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Bihar की सच्चाई: मुस्लिम समुदाय को सिर्फ 35 टिकट — क्या यही है बराबरी का चेहरा?

Bihar की राजनीति में इन दिनों एक बड़ा सवाल गूंज रहा है — बराबरी कहाँ है? राज्य की आबादी में मुसलमान लगभग 17% हैं, लेकिन पिछली विधानसभा चुनावों में सभी बड़ी पार्टियों ने मिलकर उन्हें सिर्फ 35 टिकट दिए। ये आँकड़ा न सिर्फ कम है, बल्कि कई सवाल भी उठाता है — जब वोटों में उनका इतना असर है, तो टिकटों में इतनी कमी क्यों? जैसे-जैसे चुनावी माहौल फिर गर्म हो रहा है, लोग पूछ रहे हैं — क्या इस बार कुछ बदलेगा, या फिर वही पुरानी कहानी दोहराई जाएगी?

Bihar की राजनीति में मुस्लिम प्रतिनिधित्व: 35 टिकटों की हकीकत

Bihar में पार्टियाँ सीट बँटवारे को लेकर बेहद गणिती चालें चलती हैं।
2020 के चुनावों में बड़ी पार्टियों — यानी राजद, जदयू, भाजपा और कांग्रेस — ने मिलाकर मुश्किल से 35 टिकट मुस्लिम उम्मीदवारों को दिए। यह आंकड़ा स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स और इलेक्शन वॉच ग्रुप्स से सामने आया था।

इतनी बड़ी आबादी के मुकाबले इतनी कम हिस्सेदारी निराशाजनक है। वोटर खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं, और विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सामाजिक और राजनीतिक दूरी की निशानी है।

पार्टीवार टिकट बँटवारे का गणित

  • राजद (RJD): लगभग 15 टिकट मुस्लिम उम्मीदवारों को दिए।

  • जदयू (JD-U): करीब 10 टिकट।

  • भाजपा (BJP): 5 से भी कम।

  • कांग्रेस (INC): 4-5 टिकट के बीच।

कुल सीटें हैं 243, और उसमें से सिर्फ 35 टिकट मुस्लिमों को मिले — यानी हिस्सेदारी लगभग 14% से भी कम
पार्टियाँ कहती हैं कि वे “विजयी चेहरों” को प्राथमिकता देती हैं, लेकिन चुनाव आयोग के आँकड़ों से पता चलता है कि मुस्लिम उम्मीदवारों ने करीब 25 सीटों पर जीत दर्ज की थी — यानी प्रतिनिधित्व अभी भी उनकी आबादी से बहुत पीछे है।

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वोट बैंक की राजनीति और उम्मीदवार चुनने की रणनीति

Bihar में टिकट बँटवारे का फ़ैसला अकसर वोट बैंक के समीकरण से तय होता है, न कि योग्यता से।
जैसे सीमांचल (किशनगंज, कटिहार, अररिया, पूर्णिया) में मुस्लिम वोट 50% से भी ज़्यादा हैं, तो वहाँ टिकट मिल जाता है। लेकिन बाकी इलाकों में पार्टियाँ डरती हैं कि इससे “अन्य वोट” न खिसक जाएँ।

उदाहरण के तौर पर किशनगंज में राजद ने स्थानीय मुस्लिम चेहरा उतारा और जीत भी हासिल की, लेकिन बगल के जिलों में संतुलन के नाम पर मुस्लिमों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया।
यह दिखाता है कि राजनीतिक गणित, समानता से बड़ा है

35 टिकटों का बोझ: समुदाय पर असर-Bihar

Bihar में 1.7 करोड़ से ज़्यादा मुसलमान रहते हैं, लेकिन विधानसभा में उनके विधायक सिर्फ 10% के आसपास हैं।
इस प्रतिनिधित्व की कमी का सीधा असर नीतियों पर पड़ता है — चाहे वो शिक्षा हो, रोजगार या स्वास्थ्य सेवाएँ।
कम आवाज़ का मतलब है कम प्राथमिकता

