Supreme Court ने विकलांग सैनिकों की पेंशन पर केंद्र को लगाई फटकार, 271 अपीलें खारिज
Supreme Court ने पूर्व सैनिकों की दिव्यांगता पेंशन (Disability Pension) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में केंद्र सरकार की अपीलों को खारिज करते हुए कहा है कि सैन्य सेवा के दौरान हुई दिव्यांगता को सेवा से असंबद्ध बताने का बोझ सामान्यतः सरकार/नियोक्ता पर रहता है। 15 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने केंद्र सरकार द्वारा दायर करीब 271 सिविल अपीलों और विशेष अनुमति याचिकाओं (SLPs) का निपटारा किया।
मामला क्या था?
इन मामलों में पूर्व सैनिकों को Armed Forces Tribunal (AFT) और विभिन्न हाईकोर्ट के आदेशों के आधार पर दिव्यांगता पेंशन मिली थी। केंद्र सरकार ने इन फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सरकार की दलील थी कि प्रत्येक बीमारी या दिव्यांगता को सैन्य सेवा के कारण हुई या उससे बढ़ी हुई नहीं माना जा सकता।
दूसरी ओर, पूर्व सैनिकों ने दलील दी कि यदि सेवा में शामिल होते समय उनकी मेडिकल स्थिति सामान्य थी और बाद में सेवा के दौरान कोई दिव्यांगता सामने आई, तो उसे सैन्य सेवा से जोड़ने के स्थापित कानूनी सिद्धांत लागू होने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इन अपीलों पर विचार करते हुए पुराने और 2008 के पेंशन नियमों के बीच संबंध तथा दिव्यांगता को सेवा से जोड़ने के लिए प्रमाण के भार की विस्तार से जांच की।
कोर्ट ने केंद्र की कार्रवाई पर क्या कहा?
पीठ ने इस बात पर विशेष चिंता जताई कि इस तरह के मामलों में केंद्र की ओर से लगातार अपीलें दायर होती रही हैं, जबकि 2015 की रक्षा मंत्री से संबंधित रिपोर्ट में इस श्रेणी के लंबित मामलों को वापस लेने की सिफारिश की गई थी।
अदालत ने कहा कि उक्त सिफारिश को पूरी तरह लागू नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि इन मामलों का लगातार अदालतों में लंबित रहना एक ऐसी व्यवस्था की ओर इशारा करता है, जिसमें विवादों का समय पर समाधान नहीं हो पाया।
अदालत के अनुसार, उसके सामने आई लगभग 271 अपीलों में से बड़ी संख्या limitation यानी निर्धारित समय-सीमा से बाहर थी। फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि ऐसे कई मामलों को अदालत पहले ही देरी के आधार पर खारिज कर चुकी है।
दिव्यांगता साबित करने की जिम्मेदारी किसकी?
फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू burden of proof यानी प्रमाण का भार है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में यदि कोई सैनिक सेवा के दौरान दिव्यांग हुआ है और विवाद यह है कि उसकी दिव्यांगता सैन्य सेवा के कारण हुई या उससे बढ़ी, तो केवल सैनिक से यह साबित करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती कि उसकी स्थिति सेवा से संबंधित थी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार को यह दिखाना होगा कि संबंधित दिव्यांगता न तो सैन्य सेवा के कारण हुई और न ही सैन्य सेवा से बढ़ी। इस सिद्धांत को अदालत ने 2008 के Entitlement Rules के संदर्भ में भी बरकरार माना।
हालांकि, यह नियम हर परिस्थिति में बिल्कुल समान तरीके से लागू नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट ने 2008 के नियमों के Rule 7 में मौजूद प्रावधान को महत्वपूर्ण माना है। यदि दिव्यांगता पेंशन का दावा सेवा से छुट्टी/रिहाई के 15 वर्ष से अधिक समय बाद किया जाता है, तो कुछ परिस्थितियों में प्रमाण का भार दावेदार पर स्थानांतरित हो सकता है।
मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट भी महत्वपूर्ण
