UCC

UCC लागू नहीं हो सका क्योंकि कांग्रेस ‘महिलाओं के खिलाफ’ है: भाजपा का आरोप

नई दिल्ली: समान नागरिक संहिता यानी Uniform Civil Code (UCC) को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि विपक्षी पार्टी महिलाओं के अधिकारों और समानता के मुद्दे पर दोहरा रवैया अपनाती है। भाजपा का कहना है कि यदि कांग्रेस वास्तव में महिलाओं को समान अधिकार देने के पक्ष में है, तो उसे समान नागरिक संहिता का विरोध नहीं करना चाहिए। पार्टी के अनुसार, UCC का उद्देश्य अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद असमानताओं को दूर करके नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था तैयार करना है।

भाजपा नेताओं ने यह आरोप ऐसे समय में दोहराया है जब देश में UCC को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस जारी है। समर्थकों का तर्क है कि विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे निजी कानूनों में समानता से महिलाओं के अधिकार मजबूत हो सकते हैं। वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की ओर से UCC के स्वरूप, प्रक्रिया और इसके संभावित सामाजिक प्रभाव को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं।

भाजपा ने कांग्रेस पर साधा निशाना

भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस ने महिलाओं के अधिकारों के सवाल पर हमेशा एक समान नीति नहीं अपनाई। पार्टी नेताओं के मुताबिक, समान नागरिक संहिता महिलाओं को धार्मिक या व्यक्तिगत कानूनों के आधार पर अलग-अलग अधिकार मिलने की व्यवस्था से आगे ले जाकर समान नागरिक अधिकारों की दिशा में कदम हो सकती है।

भाजपा के तर्क में विशेष रूप से विवाह, तलाक और संपत्ति के अधिकारों को शामिल किया जाता है। पार्टी का कहना है कि यदि किसी महिला को केवल उसके धर्म या व्यक्तिगत कानून के कारण किसी दूसरे समुदाय की महिला से अलग कानूनी अधिकार मिलते हैं, तो समानता के संवैधानिक सिद्धांत पर सवाल उठता है।

हालांकि, कांग्रेस का पक्ष इससे अलग रहा है। पार्टी और उसके नेताओं ने कई मौकों पर कहा है कि किसी भी कानून को लागू करने से पहले विभिन्न समुदायों, महिलाओं, आदिवासी समूहों और अन्य प्रभावित वर्गों से व्यापक विचार-विमर्श होना चाहिए। कांग्रेस ने UCC के नाम पर धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को प्रभावित किए जाने की आशंका भी जताई है।

UCC क्या है?

समान नागरिक संहिता का सामान्य अर्थ ऐसी कानूनी व्यवस्था से है जिसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और परिवार से जुड़े कुछ अन्य नागरिक मामलों के लिए सभी नागरिकों पर समान कानून लागू हो। वर्तमान में भारत में इन विषयों से जुड़े कई मामलों में धार्मिक समुदायों के अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य के लिए पूरे देश में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने की बात कही गई है। हालांकि, अनुच्छेद 44 नीति-निर्देशक तत्वों का हिस्सा है और इसे मौलिक अधिकारों की तरह सीधे अदालत में लागू कराने का अधिकार नहीं है।

UCC के समर्थकों का मानना है कि इससे कानूनी समानता बढ़ेगी और महिलाओं को व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद भेदभाव से सुरक्षा मिल सकती है। विरोध करने वालों का कहना है कि समानता सुनिश्चित करना जरूरी है, लेकिन कानून बनाते समय भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता तथा संवैधानिक अधिकारों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।

महिलाओं के अधिकारों पर केंद्रित बहस

UCC के समर्थन में सबसे प्रमुख तर्कों में से एक महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा है। समर्थकों का कहना है कि व्यक्तिगत कानूनों में यदि किसी महिला के विवाह, तलाक, गुजारा भत्ता या संपत्ति के अधिकार सीमित हैं, तो समान नागरिक कानून ऐसी असमानताओं को दूर करने का माध्यम बन सकता है।

भाजपा इसी तर्क के आधार पर कांग्रेस पर सवाल उठा रही है। पार्टी का कहना है कि महिलाओं को समान अधिकार देने की बात करने वाली राजनीतिक पार्टियों को UCC पर भी स्पष्ट समर्थन देना चाहिए।

