Vijay सरकार की मातृत्व अवकाश योजना ने सहयोगी कांग्रेस के साथ ‘दरार’ को जन्म दिया?
तमिलनाडु में मुख्यमंत्री सी. जोसेफ Vijay की अगुवाई वाली तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) सरकार की नई मातृत्व अवकाश नीति ने उसके सहयोगी दल कांग्रेस के साथ मतभेदों को उजागर कर दिया है। सरकार ने राज्य की महिला सरकारी कर्मचारियों के लिए तीसरे बच्चे के जन्म पर मिलने वाली मातृत्व छुट्टी को 12 सप्ताह से बढ़ाकर 365 दिन कर दिया है। सरकार का यह फैसला महिलाओं और परिवारों के लिए कल्याणकारी कदम के तौर पर पेश किया गया है, लेकिन कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने सार्वजनिक रूप से इस नीति पर असहमति जताई है।
यह विवाद इसलिए राजनीतिक महत्व रखता है क्योंकि कांग्रेस तमिलनाडु में विजय सरकार की सहयोगी है। ऐसे में सरकार की एक प्रमुख सामाजिक नीति पर सहयोगी दल के वरिष्ठ नेता की खुली आलोचना सत्ता गठबंधन के भीतर नीति संबंधी मतभेदों की ओर इशारा करती है। हालांकि, अभी इसे गठबंधन टूटने या गंभीर राजनीतिक संकट का संकेत मानना जल्दबाजी होगी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, असहमति मुख्य रूप से जनसंख्या नीति और बड़े परिवारों को प्रोत्साहन देने के सवाल पर है।
क्या है Vijay सरकार का नया फैसला?
तमिलनाडु सरकार ने 19 अगस्त 2026 को घोषणा की कि राज्य सरकार की महिला कर्मचारियों को तीसरे बच्चे के जन्म पर भी एक साल की मातृत्व छुट्टी मिलेगी। इससे पहले पहले और दूसरे बच्चे के लिए एक वर्ष की छुट्टी का प्रावधान था, जबकि तीसरे बच्चे के लिए केवल 12 सप्ताह की छुट्टी मिलती थी। नए फैसले के बाद तीसरे बच्चे के लिए भी छुट्टी की अवधि 365 दिन हो गई है।
सरकार का कदम ऐसे समय आया है जब तमिलनाडु समेत दक्षिण भारत के कई राज्यों में घटती प्रजनन दर और तेजी से बदलती जनसांख्यिकीय संरचना को लेकर चर्चा बढ़ रही है। सरकार इस नीति को महिलाओं को परिवार और नौकरी के बीच बेहतर संतुलन बनाने में मदद करने वाले कल्याणकारी उपाय के रूप में देख रही है।
नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इससे तीसरे बच्चे के जन्म के बाद महिला सरकारी कर्मचारी को नौकरी छोड़ने या लंबे समय तक करियर से दूर रहने की मजबूरी कम हो सकती है।
कांग्रेस को किस बात पर आपत्ति है?
कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने मातृत्व अवकाश बढ़ाने के सिद्धांत का विरोध नहीं किया। उनकी आपत्ति इस बात पर है कि तीसरे बच्चे के लिए छुट्टी को एक साल तक बढ़ाना अप्रत्यक्ष रूप से बड़े परिवारों को प्रोत्साहित कर सकता है।
NDTV से बातचीत में चिदंबरम ने कहा कि वह मातृत्व अवकाश का समर्थन करते हैं और उनका मानना है कि सभी कामकाजी माताओं को मातृत्व अवकाश मिलना चाहिए। उन्होंने पितृत्व अवकाश की भी वकालत की, क्योंकि बच्चे की परवरिश केवल महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए। लेकिन उन्होंने कहा कि वह ऐसी नीति से सहमत नहीं हैं जो बड़े परिवारों को प्रोत्साहित करती हो।
उनके मुताबिक भारत और तमिलनाडु को केवल बड़ी आबादी नहीं, बल्कि शिक्षित, प्रशिक्षित और स्वस्थ आबादी की जरूरत है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या परिवारों के पास बच्चों को पर्याप्त शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य अवसर उपलब्ध कराने के लिए जरूरी संसाधन हैं।
यही टिप्पणी सरकार की नीति को लेकर बहस का केंद्र बन गई है।
जनसंख्या बनाम महिला अधिकार
इस विवाद में दो अलग-अलग दृष्टिकोण दिखाई दे रहे हैं। पहला दृष्टिकोण मातृत्व अवकाश को महिला अधिकार और श्रम कल्याण के रूप में देखता है। इसके अनुसार, बच्चे की संख्या चाहे एक हो, दो हो या तीन, महिला कर्मचारी को प्रसव के बाद पर्याप्त समय और नौकरी की सुरक्षा मिलनी चाहिए।
दूसरा दृष्टिकोण जनसंख्या नीति से जुड़ा है। इस नजरिए से तीसरे बच्चे के लिए एक साल की छुट्टी को केवल मातृत्व सुविधा नहीं, बल्कि परिवार के आकार को प्रभावित करने वाली सरकारी नीति के रूप में देखा जा सकता है।
कांग्रेस के कार्ति चिदंबरम ने इसी दूसरे पहलू पर सवाल उठाया है। उनका तर्क है कि सरकारों को जनसंख्या बढ़ाने के बजाय मानव संसाधन की गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने छोटे लेकिन बेहतर शिक्षित और स्वस्थ परिवारों की आवश्यकता पर जोर दिया।
तमिलनाडु में बदल रही जनसांख्यिकी
विजय सरकार के फैसले की पृष्ठभूमि में तमिलनाडु की बदलती जनसांख्यिकीय स्थिति को भी समझना जरूरी है। राज्य में प्रजनन दर लंबे समय से राष्ट्रीय औसत से नीचे रही है और दक्षिणी राज्यों में भविष्य में बुजुर्ग आबादी बढ़ने की चिंता व्यक्त की जाती रही है।
ऐसे माहौल में तीसरे बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश बढ़ाने का फैसला व्यापक जनसांख्यिकीय बहस से जुड़ गया है। सरकार का दृष्टिकोण यह हो सकता है कि यदि कर्मचारी महिलाओं को परिवार बढ़ाने के बाद भी नौकरी की सुरक्षा और पर्याप्त अवकाश मिले, तो वे करियर और परिवार के बीच संतुलन बेहतर तरीके से बना सकती हैं।
हालांकि, यह सवाल खुला है कि केवल मातृत्व अवकाश बढ़ाने से जन्मदर में वास्तविक वृद्धि होगी या नहीं। परिवार का आकार आमतौर पर शिक्षा, आय, आवास, स्वास्थ्य सेवाओं, बच्चों की परवरिश की लागत और महिलाओं के रोजगार जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है।
गठबंधन के लिए कितना बड़ा खतरा?
कांग्रेस और TVK के बीच इस मुद्दे पर मतभेद निश्चित रूप से राजनीतिक रूप से ध्यान खींचने वाले हैं, लेकिन फिलहाल इसे गठबंधन संकट कहना उचित नहीं होगा। कांग्रेस ने विजय सरकार को समर्थन दिया है और मई 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए TVK को समर्थन देने का फैसला किया था। उस समय कांग्रेस ने कुछ राजनीतिक शर्तों के साथ विजय का समर्थन किया था।
इसलिए दोनों दलों के बीच किसी एक नीति पर मतभेद होना गठबंधन समाप्त होने के बराबर नहीं है। लोकतांत्रिक गठबंधनों में आर्थिक, सामाजिक और जनसंख्या नीतियों को लेकर अलग-अलग विचार होना असामान्य नहीं है।
