इंडिया सावधान न्यूज़ मजहर अंसारी
लखनऊ भारत वर्ष के बहुत बड़े हिस्से में जिस तरह से अग्निपथ को लेकर ताडंब और जुर्म का नंगा नाच देखने को मिला वोह शायद ही किसी से अछूता रहा हो,
मगर जिनको युवा कहा जा रहा है वोह युवा नहीं बल्कि दंगाई हैं जिन्होंने देश के कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ाई ,सरकारी संपत्तियों को बुरी तरह आग के हवाले कर दिया
पुलिस प्रशासन उनके सामने असहाय नपुंसक और बोना साबित होता नजर आया,मगर अफसोस की बात तो यह रही कि वहीं प्रशासनिक जिम्मेदार अधिकारी इन दंगाईयों को भटके हुए
नौजवान बताते हुए अपने आपको फख्र महसूस कर रहे थे, जबकि इन दंगाईयों से सख्ती के साथ निपटना चाहिए था मगर पुलिस तमाशबीन बनी खड़ी देख रही थी
इन दंगाई की जगह जेल की सलाखों के पीछे होना चाहिए अगर यह नौजवान थे तो इनको शांति पूर्ण तरीके से अपनी बात को सरकार के सामने रखना चाहिए था,सरकार को भी इन नव युवकों की बात को गंभीरता पूर्वक सुनना चाहिए था,मगर
ऐसा नहीं हुआ। वहीं सरकार को अग्निपथ को लाने से पहले इसकी पूरी जानकारी के साथ उतरना चाहिए था मगर ऐसा नहीं हुआ जिसका नतीजा सबके सामने है,
मगर आज एक प्रश्न चिन्ह जरूर लग गया ? राष्ट्रीय संपत्ति का जिस तरह नुकसान किया गया और तोड़फोड़ हुई है उसमें अकेले रेलवे को लगभग 300 करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ है अब इसकी भरपाई किस तरह होगी और केसे होगी ?
वहीं बलिया में तोड़फोड़ और आगजनी के आरोप में अब तक सबसे ज्यादा युवकों को गिरफ्तार किया गया है उनके खिलाफ सिर्फ शांति भंग की धारा 151 में चालान किया जबकि संगीन धाराओं में मुकद्दमे पंजीकृत होना चाहिए थे,यह
भीड़ स्टेशन पर खड़ी बलिया वाराणसी मेमू बलिया शाहगंज सवारी गाड़ी व सियालदह एक्सप्रेस में तोड़फोड़ कर रही थी
देश में चारों ओर अराजकता का माहौल बना हुआ है
मगर हमारे देश को संविधान से चलता है या ताकत से यहां तो यह ही साबित हो रहा है देश ताकत से ही चल रहा है, लोकतांत्रिक देश में बड़ी ही अजीब से विडंबना है
कि वोह ही पत्थर बाज़ कश्मीर में पत्थर चलाते हैं तो वो आतंकवादी होते हैं और अगर जुमे के दिन पत्थर चलाते हैं तो उपद्रवी कहलाते हैं
और रेलवे को फूंक दें,पुलिस पर पत्थर चलाकर खदेड़ने का काम करें आम आदमी का जनजीवन अस्त व्यस्त हो जाए सरकारी संपत्ति प्राइवेट संपत्ति को स्वाह कर दिया
जाय तो वोह सिर्फ पत्थरबाज़ भटके हुए नौजवान कहलाते हैं जबकि पत्थर बाज़ सिर्फ पत्थरबाज ही होता है
,आज देश को जरूरत है इन नौजवानों के दर्द को समझने की इनकी समस्याओं की और ध्यान देने की इनको रोजगार के अवसर प्रदान करने की,
प्यार से समझाया जा रहा है। गुडी मुड़ी बातें की जा रही हैं। कोई UAPA रासुका लगाने की मांग नहीं कर रहा। गोली नहीं चली, लाठियां नहीं बरसाईं।
अरबों का नुकसान हंसते हंसते झेल लिया। दूसरों की नारेबाजी, पत्थरबाज़ी दहशतगर्दी लगती है। विरोध दर्ज कराना गुनाह-ए-अज़ीम हो गया। संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज हो जाता है।
हवालात में बेरहमी से मारा जाता है। घर तोड़ दिए जाते हैं।
…और ये भेदभाव आज़ादी के बाद से ही चला आ रहा है। उन सरकारों में भी, जो तथाकथित धर्मनिरपेक्ष थीं। उन लोगों से पूछें, जिन्होंने 80-90 का दौर देखा है। मीसा, टाडा, रासुका, सब धर्मनिरपेक्ष सरकारों की देन हैं।
इन काले क़ानूनों का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किन पर हुआ, ये सब जानते हैं। 25-25 साल इन क़ानूनों के तहत जेलों में सड़ा दिया।
इस सरकार को दोष देना बेकार है। इस सरकार में भी वही लोग हैं, जो पहले धर्मनिरपेक्ष कही जाने वाली सरकारों में थे। आगे जो सरकार बनेगी, उसमें भी यही होंगे। कुछ नहीं बदलता, सिर्फ चेहरे बदल जाते हैं।
मगर इस तरह की अराजकता कहीं सरकार की विफलता तो साबित नहीं करता है,हाल ही में किसानों के सामने सरकार घुटने टेक चुकी है अब इस अग्निपथ भी सरकार के सामने हैं।

