CJP के स्कूल सुधार अभियान को राजनीतिक रुकावट का सामना, कार्यक्रम स्थल ने दरवाज़े बंद किए
देश में सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर शुरू किए गए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के अभियान को अब राजनीतिक विवाद का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी का आरोप है कि उसके कार्यक्रमों को रोकने के लिए राजनीतिक दबाव का इस्तेमाल किया जा रहा है और कई आयोजनों के लिए पहले से तय किए गए स्थल अंतिम समय में उपलब्ध नहीं कराए गए। हालिया मामला पश्चिम बंगाल का बताया जा रहा है, जहां CJP के एक कार्यक्रम के लिए बुक किए गए स्थल के प्रबंधन ने कथित तौर पर अनुमति वापस ले ली। हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
CJP ने 15 अगस्त से देशभर में सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने के उद्देश्य से ‘School Thik Karo’ अभियान शुरू करने की घोषणा की थी। इस अभियान का फोकस केवल सरकार की आलोचना करना नहीं, बल्कि स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति सामने लाना और स्थानीय समुदाय को जवाबदेही की प्रक्रिया में शामिल करना है। पार्टी ने ग्रामीण क्षेत्रों में अभिभावकों और स्थानीय प्रतिनिधियों से स्कूलों में बिजली, पानी, शौचालय, मिड-डे मील और अन्य सुविधाओं का सोशल ऑडिट करने की अपील की है।
कार्यक्रम स्थल बदलने का आरोप
पश्चिम बंगाल में CJP ने आरोप लगाया कि उसके एक कार्यक्रम को आयोजित करने के लिए पहले से तय स्थल पर राजनीतिक दबाव डाला गया। पार्टी के अनुसार, कार्यक्रम स्थल के प्रबंधन ने अनुमति वापस ले ली, जिसके बाद आयोजकों को बैठक के लिए वैकल्पिक स्थान तलाशना पड़ा। CJP ने इसे विपक्षी आवाज को दबाने की कोशिश बताते हुए आरोप लगाया कि ऐसी रणनीति का इस्तेमाल अन्य राज्यों में भी किया जा रहा है।
हालांकि, इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है। उपलब्ध रिपोर्टों में राजनीतिक दबाव का आरोप मुख्य रूप से CJP की ओर से सामने आया है। कार्यक्रम स्थल के मालिक या प्रबंधन की ओर से ऐसा कोई विस्तृत सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया है, जिससे यह स्वतंत्र रूप से साबित हो सके कि अनुमति वास्तव में किसी राजनीतिक दबाव के कारण वापस ली गई थी। इसलिए फिलहाल इसे CJP का आरोप कहना अधिक उचित होगा, न कि स्थापित तथ्य।
स्कूल सुधार बना CJP का नया मुद्दा
CJP का यह अभियान उसके पहले के NEET और शिक्षा सुधार आंदोलन के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है। संगठन ने हाल के महीनों में परीक्षा व्यवस्था, युवाओं के भविष्य और शिक्षा मंत्रालय की जवाबदेही को लेकर देशव्यापी आंदोलन खड़ा किया था। जुलाई में दिल्ली के जंतर-मंतर पर उसके आंदोलन ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी थीं। बाद में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और सरकार के साथ बातचीत के बाद आंदोलन समाप्त किया गया।
अब CJP का जोर सरकारी स्कूलों की जमीनी स्थिति पर है। पार्टी का तर्क है कि शिक्षा सुधार केवल प्रतियोगी परीक्षाओं या पाठ्यक्रम में बदलाव तक सीमित नहीं होना चाहिए। जब तक सरकारी स्कूलों में पर्याप्त कक्षाएं, साफ शौचालय, बिजली, पीने का पानी, प्रयोगशालाएं और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं होंगी, तब तक गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना मुश्किल रहेगा।
CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने 15 अगस्त को इस अभियान की शुरुआत करते हुए राजनीतिक दलों पर सरकारी स्कूलों की अनदेखी का आरोप लगाया था। उनका अभियान सरकारों से स्कूलों की वास्तविक स्थिति पर जवाब मांगने और स्थानीय लोगों को निरीक्षण की प्रक्रिया में शामिल करने पर केंद्रित है।
राजस्थान में भी विवाद
स्कूल सुधार अभियान को लेकर राजस्थान में भी CJP और सरकार के बीच टकराव सामने आया है। अभियान के तहत सरकारी स्कूलों का निरीक्षण करने की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद राजस्थान शिक्षा विभाग ने सरकारी स्कूल परिसरों में बाहरी लोगों के प्रवेश को लेकर नई पाबंदी जारी कर दी। निर्देश के अनुसार, बिना प्रधानाचार्य या संस्था प्रमुख की पूर्व अनुमति के बाहरी लोगों को स्कूल परिसर में प्रवेश नहीं दिया जाना था।
CJP ने इस फैसले के समय को लेकर सवाल उठाया। पार्टी का कहना है कि जब उसने सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति का निरीक्षण करने का अभियान घोषित किया, उसके तुरंत बाद इस तरह का आदेश जारी होना संदेह पैदा करता है।
दूसरी ओर, प्रशासन के नजरिए से स्कूल परिसर में बाहरी लोगों की आवाजाही को नियंत्रित करने के पीछे सुरक्षा, अनुशासन और विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित न होने देने जैसे कारण हो सकते हैं। इसलिए इस आदेश को सीधे राजनीतिक कार्रवाई मानने से पहले सरकार और शिक्षा विभाग का पूरा पक्ष देखना जरूरी है।
पारदर्शिता बनाम प्रशासनिक नियंत्रण
यह विवाद एक बड़े सवाल को सामने लाता है—क्या राजनीतिक या नागरिक संगठन सरकारी स्कूलों की स्वतंत्र रूप से निगरानी कर सकते हैं?
