंख्या, सामाजिक संरचना और अन्य जनसांख्यिकीय पहलुओं का आधिकारिक आकलन करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसलिए जनगणना के आंकड़े उपलब्ध होने से पहले NRC जैसी प्रक्रिया शुरू करने की मांग को उचित आधार के बिना उठाया गया कदम माना जा सकता है। काउंसिल का कहना है कि पहले तथ्य और आंकड़े सामने आने चाहिए तथा उसके बाद नागरिकता से संबंधित किसी भी नीति पर चर्चा होनी चाहिए।
NRC यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का उद्देश्य किसी क्षेत्र में रहने वाले वास्तविक भारतीय नागरिकों और अवैध प्रवासियों के बीच अंतर स्थापित करना है। भारत के कुछ राज्यों में NRC को लेकर पहले भी व्यापक राजनीतिक और सामाजिक बहस हो चुकी है। मणिपुर में यह मुद्दा विशेष रूप से संवेदनशील है, क्योंकि राज्य लंबे समय से जातीय तनाव, विस्थापन और सीमा से जुड़े सवालों का सामना कर रहा है।
Kuki-ज़ो काउंसिल का विरोध केवल NRC की अवधारणा तक सीमित नहीं है, बल्कि वह इसकी समय-सीमा और प्रक्रिया पर भी सवाल उठा रही है। काउंसिल का मानना है कि जब तक राज्य में व्यापक और निष्पक्ष जनगणना नहीं हो जाती, तब तक आबादी से जुड़े आंकड़ों के आधार पर कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। संस्था का कहना है कि पहले जनसंख्या की वास्तविक स्थिति का आधिकारिक दस्तावेज तैयार किया जाना चाहिए।
मणिपुर में जनसंख्या और प्रवासन का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक चर्चा का हिस्सा रहा है। राज्य की भौगोलिक स्थिति, म्यांमार के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा और विभिन्न समुदायों के बीच ऐतिहासिक संबंधों के कारण सीमा-पार आवाजाही का विषय संवेदनशील रहा है। हाल के जातीय संघर्ष के बाद यह बहस और अधिक जटिल हो गई है। बड़ी संख्या में लोगों के विस्थापित होने से जनसंख्या के आंकड़ों और स्थायी निवास से जुड़े सवाल भी सामने आए हैं।
ऐसे वातावरण में NRC की मांग करने वाले पक्षों का तर्क है कि नागरिकता और अवैध प्रवासन से जुड़े मामलों की स्पष्ट पहचान आवश्यक है। उनका मानना है कि इससे सुरक्षा संबंधी चिंताओं को दूर करने और स्थानीय आबादी के अधिकारों की रक्षा करने में मदद मिल सकती है। दूसरी ओर, विरोध करने वाले पक्षों को आशंका है कि यदि प्रक्रिया पर्याप्त पारदर्शी और विश्वसनीय नहीं हुई, तो इससे वास्तविक नागरिकों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं और सामाजिक तनाव बढ़ सकता है।
Kuki-ज़ो काउंसिल ने इसी संदर्भ में सावधानी बरतने की मांग की है। संस्था का कहना है कि नागरिकता से जुड़े किसी भी कदम में सभी समुदायों के अधिकारों और हितों का समान रूप से ध्यान रखा जाना चाहिए। किसी समुदाय को केवल उसकी जातीय पहचान, निवास क्षेत्र या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। नागरिकता का निर्धारण निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं और दस्तावेजी प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए।
जनगणना और NRC के बीच अंतर को समझना भी इस बहस में महत्वपूर्ण है। जनगणना का मुख्य उद्देश्य देश की जनसंख्या और उसकी सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का सांख्यिकीय आकलन करना है, जबकि NRC नागरिकता की स्थिति से संबंधित रजिस्टर है। दोनों प्रक्रियाओं के उद्देश्य अलग हैं। इसलिए जनगणना के आंकड़ों को NRC के लिए स्वतः नागरिकता प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसी कारण इस विषय पर किसी भी नीति को स्पष्ट कानूनी ढांचे और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर आगे बढ़ाना आवश्यक होगा।
मणिपुर में जारी राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए सरकार के लिए भी संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण है। एक ओर सीमा सुरक्षा, अवैध प्रवासन और नागरिकता संबंधी चिंताओं को संबोधित करना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर विस्थापित लोगों, अल्पसंख्यक समुदायों और लंबे समय से राज्य में रह रहे नागरिकों के अधिकारों की रक्षा भी आवश्यक है। किसी भी नीति का प्रभाव केवल वर्तमान स्थिति पर नहीं बल्कि आने वाले वर्षों में राज्य के सामाजिक संबंधों पर भी पड़ सकता है।
Kuki-ज़ो काउंसिल का यह रुख केंद्र और राज्य सरकार के सामने संवाद की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। यदि NRC जैसे संवेदनशील विषय पर निर्णय लिया जाता है, तो सभी संबंधित समुदायों के प्रतिनिधियों से परामर्श करना महत्वपूर्ण होगा। पारदर्शी प्रक्रिया, स्पष्ट मानदंड और स्वतंत्र निगरानी जैसे उपाय लोगों के बीच विश्वास बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।
कुल मिलाकर, जनगणना से पहले NRC की मांग को ‘अति समयपूर्व’ बताकर कुकी-ज़ो काउंसिल ने मणिपुर में नागरिकता और जनसांख्यिकीय मुद्दों पर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। संस्था का जोर इस बात पर है कि पहले विश्वसनीय जनसंख्या संबंधी आंकड़े सामने आएं और उसके बाद नागरिकता से जुड़े किसी कदम पर विचार किया जाए। दूसरी ओर, NRC के समर्थक इसे सुरक्षा और नागरिक अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय मानते हैं। ऐसे में आगे की राह संवाद, तथ्यात्मक आंकड़ों और संवैधानिक-कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगी। मणिपुर जैसे संवेदनशील राज्य में किसी भी निर्णय के लिए केवल Kuki प्रशासनिक कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी; सामाजिक विश्वास और सभी समुदायों की भागीदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।