सच कहें तो यह वैसा ही है जैसे एक बड़े परिवार में सिर्फ कुछ लोगों को ही खाने की थाली मिले।
सच्चर समिति रिपोर्ट पहले ही दिखा चुकी है कि मुसलमान शिक्षा और आमदनी में पीछे हैं।
अगर राजनीतिक भागीदारी बढ़े, तो ये असमानता कम हो सकती है।

नए मुस्लिम नेता और आंतरिक चुनौतियाँ

अररिया, कटिहार जैसे इलाकों से नए चेहरे उभर रहे हैं — जैसे अख्तरुल इमान जैसे नेता जो ज़मीनी मुद्दों पर काम कर रहे हैं।
लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत है — एक या दो पार्टियों पर अत्यधिक निर्भरता
जब विकल्प कम हों, तो आवाज़ भी कमजोर पड़ जाती है।
युवा नेता बदलाव चाहते हैं, लेकिन पुराने नेता नियंत्रण छोड़ने को तैयार नहीं।
अगर व्यापक गठजोड़ और नए प्लेटफ़ॉर्म बनें, तो स्थिति बदल सकती है।

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पार्टियों के दावे बनाम ज़मीनी हकीकत-Bihar

राजनीतिक दल अपने बचाव में वही पुराने तर्क देते हैं —

  • नीतीश कुमार (JD-U) कहते हैं कि उनकी पार्टी “योग्यता के आधार पर” टिकट देती है।

  • तेजस्वी यादव (RJD) का कहना है कि 15 टिकट देना उनकी “समानता की सोच” दिखाता है।

  • भाजपा और कांग्रेस दोनों ही “विजयी संभावना” को कारण बताते हैं।

लेकिन आँकड़े बताते हैं कि बातें कुछ और हैं, हकीकत कुछ और

मुस्लिम कार्यकर्ताओं और जनता की नाराज़गी-Bihar

पटना, मुज़फ्फरपुर और दरभंगा जैसे इलाकों में कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किए।
लोगों का कहना है कि यह उनके “वोटों के साथ विश्वासघात” है।
सीवान में एक पुराने राजद नेता को टिकट नहीं मिला तो उन्होंने बगावत कर दी और निर्दलीय उतर आए।
उन्होंने खुलकर कहा — “कास्ट की राजनीति में काबिलियत दबा दी गई है।”
ऐसे हालात ने पार्टी के अंदर भी असंतोष बढ़ाया।

आगे का रास्ता: बराबरी की दिशा में कदम

राजनीतिक दलों को बदलाव के लिए ठोस कदम उठाने होंगे —

  1. स्थानीय सर्वे करके मज़बूत मुस्लिम चेहरों की पहचान करें।

  2. टिकट तय करने से पहले समुदाय से सीधा संवाद करें।

  3. सभी समुदायों में से नए नेताओं को ट्रेनिंग देकर आगे बढ़ाएँ।

  4. गठबंधन में टिकटों की पारदर्शी नीति तय करें।

इससे भरोसा बढ़ेगा और प्रतिनिधित्व भी।

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मुस्लिम मतदाताओं की अपेक्षाएँ और भूमिका

मुस्लिम मतदाता अब सिर्फ धर्म नहीं, रोज़गार, शिक्षा और सुरक्षा पर ध्यान दे रहे हैं।
वे अब ऐसी पार्टियों की तलाश में हैं जो वादे नहीं, काम दिखाएँ।
अगर वे संगठित होकर मुद्दों पर वोट करें, तो राजनीतिक दलों को भी सुधार लाना पड़ेगा।

सिर्फ संख्या नहीं, असली सशक्तिकरण ज़रूरी

“35 टिकट” सिर्फ एक आँकड़ा नहीं — यह बिहार की राजनीति का आईना है।
क्या यह गणित की मजबूरी है या जानबूझकर की गई अनदेखी?
जो भी हो, इसका नतीजा है — एक बड़े समुदाय की आवाज़ कमजोर पड़ जाना।

अगर Bihar को वाकई आगे बढ़ना है, तो समान प्रतिनिधित्व और न्यायपूर्ण राजनीति ज़रूरी है।
पार्टियों को समावेशी बनना होगा, और समाज को अपनी आवाज़ बुलंद करनी होगी।

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