CJP का कहना है कि सरकारी स्कूल जनता के पैसे से चलते हैं और इसलिए उनके बुनियादी ढांचे की स्थिति पर नागरिकों को सवाल पूछने का अधिकार होना चाहिए। दूसरी ओर, स्कूल प्रशासन यह तर्क दे सकता है कि बिना अनुमति बाहरी लोगों का प्रवेश विद्यार्थियों की सुरक्षा, शिक्षण व्यवस्था और संस्थागत अनुशासन को प्रभावित कर सकता है।
यही कारण है कि इस विवाद का समाधान टकराव के बजाय एक स्पष्ट और पारदर्शी निरीक्षण व्यवस्था से निकाला जा सकता है। यदि सरकारें स्कूलों की स्थिति की जानकारी सार्वजनिक करें और स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट की अनुमति दें, तो राजनीतिक आरोपों की गुंजाइश भी कम हो सकती है।
दिल्ली में भी सामने आया था ऐसा आरोप
CJP ने इससे पहले दिल्ली में भी एक कार्यक्रम के लिए स्थल रद्द किए जाने का आरोप लगाया था। पार्टी के अनुसार, नारायणा इलाके में एक बैंक्वेट हॉल में प्रस्तावित स्वयंसेवक बैठक की बुकिंग कथित राजनीतिक दबाव के कारण रद्द कर दी गई, जिसके बाद कार्यक्रम को पास के पार्क में स्थानांतरित करना पड़ा। वहां भी स्थानीय लोगों की ओर से व्यवधान की बात सामने आई थी।
CJP का दावा है कि कई स्थानों पर उसे कार्यक्रम आयोजित करने में इसी तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा। हालांकि, इन मामलों में भी राजनीतिक दबाव के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है। यही वजह है कि इन घटनाओं को फिलहाल आरोप और प्रत्यारोप के रूप में देखना चाहिए।
अभियान का राजनीतिक असर
‘School Thik Karo’ अभियान अब केवल शिक्षा नीति का मुद्दा नहीं रह गया है। इसके साथ राजनीतिक जवाबदेही का सवाल भी जुड़ गया है। CJP नेताओं का कहना है कि जिन सरकारों के पास सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी है, उन्हें यह बताना चाहिए कि स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं क्यों नहीं हैं।
राजस्थान में CJP के प्रवक्ता अशुतोष रांका ने सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर शिक्षा मंत्री से सवाल उठाते हुए चुनौती दी कि सरकार अपने कार्यकाल में विकसित किए गए सर्वश्रेष्ठ स्कूलों की सूची सार्वजनिक करे।
इस तरह CJP शिक्षा के मुद्दे को स्थानीय स्तर तक ले जाने की कोशिश कर रही है। यदि अभियान के तहत स्कूलों की वास्तविक तस्वीरें, स्थानीय समस्याएं और प्रशासन की प्रतिक्रियाएं सामने आती हैं, तो यह सरकारों पर सार्वजनिक दबाव बढ़ा सकता है।
आगे की राह
आने वाले दिनों में CJP के सामने दोहरी चुनौती होगी। पहली, उसे यह साबित करना होगा कि उसका स्कूल निरीक्षण अभियान केवल राजनीतिक प्रचार नहीं, बल्कि वास्तविक शिक्षा सुधार का प्रयास है। दूसरी, उसे प्रशासन और स्कूल प्रबंधन के साथ टकराव से बचते हुए ऐसे तरीके अपनाने होंगे जिनसे विद्यार्थियों की सुरक्षा और पढ़ाई प्रभावित न हो।
सरकारों के लिए भी यह मौका है कि वे CJP के आरोपों को केवल राजनीतिक विरोध के रूप में खारिज करने के बजाय सरकारी स्कूलों की स्थिति पर सार्वजनिक आंकड़े जारी करें। यदि किसी जिले के स्कूल में पानी, शौचालय, बिजली या कक्षाओं की कमी है, तो उस समस्या का समाधान राजनीतिक विवाद से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
CJP के ‘School Thik Karo’ अभियान को लेकर सामने आ रहे विवाद ने शिक्षा व्यवस्था के साथ-साथ राजनीतिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक पारदर्शिता पर भी बहस तेज कर दी है। पश्चिम बंगाल में कार्यक्रम स्थल बदलने के मामले में CJP ने राजनीतिक दबाव का आरोप लगाया है, लेकिन इसकी स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
राजस्थान में स्कूल परिसरों में बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक और दिल्ली में कार्यक्रम स्थल रद्द होने के आरोपों ने इस अभियान को और राजनीतिक रंग दे दिया है।
फिर भी इस पूरे विवाद के केंद्र में एक बुनियादी सवाल बना हुआ है—क्या देश के सरकारी स्कूलों में बच्चों को जरूरी सुविधाएं मिल रही हैं? यदि CJP का अभियान इस सवाल पर सरकारों से ठोस जवाब और सुधार हासिल करने में सफल होता है, तो उसका प्रभाव केवल एक राजनीतिक आंदोलन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।\

