Government गन्ने से इथेनॉल उत्पादन पर केजरीवाल का केंद्र पर हमला: चीनी की बढ़ती कीमतों ने छेड़ी नई बहस
देश में चीनी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के बीच आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार की इथेनॉल नीति पर तीखा हमला बोला है। केजरीवाल ने आरोप लगाया कि सरकार ने जिस गन्ने का इस्तेमाल चीनी बनाने के लिए किया जाता था, उसका एक बड़ा हिस्सा इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ दिया। उनके मुताबिक, इसका नतीजा यह हुआ कि चीनी की उपलब्धता प्रभावित हुई और अब बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार को विदेशों से चीनी आयात करने की जरूरत पड़ रही है।
केजरीवाल ने 20 अगस्त 2026 को केंद्र की नीतियों पर निशाना साधते हुए सरकार को बेहद तीखी भाषा में घेरा। उनका तर्क था कि सरकार ने पेट्रोल आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा बचाने के उद्देश्य से गन्ने से इथेनॉल बनाने को बढ़ावा दिया। लेकिन यदि इसी प्रक्रिया के कारण घरेलू चीनी की उपलब्धता कम होती है और बाद में चीनी का आयात करना पड़ता है, तो उनके अनुसार नीति के आर्थिक लाभ पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
चीनी की कीमतों में उछाल बना मुद्दा
इस विवाद का तत्काल कारण चीनी की कीमतों में हुई तेज वृद्धि है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, कई बाजारों में चीनी की खुदरा कीमत लगभग 60 से 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है, जबकि कुछ समय पहले यह करीब 45 से 50 रुपये प्रति किलो के आसपास थी। त्योहारी मौसम से पहले मांग बढ़ने की आशंका ने भी कीमतों को लेकर चिंता बढ़ाई है।
इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार ने 31 अक्टूबर 2026 तक 10 लाख टन तक कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। सरकार के इस कदम का उद्देश्य घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाना और कीमतों पर दबाव कम करना बताया जा रहा है। विपक्ष ने इसी फैसले को आधार बनाकर सरकार की इथेनॉल नीति पर सवाल उठाए हैं।
केजरीवाल का कहना है कि एक ओर सरकार विदेशी मुद्रा बचाने के लिए पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने और गन्ने को ईंधन उत्पादन में इस्तेमाल करने को बढ़ावा दे रही थी, जबकि दूसरी ओर अब घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए चीनी का आयात करना पड़ रहा है। उन्होंने इसे सरकारी नीति में विरोधाभास के तौर पर पेश किया है।
Government इथेनॉल नीति का मूल उद्देश्य क्या है?
इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति का उद्देश्य केवल गन्ने का वैकल्पिक इस्तेमाल करना नहीं है। भारत लंबे समय से पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत, ऊर्जा सुरक्षा और कृषि क्षेत्र के लिए वैकल्पिक बाजार तैयार करने जैसे संभावित लाभ जुड़े हैं।
सरकार की नीति के समर्थकों का तर्क है कि देश को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चा तेल आयात करना पड़ता है। यदि पेट्रोल में घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ता है, तो तेल आयात की आवश्यकता और उससे जुड़ा विदेशी मुद्रा खर्च घटाया जा सकता है। इसके अलावा, गन्ना किसानों और चीनी मिलों को भी इथेनॉल उत्पादन से अतिरिक्त बाजार मिल सकता है।
यही वजह है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग को सरकार ऊर्जा सुरक्षा और वैकल्पिक ईंधन की रणनीति के रूप में देखती है। लेकिन अब सवाल यह है कि ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
केजरीवाल का मुख्य सवाल: नीति का कुल फायदा कितना?
