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TMC के बागी सांसदों ने अयोग्यता नोटिस में जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा है। सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से चार और सप्ताह का समय देने का अनुरोध किया है।

नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस (TMC) से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) के साथ जाने वाले 20 लोकसभा सांसदों ने अपने खिलाफ चल रही अयोग्यता की कार्यवाही में जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा है। सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से चार और सप्ताह का समय देने का अनुरोध किया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब उनके खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाओं पर प्रक्रिया आगे बढ़ रही है और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है।

सात दिन में जवाब देने का मिला था नोटिस

पूरे विवाद की शुरुआत जून 2026 में हुई, जब TMC के 20 लोकसभा सांसदों ने NCPI में विलय का दावा किया। इन सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से इस विलय को मान्यता देने और सदन में अलग समूह के रूप में बैठने की अनुमति देने का अनुरोध किया था। उस समय इन सांसदों ने दावा किया था कि TMC के लोकसभा में कुल 28 सदस्यों में से 20 उनके साथ हैं।

TMC की ओर से इस कदम का विरोध किया गया। पार्टी के लोकसभा नेता और महासचिव अभिषेक बनर्जी ने जून में इन सभी 20 सांसदों के खिलाफ अलग-अलग अयोग्यता याचिकाएं दाखिल कीं। याचिकाओं में संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून के तहत सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग की गई।

इसके बाद 25 अगस्त को लोकसभा सचिवालय ने इन सांसदों को नोटिस जारी किया। नोटिस में उन्हें याचिकाओं पर अपना पक्ष रखने के लिए सात दिन का समय दिया गया था। सचिवालय ने नियम 7(3) का हवाला देते हुए संबंधित सांसदों से कहा था कि वे अपनी टिप्पणियां लोकसभा अध्यक्ष के विचार के लिए उपलब्ध कराएं।

TMC अब चार सप्ताह और मांगने का फैसला

सात दिन की समयसीमा के बाद बागी सांसदों ने अतिरिक्त समय की मांग की। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने पहले तीन सप्ताह अतिरिक्त मांगे थे और स्पीकर ने उन्हें 22 सितंबर तक जवाब देने का समय दिया था। अब 22 सितंबर 2026 को सामने आई रिपोर्टों में बताया गया है कि सांसदों ने चार और सप्ताह की मांग की है।

सांसदों की ओर से अतिरिक्त समय मांगने का कदम उस समय सामने आया है जब उन्हें अपने खिलाफ दाखिल अलग-अलग याचिकाओं का विस्तृत जवाब तैयार करना है। इन याचिकाओं में उनके TMC छोड़ने और NCPI के साथ जाने को दल-बदल विरोधी कानून के तहत चुनौती दी गई है।

विवाद के केंद्र में है दो-तिहाई का नियम

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सवाल संविधान की दसवीं अनुसूची से जुड़ा है। बागी सांसदों का पक्ष है कि TMC के 28 लोकसभा सदस्यों में से 20 उनके साथ हैं और यह संख्या दो-तिहाई से अधिक है। उनका तर्क है कि ऐसी स्थिति में उनके कदम को दसवीं अनुसूची के तहत संरक्षण मिल सकता है।

दूसरी ओर, TMC ने इन सांसदों के खिलाफ अयोग्यता की मांग की है। विवाद का एक प्रमुख पहलू यह है कि क्या किसी राजनीतिक दल के विधायी दल के दो-तिहाई सांसदों का किसी दूसरे दल में विलय करना अपने आप में दसवीं अनुसूची के तहत पर्याप्त है, जबकि मूल राजनीतिक दल का अस्तित्व बना हुआ है। इस कानूनी सवाल पर विशेषज्ञों के बीच अलग-अलग राय सामने आई है।

सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंच चुका है मामला

अयोग्यता की कार्यवाही में देरी को लेकर TMC ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया। अभिषेक बनर्जी ने अदालत में याचिका दायर कर लोकसभा अध्यक्ष से अयोग्यता याचिकाओं पर जल्द फैसला कराने की मांग की। अगस्त में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मामले में आगे की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए और स्पीकर के पक्ष से भी स्थिति स्पष्ट करने को कहा।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद ही लोकसभा सचिवालय ने 20 सांसदों को नोटिस जारी किया था। अदालत ने इस बात पर जोर दिया था कि मुद्दा केवल नोटिस जारी करने तक सीमित नहीं है, बल्कि अयोग्यता की कार्यवाही पूरी होने का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है।

TMC कौन-कौन से सांसद हैं शामिल?

अयोग्यता याचिकाओं में शामिल 20 सांसदों में वरिष्ठ नेता सुदीप बंद्योपाध्याय, काकोली घोष दस्तीदार और शताब्दी रॉय के अलावा प्रसून बनर्जी, रचना बनर्जी, पार्थ भौमिक, अरूप चक्रवर्ती, सयानी घोष, बापी हलदर, मोहम्मद अबू ताहेर खान और यूसुफ पठान समेत अन्य सांसदों के नाम हैं।

इन सांसदों ने जून में अलग समूह के रूप में मान्यता की मांग की थी। इसके बाद लोकसभा के मानसून सत्र के दौरान उन्हें अलग बैठने की व्यवस्था भी दी गई थी, हालांकि उनकी NCPI में विलय की मांग को लेकर अंतिम निर्णय लंबित रहा।

अब आगे क्या होगा?

अतिरिक्त समय की मांग स्वीकार होती है या नहीं, यह लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय पर निर्भर करेगा। यदि समय दिया जाता है तो 20 सांसदों को अपने खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाओं पर विस्तृत जवाब दाखिल करने का अवसर मिलेगा। इसके बाद उनके जवाब, TMC की याचिकाओं और संबंधित दस्तावेजों पर विचार करते हुए आगे की प्रक्रिया बढ़ सकती है।

राजनीतिक रूप से यह मामला पश्चिम बंगाल की राजनीति के साथ-साथ लोकसभा में TMC के प्रतिनिधित्व से भी जुड़ा है। हालांकि अंतिम फैसला आने तक इन सांसदों की अयोग्यता को लेकर कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। फिलहाल मुख्य सवाल यही है कि स्पीकर अतिरिक्त समय की मांग पर क्या निर्णय लेते हैं और दसवीं अनुसूची के तहत विलय के दावे तथा अयोग्यता याचिकाओं पर आगे की संवैधानिक प्रक्रिया किस दिशा में जाती है।

इस मामले में एक तरफ TMC तेजी से निर्णय चाहती है, जबकि दूसरी तरफ बागी सांसद अपने पक्ष को विस्तार से रखने के लिए अतिरिक्त समय मांग रहे हैं। अब अगला महत्वपूर्ण कदम लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय और उसके बाद दाखिल होने वाले जवाबों पर निर्भर करेगा।

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