SC ने CJI से स्थायी पांच-जज संविधान पीठ की जरूरत पर विचार करने को कहा
नई दिल्ली, 23 सितंबर 2026: भारत के सुप्रीम कोर्ट ने संविधान से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों पर सुनवाई में होने वाली देरी को लेकर एक संस्थागत मुद्दा उठाते हुए मुख्य न्यायाधीश भारत (CJI) से स्थायी पांच-जज संविधान पीठ गठित करने की आवश्यकता पर विचार करने का अनुरोध किया है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की दो-सदस्यीय पीठ ने की।
SC यह घटनाक्रम उस मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून को चुनौती दी गई है। दोनों न्यायाधीश इस बात पर अलग-अलग राय पर पहुंचे कि मामले को पांच-जजों की संविधान पीठ के पास भेजना आवश्यक है या नहीं। इसके बावजूद, उन्होंने मामले को CJI के समक्ष रखने पर सहमति जताई ताकि उचित संख्या वाली संविधान पीठ का गठन किया जा सके।
संविधान पीठ की जरूरत क्यों पड़ती है?
SC भारतीय संविधान का अनुच्छेद 145(3) कहता है कि यदि किसी मामले में संविधान की व्याख्या से संबंधित कानून का कोई महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल है, तो उस मामले की सुनवाई कम-से-कम पांच न्यायाधीशों की पीठ द्वारा की जानी चाहिए। ऐसी पीठ को आम तौर पर Constitution Bench कहा जाता है।
SC में संविधान पीठ कोई स्थायी अलग अदालत नहीं है। सामान्य व्यवस्था में CJI आवश्यकता के अनुसार पांच या उससे अधिक न्यायाधीशों की पीठ गठित करते हैं। यही कारण है कि किसी संवैधानिक प्रश्न को बड़ी पीठ के पास भेजे जाने और उसकी वास्तविक सुनवाई के बीच समय का अंतर पैदा हो सकता है।
23 सितंबर को न्यायमूर्ति दत्ता और न्यायमूर्ति शर्मा ने इसी प्रक्रिया से जुड़े लंबे विलंब पर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि संविधान संबंधी संदर्भ कई वर्षों तक लंबित रह सकते हैं और ऐसी स्थिति संस्थान के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
वर्षों तक लंबित रहने वाले संदर्भ
SC पीठ ने विशेष रूप से उन मामलों का उल्लेख किया जिनमें किसी छोटे या बड़े बेंच द्वारा संवैधानिक प्रश्न को बड़ी पीठ के पास भेजे जाने के बाद अंतिम निर्णय आने में लंबा समय लगा।
LiveLaw की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायाधीशों ने एक ऐसे संदर्भ का उदाहरण दिया जो 2002 से लंबित रहा और बाद में सात-जजों की पीठ से नौ-जजों की पीठ तक पहुंचने में लगभग नौ वर्ष लगे। नौ-जजों की पीठ को भी उस संदर्भ पर निर्णय देने में लगभग पांच महीने लगे।
अदालत ने संकेत दिया कि पांच से 20 वर्ष या उससे भी अधिक समय तक संवैधानिक संदर्भों का लंबित रहना न्यायिक संस्थान के लिए चिंता का विषय है। इसी संदर्भ में पीठ ने कहा कि संस्थान को इस व्यवस्था पर आत्ममंथन करने की आवश्यकता है।
स्थायी पांच-जज पीठ का प्रस्ताव क्या बदल सकता है?