लेकिन यदि ऐसे मतभेद लगातार बढ़ते हैं और सहयोगी दल सरकार की कई प्रमुख नीतियों के खिलाफ खुलकर सामने आने लगता है, तो राजनीतिक स्थिरता पर इसका असर पड़ सकता है।
कांग्रेस के लिए भी यह संवेदनशील मुद्दा
कांग्रेस के सामने भी संतुलन की चुनौती है। एक तरफ उसे गठबंधन सहयोगी के रूप में सरकार की नीतियों का समर्थन करना है, वहीं दूसरी तरफ उसके नेताओं को अपनी वैचारिक और नीतिगत स्थिति रखने का अधिकार है।
कार्ति चिदंबरम ने जिस तरह अपनी बात रखी, उसमें मातृत्व अवकाश का समर्थन और बड़े परिवारों को प्रोत्साहन देने का विरोध—दोनों बातें शामिल थीं। उन्होंने यह भी कहा कि मातृत्व अवकाश को सरकारी क्षेत्र से आगे निजी क्षेत्र की कामकाजी महिलाओं तक विस्तारित किया जाना चाहिए।
इसलिए कांग्रेस की आपत्ति को सीधे महिलाओं के कल्याण के विरोध के रूप में देखना सही नहीं होगा। असहमति मुख्य रूप से इस सवाल पर है कि मातृत्व नीति को जनसंख्या बढ़ाने के लक्ष्य से जोड़ा जाना चाहिए या नहीं।
विजय सरकार के सामने चुनौती
विजय सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी नीति का उद्देश्य स्पष्ट करना होगा। यदि सरकार का मकसद महिला कर्मचारियों को तीसरे बच्चे के बाद भी पर्याप्त स्वास्थ्य लाभ और नौकरी की सुरक्षा देना है, तो उसे इस पहल को महिला-केंद्रित श्रम सुधार के रूप में स्पष्ट करना होगा।
यदि इसके पीछे जनसंख्या वृद्धि भी एक उद्देश्य है, तो सरकार को यह बताना होगा कि वह इस नीति को व्यापक जनसांख्यिकीय रणनीति से कैसे जोड़ती है और इसके आर्थिक तथा सामाजिक प्रभावों का आकलन कैसे किया गया है।
साथ ही, पितृत्व अवकाश, चाइल्डकेयर सुविधाएं, क्रेच, लचीले काम के घंटे और निजी क्षेत्र में मातृत्व लाभ जैसे मुद्दे भी चर्चा का हिस्सा बन सकते हैं।
आगे की राजनीति पर नजर
विजय सरकार अभी अपने शुरुआती कार्यकाल में है और कई नई नीतियों के जरिए अपनी राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश कर रही है। हाल के दिनों में सरकार ने महिला कल्याण, विधायकों की सुविधाओं और शिक्षा जैसे विभिन्न मुद्दों पर फैसले लिए हैं।
ऐसे में मातृत्व अवकाश का फैसला सरकार के सामाजिक एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। लेकिन सहयोगी कांग्रेस की असहमति यह भी दिखाती है कि नई सरकार के लिए नीतिगत सहमति बनाए रखना आसान नहीं होगा।
विपक्ष इस मतभेद को सरकार की नीति पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल कर सकता है। दूसरी ओर, TVK इसे महिला कर्मचारियों के अधिकारों को मजबूत करने वाला कदम बताकर अपना बचाव कर सकती है।
निष्कर्ष
विजय सरकार की तीसरे बच्चे के लिए 365 दिन मातृत्व अवकाश देने की घोषणा ने तमिलनाडु की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। सरकार इसे महिलाओं के लिए अतिरिक्त सुरक्षा और कल्याणकारी सुविधा के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जबकि कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने बड़े परिवारों को प्रोत्साहित करने की संभावित दिशा पर असहमति जताई है।
फिलहाल यह मतभेद TVK-कांग्रेस गठबंधन के टूटने का संकेत नहीं है, लेकिन यह जरूर बताता है कि गठबंधन के भीतर सामाजिक और जनसंख्या नीतियों को लेकर अलग-अलग सोच मौजूद है। आने वाले समय में असली सवाल यह होगा कि सरकार इस नीति को किस उद्देश्य से लागू करती है और क्या इससे महिला कर्मचारियों को वास्तविक लाभ मिलता है।
एक बात स्पष्ट है—मातृत्व अवकाश का मुद्दा अब केवल कर्मचारी कल्याण तक सीमित नहीं रहा। यह महिला अधिकार, परिवार की पसंद, जनसंख्या नीति और गठबंधन राजनीति—चारों को एक साथ जोड़ने वाली बहस बन चुका है।