Supreme Court ने Medical Board की भूमिका पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि मेडिकल बोर्ड की राय को उचित महत्व दिया जाना चाहिए और केवल इसलिए उसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि कोई दूसरा दृष्टिकोण भी संभव है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट स्वतः अंतिम मानी जाएगी। लंबित मामलों में संबंधित न्यायाधिकरण को मेडिकल बोर्ड की राय और उसके पीछे दिए गए कारणों की उचित जांच करनी होगी।
यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दिव्यांगता पेंशन के मामलों में अक्सर यह विवाद होता है कि बीमारी या शारीरिक स्थिति सैन्य सेवा से संबंधित थी, सेवा के दौरान बढ़ी या उसका सैन्य सेवा से कोई संबंध नहीं था। ऐसे मामलों में मेडिकल रिकॉर्ड और बोर्ड की राय महत्वपूर्ण साक्ष्य बनते हैं।
2008 के नियमों पर भी हुई चर्चा
Supreme Court ने Entitlement Rules, 2008 और पहले लागू रहे Entitlement Rules, 1982 के बीच संबंध पर भी विचार किया। अदालत ने पाया कि 2008 के नियमों ने सेवा से दिव्यांगता के संबंध में मूल सुरक्षा व्यवस्था को व्यापक रूप से समाप्त नहीं किया है।
फैसले में यह भी कहा गया कि केंद्र सरकार यह स्पष्ट करने में सफल नहीं रही कि 2008 के नियम किस तरह और किस अधिकार के तहत 1982 के नियमों को पूरी तरह समाप्त या प्रतिस्थापित करते हैं। अदालत ने पेंशन संबंधी नियमों को सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्पष्ट रूप से तैयार और आधिकारिक रूप से अधिसूचित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
केंद्र को चार महीने का समय
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को उन फैसलों का अनुपालन करने का निर्देश दिया जिनके तहत संबंधित पूर्व सैनिकों को दिव्यांगता पेंशन देने का आदेश दिया गया था। अदालत ने केंद्र को इन निर्देशों का पालन करने के लिए चार महीने का समय दिया है।
इससे उन पूर्व सैनिकों के लिए आगे की प्रक्रिया स्पष्ट होती है जिनके पक्ष में AFT या हाईकोर्ट के आदेश पहले ही आ चुके थे और जिन्हें केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
बड़ी संख्या में ऐसे मामले पहले भी खारिज हुए
फैसले में अदालत ने यह भी बताया कि वर्तमान में सामने आए मामले ऐसे विवादों की तुलना में बहुत कम हैं जिन्हें पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने देरी या गुण-दोष के आधार पर खारिज किया है। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि समान प्रकृति के मामले बार-बार सर्वोच्च अदालत तक पहुंच रहे हैं।
एक महत्वपूर्ण आंकड़ा भी फैसले में सामने आया। RTI से प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्रथम अपीलीय प्राधिकरण के समक्ष आए 2,997 मामलों में करीब 2,855 दावे खारिज किए गए और केवल 142 अपीलें स्वीकार हुईं। दूसरे अपीलीय प्राधिकरण के सामने 456 मामलों में 439 खारिज और 17 स्वीकार किए गए।
फैसले का महत्व
Supreme Court का यह फैसला पूर्व सैनिकों की दिव्यांगता पेंशन से जुड़े मामलों में प्रमाण के भार, मेडिकल बोर्ड की राय और सरकारी अपीलों की प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण है। अदालत ने एक ओर सैन्य सेवा और दिव्यांगता के बीच संबंध साबित करने के कानूनी सिद्धांतों को स्पष्ट किया है, वहीं दूसरी ओर 15 वर्ष से अधिक पुराने दावों के लिए 2008 के नियमों में मौजूद अलग प्रावधान को भी रेखांकित किया है।
सबसे अहम बात यह है कि अदालत ने केंद्र की करीब 271 अपीलों को खारिज करते हुए संबंधित पूर्व सैनिकों के पक्ष में पहले दिए गए AFT और हाईकोर्ट के आदेशों में हस्तक्षेप नहीं किया। साथ ही केंद्र को उन आदेशों का निर्धारित समय में अनुपालन करने को कहा गया है।
इस फैसले से यह संदेश भी स्पष्ट होता है कि दिव्यांगता पेंशन से जुड़े मामलों में केवल प्रशासनिक या मेडिकल असहमति के आधार पर लंबे समय तक मुकदमेबाजी जारी रखने के बजाय लागू नियमों, मेडिकल रिकॉर्ड और न्यायिक फैसलों का समयबद्ध तरीके से पालन करना महत्वपूर्ण है।