लेकिन महिला अधिकारों से जुड़े मुद्दे को केवल UCC के समर्थन या विरोध तक सीमित करना भी जटिल है। महिलाओं की वास्तविक स्थिति शिक्षा, रोजगार, संपत्ति में हिस्सेदारी, घरेलू हिंसा से सुरक्षा और न्याय तक पहुंच जैसे अनेक कारकों से प्रभावित होती है। इसलिए UCC पर बहस के साथ इन मुद्दों पर भी समान रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है।

राज्यों में UCC की पहल

UCC को लेकर राज्यों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। उत्तराखंड ने समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम उठाया और 2025 में इसका क्रियान्वयन शुरू किया। उत्तराखंड का कानून विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों सहित कई विषयों को विनियमित करता है।

इसके बाद अन्य भाजपा शासित राज्यों में भी UCC को लेकर चर्चा तेज हुई। इससे राष्ट्रीय स्तर पर यह सवाल उठा कि क्या भविष्य में पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू की जा सकती है।

हालांकि, अलग-अलग राज्यों की सामाजिक, धार्मिक और जनजातीय परिस्थितियां अलग हैं। कुछ क्षेत्रों में पारंपरिक और customary laws की विशेष भूमिका है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर UCC तैयार करने की प्रक्रिया में इन विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण होगा।

कांग्रेस और विपक्ष की आपत्तियां

कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी दलों ने UCC को लेकर कई तरह की आपत्तियां उठाई हैं। उनका कहना है कि समान नागरिक संहिता के नाम पर ऐसा कानून नहीं बनाया जाना चाहिए जिससे देश की विविधता प्रभावित हो। विपक्ष यह भी मांग करता रहा है कि किसी भी प्रस्तावित कानून का मसौदा सार्वजनिक किया जाए और व्यापक चर्चा कराई जाए।

विपक्षी दलों का तर्क है कि महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए सुधार जरूरी हैं, लेकिन इसके लिए सभी समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों में सुधार की प्रक्रिया भी अपनाई जा सकती है। उनका सवाल है कि क्या समानता हासिल करने का एकमात्र रास्ता UCC ही है।

यही अंतर भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। भाजपा UCC को समानता और महिला अधिकारों से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस इसके स्वरूप और संभावित प्रभावों को लेकर सावधानी बरतने की मांग कर रही है।

राजनीतिक मुद्दा बनने की वजह

UCC केवल कानूनी सुधार का विषय नहीं है; यह भारतीय राजनीति में लंबे समय से संवेदनशील मुद्दा रहा है। भाजपा इसे संविधान के अनुच्छेद 44 से जुड़ा महत्वपूर्ण सुधार बताती है, जबकि विपक्ष इसके क्रियान्वयन की प्रक्रिया और सामाजिक प्रभाव पर सवाल उठाता है।

“कांग्रेस महिलाओं के खिलाफ है” जैसे राजनीतिक आरोप इसी व्यापक वैचारिक टकराव का हिस्सा हैं। हालांकि, किसी पूरे राजनीतिक दल को महिलाओं के खिलाफ बताने का दावा एक राजनीतिक आरोप है, न कि अपने आप में स्थापित तथ्य। UCC पर वास्तविक बहस इस बात पर होनी चाहिए कि प्रस्तावित कानून महिलाओं को किस तरह अतिरिक्त सुरक्षा और समान अधिकार देगा और क्या उसकी व्यवस्था सभी समुदायों के लिए न्यायपूर्ण होगी।

निष्कर्ष

समान नागरिक संहिता को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच मतभेद आने वाले समय में भी राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बने रहने की संभावना है। भाजपा इसे समानता, महिला अधिकार और संवैधानिक लक्ष्य से जोड़ती है, जबकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल कानून के स्वरूप, विविधता और व्यापक परामर्श की जरूरत पर जोर देते हैं।

UCC के लागू होने या न होने की बहस से आगे सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि भारत में ऐसा नागरिक कानून कैसे बनाया जाए जो महिलाओं को समान अधिकार दे, संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करे और देश की सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधता का सम्मान भी करे। यही संतुलन UCC पर किसी भी भविष्य की नीति को व्यापक स्वीकार्यता दिलाने में निर्णायक हो सकता है।

 

Delhi में वोटर सूची का SIR शुरू हुआ; सीएम रेखा गुप्ता ने इसे ‘लोकतंत्र का यज्ञ’

Follow us on Facebook

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.