Sreejesh ने मांगी जवाबदेही, विरेन रास्कुइन्हा ने एशियन गेम्स से वर्ल्ड कप की नाकामी ढकने पर चेताया
भारतीय हॉकी के लिए 2026 वर्ल्ड कप का अभियान उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहा। पुरुष और महिला दोनों टीमें सेमीफाइनल में जगह बनाने में नाकाम रहीं। पुरुष टीम को दूसरे दौर में नीदरलैंड्स के बाद अर्जेंटीना के हाथों 3-5 की हार मिली, जबकि महिला टीम ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ गोलरहित ड्रॉ के बाद अंतिम चार की दौड़ से बाहर हो गई। इस प्रदर्शन के बाद भारतीय हॉकी के दो पूर्व दिग्गजों—पीआर श्रीजेश और विरेन रास्कुइन्हा—ने टीम और उसके प्रबंधन को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।
Sreejesh का सीधा सवाल: जवाबदेही कौन तय करेगा?
Sreejesh दो बार के ओलंपिक कांस्य पदक विजेता और पूर्व भारतीय गोलकीपर ने वर्ल्ड कप से भारत के बाहर होने के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इस बात पर सवाल उठाया कि क्या भारतीय हॉकी वास्तव में ऐसी टीम तैयार कर रही है जो दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीमों को हरा सके, या फिर केवल ऐसी टीम जो अच्छा हॉकी खेल सके।
Sreejesh ने हार के बाद इस्तेमाल होने वाली ‘लर्निंग एक्सपीरियंस’, ‘अच्छी हॉकी’ और ‘भविष्य के टूर्नामेंट’ जैसी दलीलों को भी निशाना बनाया। उनका तर्क था कि वर्ल्ड कप को भविष्य की तैयारी के लिए एक अभ्यास प्रतियोगिता की तरह नहीं देखा जा सकता। उन्होंने स्पष्ट रूप से पूछा कि कठिन सवाल कौन पूछेगा और जवाबदेही कौन तय करेगा।
उनकी टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही था कि खिलाड़ियों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने के साथ-साथ कोचिंग और प्रशासनिक व्यवस्था की भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। श्रीजेश के अनुसार, यदि भारत लगातार विश्व की शीर्ष टीमों के सामने निर्णायक मुकाबलों में पिछड़ रहा है, तो केवल ‘सीखने’ की बात कहकर समस्या को टालना पर्याप्त नहीं है।
महिला टीम की तैयारी पर भी उठे सवाल
Sreejesh ने महिला टीम के खिलाड़ियों की तारीफ की और कहा कि उन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद संघर्ष किया। लेकिन उन्होंने महिला टीम के मुख्य कोच की वर्ल्ड कप से पहले छुट्टी को लेकर सवाल उठाया। उनका सवाल था कि टूर्नामेंट की अंतिम तैयारियों के दौरान मुख्य कोच की अनुपस्थिति में टीम से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
यह सवाल केवल एक कोच की उपलब्धता तक सीमित नहीं है। इससे तैयारी की योजना, नेतृत्व और टूर्नामेंट से पहले टीम प्रबंधन की प्राथमिकताओं पर भी बहस शुरू होती है। श्रीजेश ने खिलाड़ियों को दोष देने के बजाय उन लोगों से जवाब मांगने की जरूरत बताई जो तैयारी और रणनीति के लिए जिम्मेदार हैं।
एशियन गेम्स को ‘कवर-अप’ न बनाने की चेतावनी
Sreejesh की सबसे तीखी टिप्पणी आगामी एशियन गेम्स को लेकर थी। उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि वर्ल्ड कप को लेकर चिंता करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि एशियन गेम्स आने वाले हैं; वहां पदक जीतने के बाद लॉस एंजिल्स 2028 ओलंपिक के सपने देखे जा सकते हैं। उनका संकेत साफ था कि एशियन गेम्स में संभावित सफलता को वर्ल्ड कप की कमियों पर पर्दा डालने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
यही चिंता पूर्व भारतीय कप्तान ने भी जताई। रास्कुइन्हा ने कहा कि एशियन गेम्स में भारत का स्वर्ण पदक पुरुष हॉकी की कई मौजूदा कमजोरियों को ढक सकता है। उनका संदेश यह था कि महाद्वीपीय स्तर पर सफलता जरूरी है, लेकिन उससे विश्व स्तर पर भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता से जुड़े सवाल खत्म नहीं हो जाते।
एशिया में मजबूत, दुनिया में संघर्ष
भारत की स्थिति को समझने के लिए एशिया और विश्व स्तर के प्रदर्शन के बीच अंतर महत्वपूर्ण है। वर्ल्ड कप में भारत दूसरे दौर तक पहुंचने वाली एकमात्र एशियाई टीम रही, जबकि पाकिस्तान, मलेशिया और जापान जीत दर्ज करने में नाकाम रहे। इसका मतलब है कि भारत महाद्वीपीय स्तर पर अब भी अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में है। लेकिन रास्कुइन्हा और श्रीजेश की चिंता यही है कि एशियाई प्रतिद्वंद्वियों पर सफलता को विश्व की शीर्ष टीमों के खिलाफ प्रदर्शन का विकल्प नहीं माना जा सकता।
पुरुष टीम का हालिया प्रो लीग प्रदर्शन भी सवालों का कारण रहा था। भारत 2025-26 प्रो लीग में नौ टीमों में आठवें स्थान पर रहा और 16 मुकाबलों में केवल चार जीत दर्ज कर सका। वर्ल्ड कप से पहले यह प्रदर्शन टीम की अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता को लेकर चेतावनी संकेत माना जा सकता था।
असली चुनौती: सिस्टम में बदलाव
श्रीजेश और रास्कुइन्हा की टिप्पणियों का व्यापक अर्थ यह है कि भारतीय हॉकी को केवल अगले टूर्नामेंट के नतीजे पर निर्भर रहने के बजाय दीर्घकालिक योजना की जरूरत है। एशियन गेम्स में पदक जीतना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण होगा, लेकिन उससे वर्ल्ड कप की कमियों का स्वतः समाधान नहीं होगा।
भारत को शीर्ष टीमों के खिलाफ लगातार जीत हासिल करने की क्षमता, बड़े मुकाबलों में रणनीतिक अनुशासन, खिलाड़ियों की तैयारी और कोचिंग व्यवस्था की निरंतरता पर ध्यान देना होगा। साथ ही, हार के बाद ईमानदार समीक्षा और स्पष्ट जवाबदेही की व्यवस्था भी जरूरी होगी।
वर्ल्ड कप के बाद उठी बहस इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय हॉकी का लक्ष्य केवल एशिया में प्रभुत्व कायम करना नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर शीर्ष टीमों के बीच स्थायी स्थान बनाना है। एशियन गेम्स भारत को वापसी का अवसर जरूर देंगे, लेकिन श्रीजेश और रास्कुइन्हा की चेतावनी यही है कि उस सफलता को वर्ल्ड कप की नाकामी का विकल्प नहीं बनाया जाना चाहिए।
अंततः भारतीय हॉकी के सामने सवाल केवल यह नहीं है कि अगली प्रतियोगिता में पदक आएगा या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत ऐसा सिस्टम तैयार कर सकता है जो हर बड़े टूर्नामेंट में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीमों को हराने की वास्तविक क्षमता पैदा करे। वर्ल्ड कप के बाद शुरू हुई जवाबदेही की मांग इसी दीर्घकालिक बदलाव की ओर संकेत करती है।