प्रस्ताव का मूल विचार यह है कि यदि संवैधानिक प्रश्नों की सुनवाई के लिए पांच न्यायाधीशों की एक स्थायी पीठ उपलब्ध रहे, तो ऐसे मामलों को बार-बार नई संविधान पीठ के गठन का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
इससे संभावित रूप से तीन स्तरों पर असर पड़ सकता है।
पहला, लिस्टिंग और गठन में लगने वाला समय कम हो सकता है। किसी मामले को बड़ी पीठ के पास भेजे जाने के बाद न्यायाधीशों की उपलब्धता और बेंच संयोजन के कारण होने वाली देरी को कम करने की कोशिश की जा सकती है।
दूसरा, संवैधानिक प्रश्नों पर निरंतरता बढ़ सकती है। एक समर्पित पीठ लगातार संविधान की व्याख्या से जुड़े मामलों की सुनवाई करे तो उससे संबंधित मामलों को प्राथमिकता और संरचित सुनवाई मिल सकती है।
तीसरा, पुराने संदर्भों के निपटारे में मदद मिल सकती है। हालांकि यह अपने आप में लंबित मामलों को समाप्त नहीं करेगा; अदालत को मामलों की संख्या, न्यायाधीशों की उपलब्धता और अन्य प्रशासनिक मुद्दों को भी ध्यान में रखना होगा।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि यह अभी एक न्यायिक पीठ का CJI से किया गया अनुरोध है, न कि स्थायी पांच-जज संविधान पीठ के गठन की घोषणा। अंतिम प्रशासनिक निर्णय CJI के अधिकार क्षेत्र में होगा।
CEC-EC नियुक्ति कानून का मामला
स्थायी संविधान पीठ का मुद्दा जिस मामले के दौरान उठा, वह खुद महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। इस कानून ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की उस व्यवस्था को बदला जिसे सुप्रीम कोर्ट की 2023 की संविधान पीठ के फैसले के बाद लागू किया गया था।
SC 2023 में सुप्रीम कोर्ट की पांच-जजों की संविधान पीठ ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और CJI वाली समिति के जरिए CEC और ECs की नियुक्ति का प्रावधान किया था, जब तक संसद इस विषय पर कानून नहीं बना देती। बाद में 2023 के कानून ने नई व्यवस्था स्थापित की। इसी कानून की संवैधानिक वैधता अब चुनौती के दायरे में है।
मौजूदा मामले में न्यायमूर्ति दत्ता और न्यायमूर्ति शर्मा की राय इस बात पर अलग थी कि क्या याचिकाओं को संविधान पीठ के पास भेजना चाहिए। अंततः मामला CJI के पास भेजा गया ताकि उचित संख्या वाली पीठ का गठन किया जा सके।
SC CJI की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
SC के स्थापित सिद्धांत के अनुसार CJI को “Master of the Roster” माना जाता है। इसका अर्थ है कि पीठों के गठन और मामलों के आवंटन का प्रशासनिक अधिकार CJI के पास होता है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी स्पष्ट किया है कि किसी मामले की सुनवाई कर रही दो या तीन जजों की पीठ स्वयं यह निर्देश नहीं दे सकती कि किसी विशेष संरचना वाली पीठ का गठन किया जाए; बेंच गठन का अधिकार CJI के पास है।
इसीलिए 23 सितंबर की टिप्पणी को एक औपचारिक आदेश की बजाय CJI के लिए संस्थागत सुझाव या अनुरोध के रूप में समझना महत्वपूर्ण है।
न्यायिक व्यवस्था के लिए व्यापक अर्थ
SC स्थायी पांच-जज संविधान पीठ का विचार नया नहीं है। बुधवार की पीठ ने स्वयं कहा कि ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता के बारे में पहले भी विचार व्यक्त किए जाते रहे हैं।
हालांकि, ऐसी व्यवस्था के साथ प्रशासनिक और न्यायिक प्रश्न भी होंगे—जैसे पीठ में किन न्यायाधीशों को शामिल किया जाए, न्यायाधीशों के बीच अन्य मामलों का कार्य-वितरण कैसे हो और क्या हर संवैधानिक मामले को स्थायी पीठ के सामने भेजना उचित होगा।
SC इसलिए आगे का महत्वपूर्ण कदम CJI द्वारा इस प्रस्ताव की व्यवहारिकता का आकलन करना होगा। यदि ऐसी पीठ गठित होती है, तो उसका उद्देश्य संवैधानिक प्रश्नों के निपटारे में होने वाली लंबी देरी को कम करना हो सकता है।
फिलहाल, 23 सितंबर 2026 का घटनाक्रम सुप्रीम कोर्ट के भीतर संवैधानिक संदर्भों के समयबद्ध निपटारे और न्यायिक प्रशासन की कार्यक्षमता पर चल रही चर्चा को सामने लाता है। स्थायी पांच-जज संविधान पीठ बनेगी या नहीं, और यदि बनेगी तो उसकी कार्यप्रणाली क्या होगी, यह CJI के आगामी प्रशासनिक निर्णय पर निर्भर करेगा।