केजरीवाल की आलोचना का केंद्र यही आर्थिक गणित है। उनका कहना है कि यदि इथेनॉल बनाने के लिए गन्ने का इस्तेमाल बढ़ाने से चीनी का उत्पादन प्रभावित होता है, तो एक तरफ बचाई गई विदेशी मुद्रा का लाभ दूसरी तरफ चीनी आयात में खर्च हो सकता है।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चीनी केवल एक सामान्य खाद्य पदार्थ नहीं है, बल्कि भारतीय खाद्य उद्योग, मिठाई उद्योग और त्योहारों की मांग से सीधे जुड़ी वस्तु है। कीमतों में तेज वृद्धि का सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ता है।
हालांकि, केवल चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी को इथेनॉल नीति का प्रत्यक्ष और एकमात्र परिणाम मानना भी उचित नहीं होगा। चीनी की कीमतों पर उत्पादन, स्टॉक, निर्यात-आयात नीति, मौसम, मांग और वैश्विक बाजार जैसी कई चीजों का असर पड़ता है। इसलिए इस पूरे विवाद को समझने के लिए व्यापक आपूर्ति और मांग के आंकड़ों को देखना जरूरी है।
E20 को लेकर पहले से जारी है राजनीतिक टकराव
इथेनॉल का मुद्दा केजरीवाल और केंद्र सरकार के बीच नया विवाद नहीं है। पिछले कुछ सप्ताह से वह E20 पेट्रोल यानी 20 प्रतिशत तक इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की नीति को लेकर भी केंद्र पर सवाल उठाते रहे हैं। जुलाई में उन्होंने आरोप लगाया था कि वाहन कंपनियां सरकार के दबाव के कारण पुराने वाहनों पर E20 के संभावित प्रभावों को लेकर खुलकर नहीं बोल रही हैं। बीजेपी नेताओं ने इन आरोपों को खारिज करते हुए उनसे ठोस प्रमाण देने को कहा था।
अगस्त की शुरुआत में केजरीवाल ने यह भी दावा किया था कि सरकार भविष्य में इथेनॉल ब्लेंडिंग को डीजल और विमान ईंधन तक बढ़ाने की योजना बना रही है। हालांकि, केंद्र ने स्पष्ट किया था कि विमान ईंधन यानी ATF में इथेनॉल मिलाने का ऐसा कोई प्रस्ताव फिलहाल विचाराधीन नहीं है।
इससे साफ है कि इथेनॉल अब केवल ऊर्जा नीति का विषय नहीं रह गया है। यह राजनीतिक बहस का भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है।
आगे की चुनौती: ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा में संतुलन
मौजूदा विवाद सरकार के सामने एक बड़ी नीति चुनौती रखता है। भारत को एक तरफ पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करनी है और वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देना है, वहीं दूसरी तरफ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि खाद्य वस्तुओं की घरेलू आपूर्ति प्रभावित न हो।
गन्ने का इस्तेमाल चीनी और इथेनॉल दोनों के लिए किया जा सकता है। इसलिए नीति-निर्माताओं के सामने यह तय करने की चुनौती रहती है कि बाजार और घरेलू जरूरतों के अनुसार दोनों क्षेत्रों के बीच कितना संतुलन रखा जाए।
कुल मिलाकर, केजरीवाल की आलोचना ने चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच इथेनॉल नीति के आर्थिक और सामाजिक प्रभावों पर बहस को तेज कर दिया है। सरकार के लिए यह बताना महत्वपूर्ण होगा कि इथेनॉल से होने वाली विदेशी मुद्रा बचत और चीनी आयात पर होने वाले संभावित खर्च के बीच वास्तविक आर्थिक संतुलन क्या है। वहीं विपक्ष के लिए भी जरूरी होगा कि वह अपने आरोपों को ठोस उत्पादन, कीमत और इथेनॉल आवंटन के आंकड़ों से साबित करे।
आने वाले महीनों में चीनी की कीमतें, घरेलू उत्पादन और इथेनॉल की मांग यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे कि वर्तमान विवाद महज राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप बनकर रह जाता है या भारत की ऊर्जा और कृषि नीति में बड़े बदलाव की मांग को जन्म देता है।

